# समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति | Scientific Nature of Sociology | Samajshastra Ki Vaigyanik Prakriti

समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति

मैक्स वेबर (Max Weber) के शब्दों में, – “समाजशास्त्र एक विज्ञान है। यह सामाजिक कार्यों की व्याख्या करते हुए इनको स्पष्ट करने का प्रयास करता है।”

गिडिंग्स (Giddings) के शब्दों में, – “समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।”

समाजशास्त्र विज्ञान के रूप में –

समाजशास्त्र अन्य विज्ञानों की तरह ही एक विज्ञान है जो समाज, सामाजिक घटनाओं एवं सामाजिक पहलुओं का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। समाजशास्त्र में वैज्ञानिक प्रकृति अर्थात् विज्ञान की निम्नलिखित विशेषताएँ पाई जाती हैं।

(1) वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग-

समाजशास्त्र में सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक अन्तक्रियाओं, सामाजिक व्यवहार एवं समाज का अध्ययन कल्पना के आधार पर नहीं किया जाता, अपितु इनको वास्तविक रूप से वैज्ञानिक पद्धति द्वारा समझने का प्रयास किया जाता है। वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ही उपकल्पनाओं का परीक्षण एवं सामाजिक नियमों या सिद्धान्तों का निर्माण किया जाता है। समाजशास्त्रीय अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति द्वारा ही किये जाते हैं तथा दुर्खीम, मैक्स वेबर जैसे प्रारम्भिक समाजशास्त्रियों के अध्ययनों को निश्चित रूप से वैज्ञानिक अध्ययनों की श्रेणी में रखा जा सकता है। अतः समाजशास्त्र अन्य विज्ञानों की तरह ही एक विज्ञान है।

(2) समाजशास्त्रीय ज्ञान प्रमाण पर आधारित है-

समाजशास्त्री किसी बात को बलपूर्वक मानने के लिए नहीं कहते, अपितु तर्क एवं प्रमाणों के आधार पर इसकी व्याख्या करते हैं। समाजशास्त्र में वास्तविक घटनाओं का अध्ययन, अवलोकन या अन्य प्रविधियों द्वारा किया जाता है।

(3) ‘क्या है’ का अध्ययन-

समाजशास्त्र तथ्यों का यथार्थ रूप से वर्णन ही नहीं करता, अपितु इनकी व्याख्या भी करता है। इसमें प्राप्त तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर या आदर्श एवं कल्पना से मिश्रित करके प्रस्तुत नहीं किया जाता, अपितु वास्तविक घटनाओं (जिस रूप में वे विद्यमान हैं) का वैज्ञानिक अध्यन किया जाता है।

(4) तथ्यों का वर्गीकरण एवं विश्लेषण-

समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धति द्वारा एकत्रित आँकड़ों को व्यवस्थित करने के लिए उनका वैज्ञानिक वर्गीकरण किया जाता है तथा तर्क के आधार पर विवेचन करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं, क्योंकि तथ्यों का वर्गीकरण, उनके क्रम का ज्ञान व सापेक्षिक महत्व का पता लगाना ही विज्ञान है और इन सब बातों को हम समाजशास्त्रीय विश्लेषण में स्पष्ट देख सकते हैं। अतः समाजशास्त्र एक विज्ञान है।

(5) कार्य-कारण सम्बन्धों की व्याख्या-

समाजशास्त्र अपनी विषय-वस्तु में कार्य-कारण सम्बन्धों की खोज करता है; अर्थात् इसका उद्देश्य विभिन्न सामाजिक घटनाओं के बारे में आँकड़े एकत्रित करना ही नहीं है, अपितु उनके कार्य-कारण सम्बन्धों एवं परिणामों का पता लगाना भी है। प्राकृतिक विज्ञानों में कार्य-कारण सम्बन्धों का निरीक्षण प्रयोगशाला में किया जाता है, परन्तु समाजशास्त्र में यह अप्रत्यक्ष प्रयोगात्मक पद्धति अर्थात् तुलनात्मक पद्धति द्वारा ही सम्भव है।

(6) सामान्यीकरण या सिद्धान्त-निर्माण का प्रयास-

समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धति द्वारा अध्ययन किये जाते हैं तथा सामाजिक वास्तविकता को समझने का प्रयास किया जाता है। इसीलिए इसमें सामान्यीकरण करने एवं सिद्धान्तों का निर्माण करने के प्रयास भी किये गये हैं, यद्यपि एक आधुनिक विषय होने के कारण इनमें अधिक सफलता नहीं मिल पाई है। समाजशास्त्र में यद्यपि अधिक सर्वमान्य सिद्धान्तों का निर्माण नहीं किया गया है, परन्तु अनेक सामान्यीकरण किये गये हैं तथा आज हम निरन्तर सिद्धान्तों का निर्माण नहीं किया गया है, परन्तु अनेक सामान्यीकरण किये गये हैं तथा आज हम निरन्तर सिद्धान्तों के निर्माण की तरफ आगे बढ़ रहे हैं।

(7) सामाजिक सिद्धान्तों की पुनर्परीक्षा-

विज्ञान के लिए यह आवश्यक है कि उसके द्वारा प्रतिपादित नियमों का पुनर्परीक्षण हो सके और इस कसौटी पर समाजशास्त्र खरा उतरता है। जब किसी समाजशास्त्री द्वारा सिद्धान्त या नियम प्रतिपादित किये जाते हैं तो अन्य लोग उसे तर्क के आधार पर समझने एवं प्रमाणों के आधार पर उनकी पुनर्परीक्षा करने का प्रयास करते हैं।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि समाजशास्त्र एक विज्ञान है। इसमें विज्ञान के सभी आवश्यक तत्व मौजूद हैं, इसकी प्रकृति वैज्ञानिक है.

Read More —> समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति के विरुद्ध कुछ आपत्तियाँ/आलोचनाएं.

समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति –

प्रत्येक विषय की प्रकृति यद्यपि एक वाद-विवाद का विषय है, फिर भी रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) का कहना है कि समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति वैज्ञानिक है। इसे इन्होंने निम्नांकित विशेषताओं द्वारा स्पष्ट किया है।

(1) समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है, प्राकृतिक विज्ञान नहीं-

समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है क्योंकि इसकी विषय-वस्तु मौलिक रूप से सामाजिक है; अर्थात् इसमें समाज, सामाजिक घटनाओं, सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक सम्बन्धों तथा अन्य सामाजिक पहलुओं एवं तथ्यों का अध्ययन किया जाता है। प्रत्यक्ष रूप से इसका प्राकृतिक या भौतिक वस्तुओं से कोई सम्बन्ध नहीं है; अतः यह प्राकृतिक विज्ञान नहीं है। समाजशास्त्र स्वयं सम्पूर्ण विज्ञान नहीं है, अपितु सामाजिक विज्ञानों में से एक विज्ञान है।

(2) समाजशास्त्र एक वास्तविक (निश्चयात्मक) विज्ञान है, आदर्शात्मक विज्ञान नहीं-

समाजशास्त्र वास्तविक घटनाओं का अध्ययन, जिस रूप में वे विद्यमान हैं, करता है तथा विश्लेषण में किसी आदर्श को प्रस्तुत नहीं करता या अध्ययन के समय किसी आदर्शात्मक. दृष्टिकोण को नहीं अपनाया जाता। अतः यह एक वास्तविक विज्ञान है, आदर्शात्मक नहीं। अवलोकन प्रविधि द्वारा आँकड़ों के संकलन तथा कार्य-व कारण सम्बन्धों के अध्ययन पर बल देने के कारण भी यह एक वास्तविक विज्ञान है। समाजशास्त्र इस बात का अध्ययन नहीं करता कि क्या होना चाहिए, अपितु इस बात का अध्ययन करता है कि वास्तविक स्थिति क्या है।

(3) समाजशास्त्र अमूर्त विज्ञान है, मूर्त विज्ञान नहीं-

अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह समाजशास्त्र एक अमूर्त विज्ञान है क्योंकि इसकी विषय-वस्तु जैसे समाज, सामाजिक सम्बन्धों, सामाजिक संस्थाओं, प्रथाओं, विश्वासों इत्यादि को देखा या छुआ नहीं जा सकता। उदाहरण के लिए; संस्थाओं को हाथ में लेकर नहीं देखा जा सकता और न ही प्रथाओं को तराजू में तौला जा सकता है। समाज भी अमूर्त है क्योंकि इसे सामाजिक सम्बन्धों (जो कि स्वयं अमूर्त हैं) का ताना-बाना माना गया है। अतः समाजशास्त्र एक अमूर्त विज्ञान है, मूर्त नहीं। रॉबर्ट बीरस्टीड का कहना है कि “समाजशास्त्र मानवीय घटनाओं के मूर्त प्रदर्शन में विश्वास न रखकर उन स्वरूपों और प्रतिमानों को मान्यता देता है जो घटना विशेष से सम्बन्धित होती हैं।”

(4) समाजशास्त्र एक विशुद्ध विज्ञान है, व्यावहारिक विज्ञान नहीं-

समाजशास्त्र विशुद्ध विज्ञान है, क्योंकि इसका प्रमुख उद्देश्य मानव समाज से सम्बन्धित सामाजिक घटनाओं का अध्ययन, विश्लेषण एवं निरूपण कर ज्ञान का संग्रह करना है। विशुद्ध विज्ञान क्योंकि सैद्धान्तिक होता है इसीलिए इसके द्वारा संचित ज्ञान अनिवार्य रूप से व्यावहारिक उपयोग में नहीं लाया जा सकता। रॉबर्ट बीरस्टीड ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजशास्त्र व्यर्थ या अव्यावहारिक विज्ञान है, परन्तु समाजशास्त्र की इसमें कोई रुचि नहीं कि प्राप्त ज्ञान का प्रयोग व्यावहारिक क्षेत्रों पर कैसे लागू किया जाता है।

(5) समाजशास्त्र सामान्य विज्ञान है, विशेष विज्ञान नहीं-

अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह समाजशास्त्र भी घटनाओं का अध्ययन करके सामान्यीकरण करने या सामान्य नियमों का निर्माण करने का प्रयास करता है। अधिकांश समाजशास्त्रियों की यह मान्यता है कि समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है, क्योंकि इसमें सामाजिक जीवन की सामान्य घटनाओं का ही अध्ययन किया जाता है। दुर्खीम (Durkheim) हॉबहाउस (Hobhouse) तथा सोरोकिन (Sorokin) जैसे विद्वानों ने इसे सामान्य विज्ञान माना है।

(6) समाजशास्त्र तार्किक तथा अनुभवाश्रित विज्ञान है-

समाजशास्त्र एक तार्किक विज्ञान है, क्योंकि इसमें सामाजिक घटनाओं एवं तथ्यों की तार्किक व्याख्या देने का प्रयास किया जाता है। साथ ही, क्योंकि इसमें अध्ययन अनुसन्धान क्षेत्र में जाकर किया जाता है पुस्तकालय में बैठकर नहीं, अतः यह अनुभवाश्रित भी है। समाजशास्त्र तर्क के आधार पर वास्तविक घटनाओं का अध्ययन करता है, परन्तु फिर भी अनुभव के आधार पर कम उपयोगी तथ्यों की पूरी तरह से अवहेलना नहीं करता।

Leave a Comment

2 + 11 =