# समाजशास्त्र और मूल्य | Samajshastra Aur Mulya

समाजशास्त्र और मूल्य :

मूल्य वे संस्कृति अथवा व्यक्तिगत धारणाएं एवं आदर्श है जिनके द्वारा वस्तुओं और घटनाओं की एक-दूसरे के साथ तुलना की जाती है। ये वे व्यवहार के पैमाने है जिनके आधार पर अच्छे बुरे, वांछित-अवांछित, सही-गलत आदि का निर्णय किया जाता है; जैसे- न्याय स्वतन्त्रता, देशभक्ति, अंहिसा, सत्य और समानता आदि मूल्यों के उदाहरण है।

एक विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र काे मूल्य-निरपेक्ष माना जाता है। मूल्य-निरपेक्ष विज्ञान का अर्थ यह है कि समाजशास्त्र काे विज्ञान के रूप में स्वयं काे सामाजिक मूल्यों के प्रश्न से अलग रखकर सामाजिक व्यहवार का अध्ययन आनुभाविक ढ़ंग से करना चाहिए। समाजशास्त्र का यह कार्य नहीं है कि वह सामाजिक मूल्यों की श्रेष्ठता अथवा अश्रेष्ठता का वर्णन करे, इसका उद्देश्य केवल सामाजिक संस्थाओं का आनुभाविक विश्लेषण मात्र करना है, न कि मूल्यांकन करना। ‘क्या होना चाहिए’ का प्रश्न समाजशास्त्र का नहीं अपितु मूल्य का है, समाजशास्त्र केवल ‘क्या है’ से सम्बन्ध रखता है। मूल्यों काे आनुभाविक परीक्षण नहीं किया जा सकता है अतः वैज्ञानिक शोध काे मूल्य-निरपेक्ष होना चाहिए।

वेबर ने स्पष्ट किया है कि उसका अभिप्राय यह नहीं है कि सभी मूल्य-निर्णयों को वैज्ञानिक विमर्श से निकाल दिया जाए, उसका अभिप्राय केवल इतना है कि मूल्य निर्णयों के क्षेत्र में विज्ञान का स्थान सीमित है।

वेबर ने कहा – “मूल्यों के बारे में निर्णय करना विज्ञान का कार्य नहीं है यह कार्य ताे इच्छुक एवं क्रियारत व्यक्ति का है। जो संसार के प्रति अपने दृष्टिकाेण एवं अन्तः करण के अनुसार विभिन्न मूल्यों में से अपनी पसन्द के मूल्य का चयन करता है। यह उसका व्यक्तिगत मामला है। जिसमें आनुभाविक ज्ञान की अपेक्षा इच्छा एवं अन्तःकरण निहित है।

वस्तुतः मूल्यों के अध्ययन काे समाजशास्त्र के विषयक्षेत्र से बाहर नहीं निकाला जा सकता है। कार्ल मानहीम तथा अन्य समाजशास्त्रियाें का विचार है कि मूल्य व्यक्तित्व के भाग हैं जिन्हें उसी प्रकार उतार कर नहीं फेंका जा सकता जैसे मनुष्य अपने कपड़ाें काे उतार देता है। वे हमको शोध के सभी स्तराें यथा शोध-विषय के चयन, परिणामाें की व्याख्या तथा परिणामाें काे समाज के लिए लाभप्रद ढ़ंग से प्रयोग करने‌ के बारे में सुझावों आदि के सन्दर्भ में प्रभावित करते है। समाजशास्त्र विशुद्ध वर्णनात्मक विज्ञान नहीं है, किसी न किसी रूप में मूल्यांकन का तत्व इसमें प्रवेश कर ही जाता है।

गुन्नार मिर्डल ने निष्कर्षस्वरूप कहा कि तथ्यों के वैज्ञानिक पर्यवेक्षण तथा उनके कारणीय अन्तः सम्बन्धों का विश्लेषण करने में मूल्य पूर्वकथनों की आवश्यकता की बात करना पूर्णतः मूर्खता है। ऐसा विज्ञान न कभी था न कभी होगा। इसके बावजूद अपने अध्ययन काे तर्कयुक्त बनाने का प्रयास कर सकते है लेकिन श्र मूल्यांकनाें का सामना करके उनसे दूर भाग कर नहीं।

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