# समाजशास्त्र तथा विकास पर एक निबंध | मानव विकास में समाजशास्त्र की भूमिका | Sociology and Development

समाजशास्त्र तथा विकास : मानव विकास में समाजशास्त्र का योगदान

जहाँ तक विकास का सम्बन्ध है सामाजिक विकास की धारणा एक प्रमुख समाजशास्त्री अवधारणा है जिसका अध्ययन हम समाजशास्त्र की एक विशिष्ट शाखा “विकास का समाजशास्त्र के अन्तर्गत करते हैं। समाजशास्त्र की इस शाखा के अन्तर्गत विकास की अवधारणा, विकास का स्वरूप, विकास के कारक, विकास की नीति, विकास के कार्यक्रम आदि का विस्तृत अध्ययन और विवेचन किया जाता है। हॉबहाउस ने सामाजिक विकास के मापदण्डों का उल्लेख करते हुए कहा है कि “कोई भी समुदाय तभी विकासशील कहा जा सकता है कि जब उसकी मात्रा, कार्यक्षमता, स्वतन्त्र और पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होती है।”
ग्रिफिन तथा इनास का कथन है कि “सहयोग के बिना कोई भी विकास सम्भव नहीं हो सकता।”, इससे स्पष्ट है कि सामाजिक विकास के लिए पारस्परिक सामाजिक सहयोग की आवश्यकता होती है और यह सहयोग भी समाजशास्त्र की एक प्रमुख अवधारणा है जो सामाजिक प्रक्रिया का संगठनात्मक स्वरूप है। सामाजिक नीतियों के निर्धारण में, सामाजिक क्रियाओं के संचालन में और सामाजिक विकास के कार्यक्रमों के निर्माण और क्रियान्वयन में समाजशास्त्र की अत्यधिक व्यावहारिक उपयोगिता होती है।
समाजशास्त्र तथा विकास पर एक निबंध | मानव विकास में समाजशास्त्र की भूमिका | विकास का समाजशास्त्र पर एक निबंध | Samajshastra Aur Vikas Me Sambandh
भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में समाजशास्त्र की अत्यधिक महत्व है क्योंकि आज भारतीय समाज में अनेक प्रकार की सामाजिक समस्याएँ व्याप्त हैं तथा इन समस्याओं के निराकरण के लिए जहाँ एक ओर अत्यधिक प्रयास किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर समाज के विकास के उद्देश्य से विभिन्न प्रकार की विकास की योजनाओं को क्रियान्वित करने का प्रयास किया जा रहा है। समाजशास्त्र की व्यावहारिक उपयोगिता इस बात से स्पष्ट होती है कि विभिन्न क्षेत्रों में विकास कार्यक्रम को क्रियान्वित करने में समाजशास्त्रीय ज्ञान का व्यवहार में उपयोग किया जा रहा है। आज ऐसा कोई भी समाज नहीं जहाँ समाजशास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता न हो। आज सभी समाजों में विकास कार्यक्रम की नीतियों और कार्यक्रमों के निर्धारण और क्रियान्वयन में समाजशास्त्र के अध्ययन की विशिष्ट उपयोगिता और महत्ता है।
भारत जैसे विकासशील देश के संदर्भ में देखें तो समाजशास्त्र के अध्ययन की अत्यधिक आवश्यकता और उपयोगिता है। विभिन्न क्षेत्रों में विकास के संदर्भ में हम समाजशास्त्र की उपयोगिता और महत्व को निम्न प्रकार से स्पष्टतः समझ सकते हैं

(1) समाजशास्त्र ग्रामीण पुनर्निर्माण में सहायक

भारत गाँवों का राष्ट्र है। यहाँ की लगभग 80% जनसंख्या गाँवों में निवास करती है। दुर्भाग्यवश आज भारतीय ग्रामीण समुदाय अनेक सामाजिक, आर्थिक समस्याओं से ग्रस्त है। आज ग्रामीण व्यक्तियों की दशा अत्यन्त सोचनीय है। बेकारी, निर्धनता, अज्ञानता, अशिक्षा, भाग्यवादिता, जातीयता, अस्पृश्यता, ऋणग्रस्तता, अन्धविश्वास, जादू-टोना, धर्म तथा पर्दा आदि की समस्याएँ भारतीय ग्रामीण समाज के सदस्यों को अपने शिकंजे में बुरी तरह से जकड़े हुए हैं। स्वतन्त्रता के पश्चात् इनसे छुटकारा पाने के लिए अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। सफलता प्राप्त करने के लिए इन विभिन्न समस्याओं के बारे में समुचित ज्ञान की आवश्यकता है, जो समाजशास्त्र प्रदान करता है। आज समाजशास्त्र की एक विशेष शाखा (Branch) ग्रामीण समाजशास्त्र (Rural Sociology) केवल ग्रामीण समाज की समस्याओं को ही अध्ययन करती है तथा उसके निराकरण में सतत् प्रयत्नशील है। समाजशास्त्रीय ज्ञान ग्रामीण समस्याओं की जटिलता के बारे में समुचित अध्ययन करके ग्रामीण पुनर्निर्माण की योजना में पूर्ण सहयोग प्रदान करता है। अतः भारतीय ग्रामीण पुनर्निर्माण में समाजशास्त्र का विशेष महत्त्व है।

(2) समाजशास्त्र नगर नियोजन में सहायक

वर्तमान समय में भारतवर्ष में तीव्र गति से नगरीकरण होता जा रहा है। इस बढ़ती हुई नगरीकरण की प्रक्रिया के फलस्वरूप जहाँ एक ओर नगरों का विकास हुआ है वहीं दूसरी ओर नगरों में अनेक समस्याओं ने भी जन्म लिया है। विभिन्न नगरीय समस्याओं में सबसे प्रमुख नगर नियोजन की समस्या है। यदि नगरों का विकास योजनाबद्ध ढंग से होता है तो अन्य समस्याएँ उत्पन्न नहीं होगी, अन्यथा नगर नागरिक समस्याओं से घिर जायेगा। अतः नगरों के विकास के पूर्व नगर नियोजन का वैज्ञानिक ज्ञान होना आवश्यक है ताकि उसके अनुसार नियोजित ढंग से नगरों का विकास किया जाए। नगर नियोजन का समुचित तथा वैज्ञानिक तथा समाजशास्त्र के अध्ययन से होता है। समाजशास्त्र की एक विशेष शाखा (Special Branch), नगरीय समाजशास्त्र (Urban Sociology), नगरों की उत्पत्ति, विकास आदि के बारे में विशेष ज्ञान प्रदान करती है तथा नगरीय समस्याओं के निराकरण के उपायों का भी व्याख्या करती है। इस प्रकार भारत में नगर नियोजन कार्यक्रम को सफल बनाने में समाजशास्त्र अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए पूर्ण सहयोग प्रदान करता है।

(3) समाजशास्त्र जन-जातीय कल्याण में सहायक

भारतीय समाज में अनुसूचित जाति और जनजाति का बड़ा भाग है। सम्पूर्ण भारत की जनसंख्या का लगभग 6.9 प्रतिशत भाग जन-जातियों के अन्तर्गत आता है। विभिन्न समस्याओं से घिरे रहने के कारण जन-जातीय समुदाय न तो प्रगति कर पा रहा है, न ही सुखमय जीवन-यापन कर पा रहा है। राष्ट्र की उन्नति और इस जनजाति समुदाय के कल्याण के लिए इनकी विभिन्न समस्याओं के बारे में समुचित ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है जिससे इनकी विभिन्न समस्याओं का निराकरण किया जा सके। समाजशास्त्र जन-जातीय समस्याओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है तथा वैज्ञानिक विधियों द्वारा जन-जातीय संगठनों के विभिन्न पक्षों का विस्तृत विवेचन करके उनकी मुख्य समस्याओं से पूर्ण अवगत कराता है।

(4) समाजशास्त्र श्रमिक कल्याण में सहायक

भारत में औद्योगीकरण की तीव्र प्रक्रिया के साथ ही साथ श्रमिकों के संगठन और एकता में वृद्धि हुई है। जहाँ एक ओर उद्योगपति या पूँजीपति विभिन्न प्रकार से श्रमिकों का शोषण करने से नहीं चूकते, वहीं दूसरी ओर श्रमिक भी तालेबन्दी, हड़ताल आदि के द्वारा इन्हें हानि पहुँचाते हैं। इस प्रकार मिल-मालिक और श्रमिकों के बीच अत्यन्त तनावपूर्ण सम्बन्ध हो जाते हैं और संघर्षमय स्थिति उत्पन्न होती रहती है। समाजशास्त्र ही एक ऐसा सामाजिक विज्ञान है जो इनके सम्बन्धों और तनावों तथा श्रमिकों की विभिन्न समस्याओं के बारे में विस्तृत अध्ययन और विवेचन करके इनका निराकरण खोजता है। इसी कारण सरकारी और गैर-सरकारी दोनों ही क्षेत्रों में श्रम अधिकारी (Labour Officer) तथा श्रम कल्याण अधिकारी (Labour Welfare Officer) के पदों पर समाजशास्त्र के ज्ञाता को पदस्य किया जाता है ताकि श्रमिकों और उद्योगपतियों के बीच औद्योगिक विवाद (Industrial Dispute) न हो।

(5) समाजशास्त्र जातिवाद के निराकरण में सहायक

यह निर्विवाद सत्य है कि भारत की प्रगति के मार्ग में अस्पृश्यता और जातिवाद सदैव बाधक रहते हैं। सामाजिक जीवन का प्रत्येक क्षेत्र इस सामाजिक बुराई से प्रभावित तो था ही, राष्ट्रीय जीवन और राष्ट्र भी इससे अछूता न रह सका। अतः इस बुराई या कुरीति को समाज से उखाड़ फेंकना अत्यन्त आवश्यक हो गया। इसके निराकरण के लिए अनेक विधि-विधान पारित हुए किन्तु वे पूर्ण सफलता न प्राप्त कर सके। समाजशास्त्र समाज की बुराई या कुरीति का ज्ञान कराता है तथा लोगों को पुरानी रीति-रिवाज, प्रथा, परम्परा की त्रुटियों से अवगत कराता है। प्राचीन कुरीतियों के प्रति घृणा उत्पन्न कराके नवीन सामाजिक प्रतिमान और प्रथाओं के प्रति लगाव उत्पन्न करता है। फलस्वरूप समाज में प्रचलित जातिवाद, अस्पृश्यता, ऊँच-नीच तथा भेद-भाव की भावना समाप्त होती है। सामाजिक कुप्रथाएँ समाजशास्त्रीय ज्ञान के आधार पर भी दूर की जा सकती हैं, अतः समाजशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र के अन्तर्गत जातिवाद, अस्पृश्यताएँ, प्रथाएँ, परम्पराएँ, रूढ़ियाँ, जनरीतियाँ आदि इसकी विषय-वस्तु हैं जिनके वैज्ञानिक अध्ययन करके इनके सम्बन्ध में समुचित ज्ञान प्रदान करता है। भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद और अस्पृश्यता जैसे कलंक को दूर करने में समाजशास्त्र अपनी प्रमुख भूमिका निभाता है।

(6) समाजशास्त्र भावनात्मक एकीकरण में सहायक

भारतीय समाज का संगठन भावनात्मक एकता का प्रतीक कहा जा सकता है क्योंकि भारतीय समाज अनेक समानता और विभिन्नता का प्रतीक संगम स्थल है। भावनात्मक एकीकरण की भावना ही समानता और विभिन्नता में सामंजस्य स्थापित किए हुए है। भारतीय समाज के व्यक्तियों की भावनाएँ, विधि-विधान की आत्माओं से सर्वोच्च होती हैं। एकता की भावना के कारण ही यहाँ आज हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए एक हैं; तथा राष्ट्रीय एकता को सदैव बनाये रखने का पूर्ण प्रयास करते हैं। वर्तमान समय में समाज की बढ़ती हुई जटिलता के कारण भारतीय समाज में अनेक वादों का विकास होता जा रहा है जो राष्ट्र के लिए घातक है तथा भावनात्मक एकीकरण के मार्ग में बाधक है। इन विभिन्न वादों में भाषावाद (Linguism), सम्प्रदायवाद (Communalism), प्रान्तवाद (Provincialism), क्षेत्रवाद (Regionalism) आदि मुख्य हैं। समाजशास्त्र इन विभिन्न वादों तथा अन्य भावनात्मक एकीकरण की समस्याओं के बारे में वैज्ञानिक ज्ञान प्रदान करके इनके अन्दर पाई जाने वाली सामाजिक बुराइयों को बतलाकर दूर करने का प्रयत्न करता है तथा राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन देता है। इस प्रकार समाजशास्त्र भावनात्मक एकीकरण में सहयोग प्रदान करता है।

(7) समाजशास्त्र सामाजिक समस्याओं के निराकरण में सहायक

आज भारतीय समाज को यदि समस्याओं से सम्पन्न राष्ट्र कहा जाए तो अतिशयोक्ति होगी क्योंकि यहाँ अनेक समस्याएँ समाज को घेरे हुए हैं। सामाजिक विकास और विघटन, पारिवारिक विघटन, वेश्यावृत्ति, आत्महत्या, मद्यपान, बेकारी-गरीबी, भिक्षावृत्ति, भुखमरी तथा जातिवाद, भाषावाद, धर्मवाद आदि समस्याओं से समाज पूर्णतः त्रस्त है। फलतः समाज प्रगति की ओर अग्रसर हो ही नहीं पाता। जब तक इन विभिन्न सामाजिक समस्याओं का निराकरण नहीं होगा तब तक भारतीय समाज प्रगति नहीं कर सकता। अतः इसके लिए समाजशास्त्रीय ज्ञान का होना आवश्यक है; क्योंकि इन समस्याओं के बारे में वास्तविक जानकारी समाजशास्त्र के अध्ययन द्वारा ही प्राप्त होती है। अतः समाजशास्त्र ही इन विभिन्न सामाजिक समस्याओं का समाधान कर सकता है। चूंकि यह समाज का विज्ञान है अतएव सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहायक होता है।
The premier library of general studies, current affairs, educational news with also competitive examination related syllabus.

Related Posts

# भारत में समाजशास्त्र की उत्पत्ति (उद्भव) एवं विकास | Origin and Development of Sociology in India

समाजशास्त्र एक नवीन सामाजिक विज्ञान है जो समाज का समग्र रूप से वैज्ञानिक अध्ययन करता है। समाज का अस्तित्व मानव के अस्तित्व के साथ जुड़ा हुआ है,…

# निदेशक सिद्धान्तों का उद्भव, प्रकृति और स्वरूप | Origin, nature and nature of Directive Principles

निदेशक सिद्धान्तों का उद्भव, प्रकृति और स्वरूप : “उन्नीसवीं शताब्दी तक व्यक्तिगत स्वतन्त्रताओं के संरक्षण हेतु मौलिक अधिकारों का विचार प्रमुख था… बीसवीं शताब्दी में नवीन विचारों…

# मौलिक अधिकार का अर्थ, उद्भव एवं विकास | Origin and Development of Fundamental Rights

मौलिक अधिकार का अर्थ, उद्भव एवं विकास : मौलिक अधिकार व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास के लिए वे अपरिहार्य अधिकार है जिन्हें लिखित संविधान द्वारा प्रत्याभूत एवं न्यायपालिका…

# अधिकारों का अर्थ, आवश्यकताएं एवं अवधारणाएं

अधिकारों का अर्थ, आवश्यकताएं एवं अवधारणाएं : वर्तमान युग मानव अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं का युग है। अधिकार, स्वतन्त्रता, न्याय, प्रजातन्त्र आदि के लिए समय-समय पर युद्ध हुए…

# नीति निदेशक सिद्धान्त : संवैधानिक स्थिति – एक विश्लेषण

संवैधानिक स्थिति – एक विश्लेषण : “राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्त यद्यपि कोई वैधानिक आधार प्रदान नहीं करते और न ही संवैधानिक उपचार देते हैं, मात्र सुझाव…

# समाजशास्त्र एवं सामान्य बोध में अंतर | Samajshastra Aur Samanya Bodh Me Antar

समाजशास्त्र और सामान्य बोध में अंतर : समाज में प्रचलित ऐसे विचारों के सन्दर्भ में जिनके बारे में हम यह नहीं समझ पाते हैं कि वे कहाँ…

Leave a Reply

Your email address will not be published.

14 − five =