# सावयवी सिद्धान्त : हरबर्ट स्पेन्सर | सावयवी सादृश्यता सिद्धान्त | समाज और सावयव में अंतर/समानताएं, आलोचनाएं

सावयवी सादृश्यता सिद्धान्त :

स्पेन्सर के सामाजिक चिन्तन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धान्त समाज का सावयवी सादृश्यता सिद्धान्त है जिसका उल्लेख उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘समाजशास्त्र के सिद्धान्त‘ (Principles of Sociology) में किया है।

उन्होंने इस सिद्धान्त में यह बताया है कि समाज का विकास मनुष्य के शरीर के समान होता है। स्पेन्सर ने व्यक्ति और समाज की तुलना की है। व्यक्ति और समाज में अनेक समानताएँ तथा विभिन्नताएँ पायी जाती हैं। जिस प्रकार भिन्न अंगों से मिलकर शरीर बनता है, ठीक उसी प्रकार अनेक सामाजिक संस्थाओं, संगठनों और समूह से मिलकर समाज का निर्माण होता है। स्पेन्सर का कहना है कि विभिन्न अंगों के योग से बनी वस्तु ‘सावयवी‘ (Organic) कहलाती है। मनुष्य का शरीर भी ‘सावयवी’ है। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर के विभिन्न अंग एक-दूसरे पर निर्भर होकर पूरे शरीर की रक्षा के लिए कार्य करते हैं, ठीक उसी प्रकार से समाज के विभिन्न अंग उसकी संस्थाएँ और समितियाँ सम्पूर्ण समाज की रक्षा के लिए कार्य करते हैं। इस दृष्टि से समाज एक सावयव (Organism) है।

स्पेन्सर ने कहा है कि जिस प्रकार शरीर का क्रमिक विकास होता है, उसी प्रकार समाज का भी विकास होता हैं और यह विकास सरलता से जटिलता की ओर, अनिश्चितता से निश्चितता की ओर होता है। समाज के विभिन्न अंगों में सावयव की तरह परस्पर अन्तर्सम्बन्ध और अन्तर्निर्भरता पायी जाती है।

समाज के विकास की अवस्थाएँ :

हरबर्ट स्पेन्सर समाज के विकास की निम्नलिखित चार अवस्थाएँ बतायी है-

(1) – प्रारम्भ में या अति आदिम युग में समाज अत्यधिक सादा और सरल था। इसके विभिन्न अंग इस प्रकार घुले-मिले होते थे कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता था। एक परिवार ही सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक सभी प्रकार के कार्यों को करता था। समाज केवल एक समूह मात्र था और खानाबदोश झुण्ड के रूप में घुमन्तू जीवन व्यतीत करता था। प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने ही परिवार के बारे में जानता था। किसी व्यक्ति का न कोई निश्चित उद्देश्य था और न ही कोई विशेष कार्य। सभी व्यक्तियों का उद्देश्य केवल भोजन, आवास तथा तन ढकने की जरूरत तक ही सीमित था। एक-दूसरे के प्रति किसी भी प्रकार की सामाजिक भावनाएँ नहीं थीं। साथ ही, इस स्तर पर न तो मानव-जीवन, न ही सामाजिक संगठन और संस्कृति कुछ भी निश्चित नहीं था। इस प्रकार समाज की यह अवस्था अनिश्चित असम्बद्ध समानता की थी। प्रारम्भ में सावयवी भी एक भ्रूण या पिण्डी की भाँति होता है।

(2) – परन्तु कालान्तर में धीरे-धीरे मनुष्य के अनुभव, विचार तथा ज्ञान में उन्नति हुई और वह समूहवादी से सामाजिक बन गया। पारिवारिक जीवन संगठित हुआ और उसके भीतर पिता अथवा कुल-वृद्ध का अनुशासन माना जाने लगा। नागरिक जीवन विकसित होने लगा और अधिकतर कर्त्तव्य तथा सहकारिता के नियमों की रचना धीरे-धीरे होने लगी तथा कुल पिता और समुदाय के नेता का अनुशासन मानने की भावना बढ़ती गयी। इस प्रकार सामाजिक जीवन के विभिन्न अंग स्पष्ट होने लगे। उदाहरणार्थ- परिवार, राज्य, कारखाना, धार्मिक संस्था, धार्मिक संघ, गाँव, नगर आदि स्पष्ट रूप से विकसित हुए। इस विकास के दौरान में जैसे-जैसे विभिन्न अंग स्पष्ट होते गये उनके कार्य भी अलग-अलग बँट गए; अर्थात् समाज के विभिन्न अंगों के बीच श्रम-विभाजन और विशेषीकरण हो गया। इस प्रकार सामाजिक जीवन में भिन्नता के गुण का विकास हुआ। ठीक इसी प्रकार सावयव की प्रारम्भिक अवस्था भ्रूण में भी विभिन्न अंग विकसित होते हैं।

(3) – इन विभिन्नताओं (श्रम-विभाजन और विशेषीकरण) के होते हुए भी समाज के विभिन्न अंग एक-दूसरे के पृथक् या पूर्णतया अलग नहीं होते हैं। उनमें कुछ-न-कुछ अन्तर्सम्बन्ध और अन्तर्निर्भरता बनी रहती है। परिवार राज्य से सम्बन्धित तथा उस पर निर्भर है और राज्य परिवार से सम्बन्धित और उस पर निर्भर है। समाज के विभिन्न व्यक्ति अपना-अपना विशिष्ट कार्य करते हुए अपनी-अपनी आवश्यकताओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। सावयव के विभिन्न अंगों की भाँति इनमें भी अन्तर्सम्बन्ध और अन्तर्निर्भरता पायी जाती है।

(4) – सामाजिक उद्विकास की प्रक्रिया भी धीरे-धीरे कुछ निश्चित स्तरों या अवस्थाओं से गुजरती है। उदाहरणार्थ- आर्थिक जीवन में यह क्रम शिकार करने और भोजन एकत्र करने की अवस्था से धीरे-धीरे विभिन्न निश्चित अवस्थाओं से गुजरने के बाद आधुनिक जटिल औद्योगिक जीवन की अवस्था में विकसित हुआ है। लेकिन इन सबका अर्थ यह नहीं है कि सावयव एक समाज है या समाज एक सावयव है। स्पेन्सर का कहना है कि समाज तथा सावयव (शरीर संरचना) में अनेक समानताएँ और कुछ आधारभूत विभिन्नताएँ भी हैं।

समाज और सावयव में समानताएँ :

समाज और शरीर सावयव में अनेक समानताएँ पाई जाती हैं। स्पेन्सर ने इन समानताओं को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है-

1. समाज और शरीर दोनों जड़ पदार्थों से भिन्न

समाज और शरीर सावयव दोनों में ही वृद्धि होती है, परन्तु जड़ पदार्थ आकार में नहीं बढ़ते, वे तो वैसे ही रहते हैं। मनुष्य और समाज दोनों के पास सोचने के लिए मस्तिष्क होता है, परन्तु जड़ पदार्थों में मस्तिष्क नहीं पाया जाता है।

2. आकार की वृद्धि से जटिलता में वृद्धि

समाज और शरीर सावयव दोनों में ही वृद्धि होती है, लेकिन वृद्धि के साथ-साथ उनमें जटिलता भी बढ़ती जाती है। जैसे- जहाँ कम व्यक्ति हैं, वहाँ समाज उतना ही सरल होता है, लेकिन बड़े समाज का जीवन जटिल होता है। शरीर के लिए भी आकार की वृद्धि से जटिलता बढ़ती जाती है। जैसे- बच्चे का जीवन स्वाभाविक और सरल होता है, आवश्यकताएँ कम होती हैं, लेकिन उम्र के साथ-साथ आवश्यकताएँ बढ़ती जाती हैं और जटिलता आती जाती है। अतः स्पष्ट है कि समाज और शरीर सावयव दोनों में आकार की वृद्धि से जटिलता में वृद्धि होती है।

3. रचना की विषमता के साथ कार्यों में भी विषमता

शरीर के विभिन्न अंगों के बनने के साथ-साथ उनके कार्यों में भी विषमता आ जाती है। पैरों का कार्य चलने व सीधे खड़े रहने का है, हाथ वस्तु को उठाने का और लिखने का कार्य करते हैं। मुँह बोलने, हँसने और खाने का कार्य करता है। इस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग विभिन्न कार्यों को पूरा करते हैं। मनुष्य प्रत्येक कार्य को विभिन्न अंगों से ही कर सकता है। जो कार्य बच्चों के हैं, वे युवकों के नहीं और जो कार्य युवकों के हैं, वे वृद्धों के नहीं, अर्थात् रचना में अन्तर आने से कार्यों पर असर आता है। इसी प्रकार समाज में भी रचना बढ़ने से जटिलता बढ़ती है और जटिलता बढ़ने से कार्यों का विभाजन होता है।

4. समान नियन्त्रण प्रणाली

शरीर पर मस्तिष्क का नियन्त्रण रखता है। मस्तिष्क के इशारे से ही हाथ वस्तु को उठाता है तथा वस्तु मुँह में जाती है। किसी भी क्रिया के तीन तत्व होते हैं। पहले में वे उसे जानते हैं, फिर क्रिया करते हैं तथा फिर अनुभव करते हैं और यह सब मस्तिष्क ही नियन्त्रित करता है। समाज में भी नियन्त्रण प्रणाली होती है। समाज में नियन्त्रण करने वाले नेता होते हैं, कानून, प्रथा, राज्य, शासन पद्धति, सरकार, रूढ़ियाँ, धर्म आदि समाज पर नियन्त्रण रखने वाले कारक हैं, परिवार सामाजिक नियन्त्रण का सबसे अच्छा साधन है। इस प्रकार समाज और शरीर दोनों में ही नियन्त्रण प्रणाली होती है।

5. दोनों अंगों में समन्वय

एक स्वस्थ परिणाम के लिए समाज के अंग समाज के लिये तथा शरीर के अंग शरीर के लिये ही होते हैं। जैसे-समाज के व्यक्ति समाज के नियमों के अनुसार ही चलते हैं, समाज की परम्परा का ध्यान रखते हैं। बहुत कम लोग समाज का विरोध करते हैं और विरोध करना चाहते भी हैं तो कर नहीं पाते हैं। समाज में संगठन अधिक और विघटन कम होता है। इसी प्रकार शरीर के अंगों में भी समन्वय होता है। ज्ञानेन्द्रियों में समन्वय होता है। हाथ तथा पैर समन्वय से ही कार्य करते हैं। इनकी रचना ही ऐसी है कि आपस में इनके कार्यों में संघर्ष नहीं होता। इस प्रकार समाज और शरीर दोनों के अंगों में और कार्यों में समन्वय होता है। किसी श्रमिक के हाथ कट जाने पर उसकी जीवन क्रिया पर बहुत प्रभाव पड़ेगा। इसी तरह समाज का कोई एक भाग (कृषक, व्यापारी) काम करना बन्द कर दे तो सारे समाज पर उसका प्रभाव पड़ेगा। एच.ई. बार्नस ने लिखा है, “प्रत्येक सावयव को एक समाज मानकर चलें तो दोनों में अत्यधिक समानता मिलेगी।”

6. अंगों का अस्तित्व समाप्त होने पर समाज और शरीर समाप्त नहीं होता

शरीर का कोई भी एक अंग नष्ट हो जाये तो भी शरीर रहेगा। जैसे- हाथ कट जाने पर या आँखें चली जाने पर शरीर वैसा ही रहेगा। वैसे ही समाज में उनके कोई भी अंग, कोई भी व्यक्ति, कोई भी परिवार समाप्त हो जाये तो भी समाज बना रहेगा।

7. दोनों में समान कार्य पद्धति

शरीर में श्वास के लिए श्वसन संस्थान, भोजन के लिये पाचन संस्थान तथा ज्ञान के लिये स्नायु संस्थान हैं। इसी प्रकार समाज में उत्पादन के लिए कारखाने, विक्रय के लिये बाजार, आयात-निर्यात के लिये यातायात।संस्थान, ज्ञान के लिये शिक्षा संस्थाएँ हैं। शरीर में नियन्त्रण व्यवस्था मस्तिष्क में होती है। समाज में शासन, कानून, पुलिस आदि से नियन्त्रण रहता है। राज्य समाज का मस्तिष्क है जो सभी अंगों पर नियन्त्रण रखता है। शरीर का भी केन्द्रीयभूत मस्तिष्क है जो विभिन्न अंगों पर नियन्त्रण रखता है।

8. दोनों का निर्माण इकाइयों से

शरीर अनेक कोष्ठों (Cells) से बना है तथा समाज का निर्माण अनेक व्यक्तियों के द्वारा हुआ है। शरीर के पुराने घटकों के क्षीण हो जाने पर नये घटक अपना स्थान ले लेते हैं, उसी तरह समाज में भी बीमार वृद्ध व्यक्ति समाप्त हो जाते हैं। उनकी जगह नये बच्चे पूर्ण करते हैं। सारा शरीर किसी एक अंग पर आधारित नहीं है, उसी तरह सारा समाज भी उसके एक अंग समूह, समुदाय, परिवार, प्रथा या केवल शासन पर निर्भर नहीं है।

समाज और सावयव में अंतर/भिन्नताएँ :

स्पेन्सर ने समाज और सावयव में समानताओं के साथ-साथ भिन्नताओं का भी उल्लेख किया है। इन विभिन्नताओं को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) स्पेन्सर के अनुसार शरीर का विकास स्वतः होता है और इनमें मनुष्य की कोई भूमिका नहीं होती है, किन्तु समाज का विकास स्वतः नहीं होता है उसे तो मनुष्य अपने प्रयत्नों से विकसित करता है।

(2) शरीर में पूर्ण सत्ता है, समाज में इसका अभाव पाया जाता है।

(3) शरीर के अंग अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जिस प्रकार शरीर पर आधारित हैं, समाज के अंग इस प्रकार आधारित नहीं हैं।

(4) शरीर के अंग अपने-अपने स्थान पर स्थिर होते हैं और इनमें गतिशीलता का अभाव पाया जाता है। समाज के अंग इस प्रकार अपने स्थान पर नहीं होते हैं तथा इसमें गतिशीलता पाई जाती है।

(5) शरीर के पास केन्द्रीयभूत मस्तिष्क होता है, लेकिन समाज के पास केन्द्रीयभूत मस्तिष्क नहीं होता। शरीर एक ही मस्तिष्क से नियन्त्रित होता है, समस्त चिन्तन का एक ही केन्द्र होता है, जबकि समाज में जितने व्यक्ति हैं उतने ही मस्तिष्क तथा विचार होते हैं।

(6) शरीर के अंगों को शरीर से अलग कर देने से वे जागरूकता खो देते हैं, किन्तु समाज इसलिए स्थायी रहता है कि इससे समाज की विभिन्न इकाइयों की उन्नति होती है।

(7) शरीर के अंग पूरे शरीर के अस्तित्व के लिए जीवित रहते हैं, किन्तु समाज इसलिए स्थायी रहता है कि इससे समाज की विभिन्न इकाइयों की उन्नति होती है।

(8) शरीर की सम्पूर्ण चेतना शक्ति एक बिन्दु पर केन्द्रित रहती है, किन्तु समाज की चेतना शक्ति उसके विभिन्न अंगों में बिखरी हुई होती है।

(9) स्पेन्सर के अनुसार शरीर के अंग शरीर के लिए हैं। इसके विपरीत समाज व्यक्ति के लिए है।

(10) शरीर महत्वपूर्ण है पर उसके अंगों का अलग से महत्व कम है, जबकि समाज में व्यक्ति अधिक महत्वपूर्ण है और समाज कम महत्वपूर्ण है।

सावयवी समानता के सिद्धान्त की आलोचनाएँ :

(1) स्पेन्सर का समाज तथा सावयव की सादृश्यता का सिद्धान्त मौलिक नहीं है, क्योंकि इससे पहले भी समाज और शरीर की समानता पर प्लेटो, अरस्तू आदि ने अपने विचार प्रकट किये हैं।

(2) स्पेन्सर का यह कहना कि समाज एक सावयव है, गलत है।

(3) स्पेन्सर ने मनुष्य को समाज का अंग बताकर उसकी स्वतन्त्रता समाप्त कर दी है।

(4) आलंकारिक दृष्टि से भले ही हम समाज की तुलना एक जीवित प्राणी से कर दें पर वास्तविकता यह है कि दोनों में तात्विक भेद हैं तथा जो कुछ सादृश्य (Analogy) है, वह आंशिक ही है। सादृश्य-अनुमान कभी यथार्थ निष्कर्ष की ओर नहीं ले जाता। उसके निष्कर्ष सम्भाव्य ही होते हैं।

(5) एच.ई.बार्नस ने लिखा है, “स्पेन्सर का यह सामाजिक सावयवी सिद्धान्त रुचिकर अवश्य है पर सामाजिक प्रक्रियाओं का विश्लेषण करने की दृष्टि से इसका कोई मूल्य नहीं है।”

(6) मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज से अलग उसका अस्तित्व सम्भव नहीं है।

The premier library of general studies, current affairs, educational news with also competitive examination related syllabus.

Related Posts

# सिद्धान्त निर्माण का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं, महत्व | सिद्धान्त निर्माण के प्रकार | Siddhant Nirman

सिद्धान्त निर्माण : सिद्धान्त वैज्ञानिक अनुसन्धान का एक महत्वपूर्ण चरण है। गुडे तथा हॉट ने सिद्धान्त को विज्ञान का उपकरण माना है क्योंकि इससे हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण…

# पैरेटो की सामाजिक क्रिया की अवधारणा | Social Action Theory of Vilfred Pareto

सामाजिक क्रिया सिद्धान्त प्रमुख रूप से एक प्रकार्यात्मक सिद्धान्त है। सर्वप्रथम विल्फ्रेडो पैरेटो ने सामाजिक क्रिया सिद्धान्त की रूपरेखा प्रस्तुत की। बाद में मैक्स वेबर ने सामाजिक…

# सामाजिक एकता (सुदृढ़ता) या समैक्य का सिद्धान्त : दुर्खीम | Theory of Social Solidarity

दुर्खीम के सामाजिक एकता का सिद्धान्त : दुर्खीम ने सामाजिक एकता या समैक्य के सिद्धान्त का प्रतिपादन अपनी पुस्तक “दी डिवीजन आफ लेबर इन सोसाइटी” (The Division…

# पारसन्स के सामाजिक स्तरीकरण का सिद्धान्त | Parsons’s Theory of Social Stratification

पारसन्स का सिद्धान्त (Theory of Parsons) : सामाजिक स्तरीकरण के प्रकार्यवादी सिद्धान्तों में पारसन्स का सामाजिक स्तरीकरण का सिद्धान्त एक प्रमुख सिद्धान्त माना जाता है अतएव यहाँ…

# मैक्स वेबर के सामाजिक स्तरीकरण का सिद्धान्त | Maxweber’s Theory of Social Stratification

मैक्स वेबर के सामाजिक स्तरीकरण के सिद्धान्त : मैक्स वेबर ने अपने सामाजिक स्तरीकरण के सिद्धान्त में “कार्ल मार्क्स के सामाजिक स्तरीकरण सिद्धान्त” की कमियों को दूर…

# कार्ल मार्क्स के सामाजिक स्तरीकरण का सिद्धान्त | Karl Marx’s Theory of Social Stratification

कार्ल मार्क्स के सामाजिक स्तरीकरण का सिद्धान्त – कार्ल मार्क्स के सामाजिक स्तरीकरण का सिद्धान्त मार्क्स की वर्ग व्यवस्था पर आधारित है। मार्क्स ने समाज में आर्थिक आधार…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

six + five =