# मूल्यांकन का अर्थ, परिभाषाएं, उद्देश्य, विशेषताएं, महत्व, उपयोगिता, प्रमुख सोपान

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मूल्यांकन का अर्थ :

अपनी शाब्दिक रचना के अनुकूल ही मूल्यांकन का अर्थ है ‘मूल्य का अभिनिश्चय करना‘। अतएव मूल्यांकन किसी भी वस्तु, विषय, व्यक्ति तथा स्थिति का मूल्य अंकन करने का वैज्ञानिक प्रक्रम है। इस शब्द के साथ मूल्यांकित वस्तु के गुण-दोषों के सम्बन्ध में एक समुचित तथा सही निर्णय ले सकने का निहितार्थ संयुक्त रहता है। व्यक्ति एक सतत् विकासशील प्राणी है, मूल्यांकन समूची शैक्षिक प्रक्रिया का एक समाकलित अंग है। वह अध्यापन-अधिगम की प्रत्येक गतिविधि के साथ समवेत रूप से चलता है तथा एकैक इकाई के अन्त में प्रति पाठ की समाप्ति पर अथवा किसी पाठ की अवधि में भी अध्यापक की संवीक्षक दृष्टि द्वारा हो सकता है। सतत् विकासशील व्यक्ति के गत्यात्मक व्यक्तित्व के कई परिवर्तन बिन्दुओं पर विभिन्न पक्षों में अनेक उपकरणों के द्वारा विविध प्रकार से किये गये अंकन का समाकलित स्वरूप ही मूल्यांकन कहलाता है।

मूल्यांकन का नवीन सम्प्रत्यय :

नवीन सम्प्रत्यय के अनुसार शैक्षिक प्रक्रिया के निम्नलिखित तीन प्रमुख अंग हैं-

1. शिक्षण उद्देश्य एवं प्रयोजन अर्थात् बालकों को किस लिए और क्या सिखाया जाता है ?

2. अध्ययन-अध्यापन परिस्थितियाँ अर्थात् बालकों को जो सिखाना है, उसे किस-किस स्वरूप में प्रस्तुत किया जाये ?

3. मूल्यांकन अर्थात् जो कुछ उद्देश्यों और प्रयोजनों के अनुसार सिखाया गया है। बालक उसे किस सीमा तक ग्रहण कर पाये हैं ?

शैक्षिक प्रक्रिया के ये तीनों अंग परस्पर घनिष्ठता से सम्बन्धित हैं। इन तीनों में से किसी एक की सम्पूर्ण शेष रहने पर शिक्षण सम्पूर्ण नहीं होता।

मूल्यांकन की परिभाषाएं :

टारगर्सन तथा एडम्स के शब्दों में- “मूल्यांकन करना किसी वस्तु या प्रक्रिया के महत्त्व को निर्धारित करना है, इस प्रकार शैक्षिक मूल्यांकन शिक्षण प्रक्रिया या सीखने युक्त अनुभव के औचित्य की मात्रा पर निर्णय प्रदान करता है।”

डॉ. जी. पी. शेरी के अनुसार- “शिक्षा कार्यक्रम ने शिक्षा के उद्देश्यों की कितनी पूर्ति की है, यह पता लगाना ही मूल्यांकन है।”

डॉ. रामशकल पाण्डेय के शब्दों में- “बालक ने कितना ज्ञान अर्जित कर लिया है तथा कितना अभी अर्जित करना है, उसके व्यवहार में कितना संशोधन हुआ और कितना संशोधन करना शेष है? आदि बातें बालक के अर्जित ज्ञान एवं व्यवहार की जाँच करके ही पता चल सकती है। इस प्रकार अर्जित ज्ञान संशोधित व्यवहार की परख करने की प्रक्रिया को मूल्यांकन के नाम से सम्बोधित किया जाता है।”

जे. डब्ल्यू राइटस्टोन के शब्दों में- “मूल्यांकन सापेक्षिक रूप से नवीन प्राविधिक पद है, जिसका प्रयोग मापन की धारणा को परम्परागत जाँचों एवं परीक्षाओं की अपेक्षा अधिकाधिक व्यापक रूप में व्यक्त करने के लिए किया गया है।”

क्विलैन तथा हन्ना के शब्दों में- “विद्यालय में हुए छात्रों के व्यवहार परिवर्तन के सम्बन्ध में प्रदत्तों के संकलन तथा उनकी व्याख्या करने की प्रक्रिया को मूल्यांकन कहते हैं।”

मूल्यांकन आधुनिक शिक्षा प्रणाली में एक क्रमिक प्रक्रिया है जो ‘शिक्षा के उद्देश्य‘ ‘सीखने के अनुभव‘ तथा ‘मूल्यांकन के साधनों‘ के मध्य निरन्तर चलती रहती है। उद्देश्य, अनुभव एवं मूल्यांकन एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं तथा उच्च स्तर की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। संक्षेप में, “जिस साधन द्वारा हमें यह ज्ञात हो कि कार्य की समाप्ति पर पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति किस सीमा तक हुई है, उसे हम मूल्यांकन कहते हैं।”

मूल्यांकन में व्यक्तित्व सम्बन्धी परिवर्तनों एवं शैक्षिक कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्यों पर बल दिया जाता है। इसमें केवल पाठ्य वस्तु की निरूपित ही निहित नहीं है वरन् वृत्तियों, रुचियों, आदर्शों, सोचने के ढंग, कार्य करने की आदतें तथा वैयक्तिक एवं सामाजिक अनुकूलता भी निहित है। इस प्रकार हम देखते हैं कि मूल्यांकन का व्यापक क्षेत्र है, जिसके अन्तर्गत बालकों के समस्त पक्ष शारीरिक, मानसिक, नैतिक आदि मूल्यांकन हेतु आते हैं।

वास्तव में ज्ञानार्जन की वस्तुनिष्ठता तथा व्यावहारिकता पर अधिक बल दिया जाता है परन्तु वर्तमान शिक्षा पद्धति में विषयगत निष्ठा पर बल दिया जाता है। उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि – (i) मूल्यांकन निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। (ii) छात्रों के व्यवहार सम्बन्धी सामग्री परन्तु वर्तमान एकत्रित करने का साधन है। (iii) शिक्षा के उद्देश्यों से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है। (iv) मूल्यांकन निर्देश की उपलब्धि को ही नहीं मानता वरन् इसे उन्नत भी बनाता है।

मूल्यांकन के उद्देश्य :

विद्यार्थियों का मूल्यांकन किसी न किसी रूप में आवश्यक होता है, प्रमुख रूप से इसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

1. छात्र की प्रगति में सहायक

इसके आधार पर किसी छात्र या व्यक्ति को अगली कक्षा में कक्षोन्नति देकर चढ़ाया जाता है जिससे शिक्षार्थियों की क्षमता और सीमाओं का पता चलता है।

2. छात्रों का वर्गीकरण

मूल्यांकन के आधार पर छात्रों के अनुसार वर्गीकरण कर उन्हें कार्य दिया जा सकता है। साथ ही उनकी शिक्षा व्यवस्था के मनोवैज्ञानिक रूप में परिवर्तन किया जा सकता है।

3. पाठ्यक्रम में परिवर्तन

पाठ्यक्रम में कौन-से अंश छात्रों के अनुकूल हैं तथा कौन से प्रतिकूल हैं। इस बात की जानकारी मूल्यांकन से ही सम्भव है, अतः पाठ्यक्रम को घटाया-बढ़ाया जा सकता है।

4. निर्देशन

इसके आधार पर छात्र की रुचियों तथा योग्यताओं का पता लगाकर विषयों को पढ़ने के लिए निर्देशित किया जाता है। यह निर्देशन भी दो प्रकार का होता है— (i) शैक्षिक, (ii) व्यावसायिक। शैक्षिक मूल्यांकन में शिक्षा के अन्तर्गत उसकी रुचियों के अनुकूल व्यवसाय चुनने का सुझाव दिया जाता है।

5. वैधता

मूल्यांकन से ही छात्र की वैधता का पता चलता है।

6. विश्वसनीयता

मूल्यांकन पूर्णतः विश्वसनीय होना चाहिए। कहने का आशय है, यदि उसी अध्यापक द्वारा अथवा अन्य अध्यापक द्वारा लम्बे समय बाद किसी परीक्षार्थी का मापन एवं मूल्यांकन किया जाय तो उसे वही स्थान मिलना चाहिए, जो सर्वप्रथम मिला था।

7. छात्रों की त्रुटियों तथा योग्यताओं की जानकारी

मूल्यांकन के आधार पर कमजोर छात्रों को विषय से अवगत कराकर उन्हें सचेत किया जाता है। इस प्रकार परीक्षा का स्वरूप निदानात्मक हो जाता है। साथ ही योग्य छात्र का परीक्षा के आधार पर भविष्य के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है कि अमुक विषय उसका उत्तम है।

8. शिक्षण विधियों की उपादेयता

इसके द्वारा हमें शिक्षण विधियों की उपादेयता और सीमाओं का ज्ञान हो जाता है।

मूल्यांकन की विशेषताएं :

मूल्यांकन प्रक्रिया की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

1. इसके द्वारा सीखे हुए अनुभवों तथा व्यवहार सम्बन्धी परिवर्तनों के साधनों का संकलन किया जाता है।

2. यह निर्णयात्मक प्रक्रिया है।

3. यह एक निरन्तर तथा सामाजिक प्रक्रिया है।

4. इसमें अव्यावहारिक परिवर्तनों तथा अनुभवों की उपादेयता का निर्णय किया जाता है।

5. मूल्यांकन प्रक्रिया छात्रों को अपनी प्रगति एवं दोषों से परिचित कराती है तथा उन्हें और अधिक सीखने के लिए प्रेरणा प्रदान करती है।

6. शिक्षक को इसके माध्यम से अपनी शिक्षण विधि की प्रभावपूर्णता की मात्रा अथवा सफलता-असफलता का बोध हो जाता है तथा वह तद्नुसार आगामी शिक्षण प्रक्रिया का निर्धारण करता है।

7. फलतः मूल्यांकन शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों की दृष्टि में उपयोगी है।

8. मूल्यांकन विभेदकारी होता है अर्थात् औसत पिछड़े तथा मेधावी छात्रों में विभेद कर सकता है।

9. इसमें विश्वसनीयता एवं वैधता होती है।

10. यह व्यापक होता है, अर्थात् समस्त प्रकरणों पर सम्बन्धित प्रश्न होते हैं।

11. अच्छे मूल्यांकन द्वारा समय की बचत होती है तथा रटने की आदत भी दूर होती है।

12. मूल्यांकन ऐसा हो, जिसमें अंक प्राप्ति के पश्चात् कोई छात्र रुष्ट न हो।

13. जिस स्तर पर मूल्यांकन कर रहे हैं उसी स्तर का प्रश्न-पत्र होना चाहिए, निम्न एवं उच्च नहीं अर्थात् विधानुसार प्रश्न-पत्र का निर्माण होना चाहिए।

14. मूल्यांकन ऐसा हो, जिस पर परीक्षक की मानसिक स्थिति, रुचि, अभिवृत्ति तथा सुलेख का कोई प्रभाव न पड़े।

मूल्यांकन का महत्त्व :

मूल्यांकन का महत्त्व एवं उपयोगिताएँ निम्नलिखित दृष्टिकोणों से है-

1. अध्यापक के दृष्टिकोण से

अध्यापक को मूल्यांकन से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते है –

  1. मूल्यांकन द्वारा अध्यापक को यह ज्ञात हो जाता है कि उसे अपने शिक्षण कार्यों द्वारा शिक्षण-उद्देश्यों को कितना और पूरा करना है।
  2. अध्यापक को यह भी ज्ञात जाता है कि उसका शिक्षण कहाँ तक सफल रहा है।
  3. छात्रों की योग्यताओं और उपलब्धियों के आधार पर वर्गीकरण सफलता से किया जा सकता है।
  4. मूल्यांकन द्वारा पाठ्यक्रम निर्माण में भी सुविधा रहती है।

2. छात्रों के दृष्टिकोण से

छात्रों को मूल्यांकन से निम्नलिखित लाभ होते हैं-

  1. छात्र मूल्यांकन के परिणामों से अवगत होकर और अधिक श्रम करते हैं।
  2. छात्रों को यह ज्ञात हो जाता है कि उसमें कितनी योग्यता है और उन्होंने किस सीमा तक अध्ययन किया है।
  3. उन्हें आत्म प्रकाशन और भाव प्रकाशन के अच्छे अवसर प्राप्त होते हैं।

3. विद्यालय के दृष्टिकोण से

मूल्यांकन द्वारा विद्यालय को निम्नलिखित लाभ होते हैं-

  1. मूल्यांकन द्वारा विद्यालय अपने उद्देश्य की प्रगति का ज्ञान प्राप्त करता है।
  2. विद्यालय को यह ज्ञात होता है कि अध्यापकों का क्या श्रम और स्तर है तथा प्रधानाध्यापक की क्या व्यवस्था है ?
  3. विद्यालय मूल्यांकन के आधार पर शिक्षण की विभिन्न सुविधाएँ जुटाता है।

4. समाज के दृष्टिकोण से

समाज भी मूल्यांकन से निम्नलिखित लाभ उठा सकता है-

  1. माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार- “मूल्यांकन वह प्रमुख साधन है जिससे समाज को यह विश्वास होता है कि विद्यालय को प्रदान किया गया कार्य सन्तोषजनक ढंग से पूरा किया जा रहा है और वे बालक जो वहाँ अध्ययन कर रहे हैं, समुचित प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं तथा आशाजनक स्तर को प्राप्त कर रहे हैं।”
  2. मूल्यांकन द्वारा समाज को यह पता चलता है कि उसके द्वारा स्थापित संस्थाएँ सामाजिक आवश्यकताओं और उद्देश्यों की पूर्ति किस सीमा तक कर रही हैं ?
  3. मूल्यांकन द्वारा परिणामों के आधार पर समाज विद्यालय की आर्थिक तथा अन्य सुविधाएँ प्रदान करता है। मूल्यांकन प्रक्रिया के माध्यम से शिक्षण व्यूह रचना में सुधार तथा विकास किया जाता है तथा अनावश्यक अधिगम स्रोतों को भी हटाया जा सकता है।
  4. मूल्यांकन द्वारा विद्यालय में कार्यरत, शिक्षकों, प्रधानाध्यापक व संरक्षकों को विद्यार्थियों की उपलब्धि एवं प्रगति की स्पष्ट जानकारी मिलती है तथा शिक्षण कार्य और विद्यार्थियों से सम्बद्ध सामाजिक, भावनात्मक तथा शैक्षणिक समस्याओं के निदान एवं उपचारात्मक कार्य किये जा सकते हैं। विद्यालय के स्थायी रिकार्ड (अभिलेखों) के लिए विद्यार्थियों से सम्बन्धित आँकड़े एकत्रित करने में सहायता मिलती है जिनके आधार पर विद्यार्थियों को अतिरिक्त परामर्श की आवश्यकता का निर्धारण करने में सुविधा रहती है।
  5. शिक्षण में मूल्यांकन की प्रक्रिया जानने के लिए यह आवश्यक है कि हम शिक्षण के उद्देश्यों, पाठ्यक्रम तथा मूल्यांकन विधियों से पूर्ण परिचित हो। अतः शिक्षण के उद्देश्यों का जानना व निर्धारण करना आवश्यक होगा जो कि प्रचलित पाठ्यक्रम पर आधारित है ।

शैक्षिक प्रक्रिया में मूल्यांकन की उपयोगिता :

विद्यालय में शैक्षिक प्रक्रिया के जिन पक्षों के सुधार हेतु मूल्यांकन की उपयोगिता है, वे निम्नलिखित हैं-

  1. विद्यार्थियों की व्यक्तिगत कमजोरी एवं क्षमताओं का पता लगाने के लिए।
  2. विद्यार्थियों की अभिवृत्तियों एवं रुचियों का पता लगाने के लिए।
  3. विद्यार्थियों में सीखने की प्रक्रिया को उत्प्रेरित करने के लिए।
  4. विद्यार्थियों को उनकी अध्ययन योजना निर्माण में दिशा निर्देश देने तथा मूल्यांकन के आधार पर पाठ्यक्रम, पाठ्यक्रम में परिवर्तन करने के लिए।
  5. विद्यालय में कार्यरत शिक्षकों, प्रधानाध्यापक तथा संरक्षकों का विद्यार्थियों की उपलब्धि एवं प्रगति की स्पष्ट जानकारी देने के लिए।
  6. निर्धारित पाठ्यक्रम, पाठ्य पुस्तक और उद्देश्यों की सम्पूर्ति के लिए।
  7. विद्यार्थियों को अतिरिक्त परामर्श की आवश्यकताओं का निर्धारण करने के लिए।
  8. शिक्षण कार्य एवं विद्यार्थियों से सम्बद्ध सामाजिक, नैतिक, शारीरिक तथा शैक्षणिक समस्याओं के निदान एवं उपचार के लिए।
  9. शिक्षक द्वारा अपनाई गई शिक्षण विधियों की उपयुक्तता के लिए ज्ञान प्राप्त होता है जिससे शिक्षा में प्रगति की सम्भावना होती है।
  10. विद्यालय के स्थायी रिकार्ड (अभिलेखों) के लिए विद्यार्थियों से सम्बन्धित आँकडे एकत्रित करने के लिए।

मूल्यांकन प्रक्रिया के प्रमुख सोपान :

मूल्यांकन की उद्देश्यनिष्ठ प्रक्रिया निम्नलिखित तीन सोपानों में क्रियान्वित की जाती है –

1. शिक्षण उद्देश्यों को निर्धारित एवं परिभाषित करना

शिक्षण के उद्देश्यों के अनुरूप ही शिक्षण की व्यवस्था, नियोजन, संगठन एवं मार्गदर्शन किये जाते हैं। शिक्षण की प्रभावकारिता और सफलता के लिए उद्देश्यों के निर्धारण के समय इन बातों की ओर ध्यान देने से शिक्षण में सफलता की भावना (सम्भावनाएँ) बढ़ जाती है; जैसे—छात्रों की वैयक्तिक विभिन्नता, सामाजिक आदर्श एवं आवश्यकताएँ, विषयवस्तु की प्रकृति, शिक्षा का स्तर, मनोवैज्ञानिक नियम एवं सिद्धान्त आदि के शिक्षण के उद्देश्यों को व्यावहारिक शब्दावली में परिभाषित करना चाहिए।

2. अधिगम-अनुभवों का निर्माण एवं प्रस्तुतीकरण शिक्षण व्यवस्था अधिगम

अनुभव वे साधन हैं जिनके द्वारा अपेक्षित शिक्षण उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता मिलती है। शिक्षण अनुभवों को प्रस्तुत करने से ही छात्रों के व्यवहारों में अपेक्षित परिवर्तन सम्भव हो पाता है। अधिगम अनुभव शिक्षण के उद्देश्य से स्पष्टता और सीधे सम्बद्ध होने चाहिए। उन्हें छात्रों की परिपक्वता, मानसिक योग्यता एवं रुचियों के अनुरूप होना चाहिए। इससे छात्र अधिकाधिक सक्रिय होकर सफलता अनुभव कर सकेंगे। फलतः निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उपयुक्त अधिगम अनुभव देने हेतु पाठ्यक्रमानुसार शिक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए।

3. व्यावहारिक परिवर्तन के आधार पर मूल्यांकन करना

मूल्यांकन के साधन (उपकरण) और विधियों (तकनीकों) को अपनाकर विद्यार्थियों की उपलब्धि या ज्ञानोपार्जन अथवा व्यावहारिक परिवर्तन का मूल्य आंकना । क्योंकि शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य छात्रों में अभीष्ट व्यवहारगत परिवर्तन लाना है। यह कार्य विद्यालय के शैक्षिक वातावरण एवं शिक्षण द्वारा प्रदत्त अधिगम अनुभवों में माध्यम से सम्पन्न होता है। छात्रों में व्यवहारगत परिवर्तन के अन्तर्गत उसके व्यवहार के तीनों आयाम (ज्ञानात्मक, भावात्मक, क्रियात्मक) को जाँचना होता है जोकि परस्पर सम्बन्धित होते हैं। व्यवहारगत परिवर्तन के मूल्यांकन हेतु विभिन्न तकनीकों का प्रयोग होता है।

मूल्याकंन के लिए निम्नलिखित सोपानों की आवश्यकता होती है :

1. सर्वप्रथम शैक्षिक उद्देश्यों को निर्धारित किया जाता है।

2. इसके पश्चात् निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों की व्याख्या बालक के व्यवहार के रूप में की जाती है अर्थात् निर्धारित विषय-वस्तु का सम्बन्ध व्यवहारगत परिवर्तन के साथ हो जाता है।

3. क्रमशः परिस्थितियों को निश्चित किया जाता है तथा पहचान की जाती है जिससे छात्रों की अपेक्षित परिवर्तन की जानकारी प्राप्त हो जाती है। इसके लिए कभी-कभी नियन्त्रित परिस्थितियों का निर्माण भी करना पड़ता है।

4. उपयुक्त जाँच को अन्य विधियों के द्वारा भी प्रमाणित किया जाता है।

5. उपयुक्त मूल्यांकन के आधार से प्राप्त सूचनाओं तथा प्रमाणों (साक्ष्यों) को लिखा जाता है तथा उनका व्यापक विश्लेषण किया जाता है, ताकि यह ज्ञात किया जा सके कि छात्रों में किस सीमा तक अपेक्षित परिवर्तन हुआ है।

शैक्षिक मूल्यांकन की विशेषताएं :

किसी मूल्यांकन पद्धति को उद्देश्यनिष्ठ एवं वस्तुनिष्ठ बनाकर उसकी विशेषताओं से युक्त कहा जा सकता है। इस प्रकार अच्छे परीक्षण की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. वस्तुनिष्ठता

मूल्यांकन की सबसे पहली विशेषता उसकी वस्तुनिष्ठता है। मूल्यांकन में वस्तुनिष्ठता दो प्रकार की होती है- (1) प्रमापीकृत वस्तुनिष्ठता तथा (2) अध्यापक निर्मित वस्तुनिष्ठता, वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन द्वारा छात्रों की विषय-वस्तु जाँच की जाती है तथा इसका उपयोग बालक के ज्ञानार्जन का मापन करने के लिए किया जाता है।

इस प्रकार किया जाना मूल्यांकन विश्वसनीय, वैध वस्तुनिष्ठ, व्यापक और व्यावहारिक होता है तथा मितव्ययी होने के साथ-साथ अंक प्रदान करने में सुगमता भी रहती है। इस परीक्षा प्रणाली में कोई भी मूल्यांकन करे तो छात्र का मूल्यांकन सदैव बराबर ही रहे। मापन पक्षपात रहित रहता है। परीक्षा या मापन के अंकन में किसी भी प्रकार की आत्मनिष्ठता का समावेश न हो। निबन्धात्मक परीक्षा वस्तुनिष्ठ नहीं होती तथा अलग-अलग परीक्षकों के अंकों में अन्तर आता है।

2. विश्वसनीयता

कोई भी परीक्षा विश्वसनीय तभी कही जा सकती है जब किसी विद्यार्थी की उत्तर-पुस्तिका की बार-बार जाँच करने पर उसके मापन में कोई अन्तर नहीं आता। परीक्षा विभिन्न व्यक्तियों द्वारा आयोजित होने पर भी किसी विद्यार्थी का मापन सदैव एक सा रहता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि, विश्वसनीय परीक्षा वही कही जा सकती है जिसमें एक छात्र की उत्तर-पुस्तिका में अलग-अलग समयों पर परीक्षक समान अंक प्रदान करें।

दूसरे शब्दों में, जब एक ही परीक्षा को समान परिस्थितियों में एक ही समूह को विभिन्न अवसरों पर देने पर उनके अंक समान आते हों, तब उस परीक्षा को विश्वसनीय माना जाता है। निबन्धात्मक परीक्षाओं की अपेक्षा वस्तुनिष्ठ परीक्षा अधिक विश्वसनीय होती है। मूल्यांकनकर्ता के परिवर्तित होने पर भी विश्वसनीय उपकरण द्वारा व्यक्ति लक्षण के मापन अन्तर आने की आशंका नहीं होनी चाहिए। मूल्यांकन की इस अपेक्षित सुसंगति हेतु उपकरण की परिशुद्धता तथा सूक्ष्मता एक पूर्वविषयक लक्षण है।

3. वैधता या प्रमाणिकता

किसी परीक्षा की वैधता से तात्पर्य यह है कि यह कितनी शुद्धता तथा सार्थकता से किसी विद्यार्थी की योग्यता का मापन करती है अर्थात कोई भी प्रविधि अथवा परीक्षण उस सीमा तक वैध है जिस सीमा तक वह उसी वस्तु या घटना को मापता है जिसके लिए उसका निर्माण किया गया है। इस प्रकार जब मूल्यांकन द्वारा अभीष्ट लक्ष्य का ही मूल्यांकन प्राप्त होता है तभी उसे वैध कहा जाता है।

वैधता का अत्यन्त सरल निहितार्थ है। अर्थपूर्ण उपयोगिता जो वस्तु उपकरण अथवा यन्त्र जिस विशिष्ट उद्देश्य हेतु निर्मित होता है, उसे यदि वह पूर्ण करता हो तो हम कह सकते हैं कि वह उस उद्देश्य के लिए वैध है।

4. विभेदकारिता

कोई भी परीक्षा विभेदकारी तब कहलायेगी जब उसमें सभी प्रकार के स्तरों के छात्रों के अनुकूल प्रश्न हों। मन्द बुद्धि, प्रखर बुद्धि तथा औसत आदि सभी छात्रों के लिए परीक्षा में समावेश हो अर्थात् सभी प्रकार के स्तरों को प्रतिभावान सामान्य और कमजोर छात्रों के बीच भेद करने वाली परीक्षा होनी चाहिए।

5. व्यापकता

व्यापकता से अभिप्राय है कि योग्यता के मापन लिए प्रश्नों का समावेश परीक्षा में हो। परीक्षा में दिये गये प्रश्न सम्पूर्ण पाठ्यक्रम से सम्बन्धित हों । उद्देश्य शिक्षण विधि, विषयवस्तु एवं मूल्यांकन एक-दूसरे पर आश्रित हों तथा पूर्ण हों न कि पृथक्-पृथक्। एक अच्छी परीक्षा द्वारा पूर्व निर्धारित उद्देश्यों में से अधिक से अधिक उद्देश्यों का परीक्षण होना चाहिए।

6. परीक्षा लेने में सरलता

परीक्षा लेने के लिए निर्धारित नियम तथा निर्देश आदि सीधे और आसान होते हैं, जो आसानी से समझे और प्रयोग में लाये जा सकते हैं साथ ही ऐसी परीक्षा लेने में किसी विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं होती।

7. मूल्यांकन में सुगमता

वस्तुनिष्ठ परीक्षण का मूल्यांकन बहुत कम समय में हो जाता है क्योंकि उत्तर निश्चित और छोटे होते हैं तथा मूल्यांकन के लिए कुंजी बनी होती है जिनकी सहायता से मूल्यांकन में अधिक समय नहीं लगता।

8. व्यावहारिक तथा उपयोगी

वह परीक्षा उपयोगी तथा व्यावहारिक होगी जिसमें इस प्रकार के प्रश्नों का समावेश हो जिन्हें छात्र समझ सकें और उत्तर दे सकें। अध्यापकों को भी इस प्रकार की परीक्षा में अंक प्रदान करने में कठिनायी नहीं होगी अर्थात् जिस उद्देश्य के लिए परीक्षा ली जा रही है उस उद्देश्य की पूर्ति करे। वस्तुनिष्ठ परीक्षा के परिणामों को आधार पर छात्रों को शैक्षणिक तथा व्यावसायिक निर्देशन दिया जा सकता है। मूल्यांकन की व्यावहारिकता का अभिप्राय है परीक्षण की रचना, प्रयोग, अंकन प्राप्त प्रदत्तों की व्याख्या एवं निष्कर्ष निकालने की विधि और प्रक्रिया में सरलता होना। किसी भी परीक्षा की रचना छात्रों के अधिगम उपलब्धियों के लिए की जाती है अतः परीक्षा (मूल्यांकन कार्य) छात्र एवं शिक्षक दोनों के लिए सुविधाजनक एवं व्यावहारिक होना चाहिए। बतायी गयी इस विशेषताओं के साथ निम्नलिखित बातों पर भी ध्यान देना एवं देखा जाना अपेक्षित है-

1. मूल्यांकन कार्य नियमित होना चाहिए।

2. मूल्यांकन अधिगम स्तरोन्नयन करने वाला हो।

3. शिक्षण में विभिन्न विधाओं को प्रोत्साहित करने वाला हो।

4. मूल्यांकन कार्य नैदानिक एवं उपचारात्मक होना चाहिए।

शैक्षिक मूल्यांकन के गुण :

1. शक्षिक मूल्यांकन वैयक्तिक होता है। उससे प्रत्येक बालक द्वारा सीखी गयी एवं नहीं सीखी गयी बातों का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त होता है।

2. शैक्षिक मूल्यांकन का दृष्टिकोण सुधारवादी होता है। इसके अन्तर्गत बालक को अपनी प्रतिभा को विकसित करने का अवसर होता है।

3. मूल्यांकन साध्य नहीं है, यह अन्तिम उद्देश्य भी नहीं है। इसका प्रमुख उद्देश्य किये गये कार्य की पूर्ति की सीमा ज्ञात करना है। शिक्षक द्वारा पढ़ाये गये बिन्दुओं में से बालक ने कितने बिन्दु सीखे। इसे हम सम्प्राप्ति या उपलब्धि को ज्ञात करना कह सकते हैं।

4. शैक्षिक मूल्यांकन लचीला होता है अर्थात् एक बार निर्मित मूल्यांकन साधन प्रश्न-पत्र या परख पत्र आदि को कठोरता के साथ प्रयुक्त करने की अपेक्षा उसमें आवश्यकतानुसार सुधार करने की स्थिति बनी रहती है।

5. शैक्षिक मूल्यांकन द्वारा बालक को पूर्ण या शत-प्रतिशत सीखने की ओर अग्रसर किया जाता है जिसके फलस्वरूप बालक प्रेरित होकर अधिगम की ओर उन्मुख होता है।

6. शैक्षिक मूल्यांकन इस बात की सूचना देता है कि शिक्षक की कौन-सी विधि किस विषय में किस बालक के लिए उपयुक्त है और कौन-सी अनुपयुक्त।

7. मूल्यांकन सतत होने वाली प्रक्रिया है। अतः सीखने के साथ-साथ सतत् मूल्यांकन होते रहना भी आवश्यक है। शैक्षिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए छात्रों को अधिगम अनुभव प्रदान किये जाते हैं। अधिगम अनुभवों द्वारा छात्रों में व्यवहार-परिवर्तन सम्भव होता है। यह व्यवहारगत परिवर्तन सतत् प्रक्रिया बन जाता है।

8. मूल्यांकन सहकारी प्रक्रिया है। छात्रों के व्यवहार के समग्र मूल्यांकन के लिए छात्र, अध्यापक, विद्यालय के कर्मचारियों, सहपाठियों एवं अभिभावकों आदि सभी स्रोतों के सहयोग से ही आँकड़े प्राप्त करना सम्भव है।

9. मूल्यांकन द्वारा बालक के सर्वांगीण विकास (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक आदि अर्न्तनिहित) की दृष्टि से उसके सद् वृत्तियों एवं अच्छी आदतों द्वारा बालक के निर्माण का भी लेखा-जोखा अथवा अभिलेख रखा जाता है। इस प्रकार यह एकांगी न होकर सर्वांगीण होता है।

10. मूल्यांकन एक विवरणात्मक प्रक्रिया है क्योंकि इसमें छात्रों के सभी पक्षों में होने वाले व्यावहारिक परिवर्तनों एवं जाति का परिणात्मक एवं गुणात्मक विवरण प्रस्तुत किया जाता है।

11. मूल्यांकन के द्वारा शिक्षक अथवा मनोवैज्ञानिक कई प्रकार का निर्णय लेते हैं; जैसे – कोई विषययुक्त अथवा शैक्षिक प्रक्रिया उपयोगी है या नहीं, शिक्षण सफल हुआ या नहीं। अधिगम-अनुभव प्रभावकारी रहे या नहीं। इस प्रकार मूल्यांकन शैक्षिक उपलब्धियों एवं शिक्षण की व्यवस्था का औचित्य एवं मूल्य निर्धारित तो करता ही है साथ ही साथ उनको सुधारने में भी सहायता प्रदान करता है।

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