# जिला महासमुंद : छत्तीसगढ़ | Mahasamund District of Chhattisgarh

जिला महासमुंद : छत्तीसगढ़

सामान्य परिचय – उड़िया-लरिया संस्कृति के कलेवर से सुसज्जित पावन धरा की पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक आयाम जितना सशक्त है, रत्नगर्भा, उर्वर धरा इसकी आर्थिक समृद्धि का आधार है।

महानदी की पूर्वांचल में स्थित इस जिले की द्वापर युगीन स्थल सिरपुर एवं खल्लारी (खल्लवाटिका) इसकी प्राचीनता की कहानी कहती है, वहीं गौतम बुद्ध एवं पाण्डवों की चरण धुल से पवित्र इस पावन भूमि को प्रकृति ने हरियाली एवं जीव-जन्तु एवं पक्षियों की नैसर्गिक सौंदर्य से सजाया है। शिशुपाल पर्वत इसकी पूर्वी सीमा में अभेद किला की भांति सुरक्षा की दीवार है।

इतिहास – गुप्त शासक समुद्रगुप्त द्वारा इस क्षेत्र में महानदी के तट पर, सेना का पड़ाव डाले थे, इसी आधार पर, इस क्षेत्र का नामकरण महासमुंद माना जाता है। सिरपुर पाण्डुवंशी ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक विरासत एवं धरोहरों का जीता-जागता संग्रहालय है। खल्लवाटिका, द्वापर युगीन लाक्षागृह की कुटिल प्रपंच एवं षडयंत्र का रहस्य अपने सीने में दफन किया है, वहीं हैहयवंशी राजाओं की राजधानी का गौरव प्राप्त है।

पूर्वी जमीदारियों में फुलझर तथा कौड़िया जमींदारी की ऐतिहासिक वर्णन मिलता है।

सामान्य जानकारी
  • गठन – 1998
  • जिला मुख्यालय – महासमुन्द
  • क्षेत्रफल – 4790 वर्ग किलोमीटर
  • प्रमुख नदी – महानदी, जोंक नदी, सुरंगी नदी, लात नदी
  • पड़ोसी सीमा – रायगढ़, बलौदाबाजार, रायपुर, गरियाबंद, ओडिशा
  • पर्यटन –  खल्लारी मंदिर, सिंघोड़ा, बारनवापारा, सिरपुर – दक्षिण कोशल का प्रसिद्ध मंदिर, सिरपुर, खल्लारी, भीमखोज, लक्ष्मण मंदिर, आनन्द प्रभु कुटी विहार
खनिज
  • सोना – रेंहटीखोल, लिमउगुड़ा
  • फ्लुराइट – चिवराकुटा, कुकुरमुत्ता, घाटकछार
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  1. औद्योगिक क्षेत्र – बिरकोनी
  2. औद्योगिक पार्क – किसान शॉपिंग मॉल ( महासमुंद में प्रस्तावित)
  3. कॉम्प्लेक्स – स्टोन कटिंग काॅम्प्लेक्स – घोड़ारी (गरियाबंद में भी)
निवासरत प्रमुख जनजाति
  • कोंध
  • कंवर
  • बहलिया
  • संवरा
  • बिंझवार

केन्द्र संरक्षित स्मारक

1. लक्ष्मण मंदिर (सिरपुर, महासमुंद)

यह लाल ईटों से निर्मित भारत के सर्वोत्तम प्राचीन मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण सिरपुर के पाण्डु/सोम वंश के शासक हर्षगुप्त के पत्नी वासाटा देवी ने हर्षगुप्त के स्मृति में लगभग 600 ई. में प्रारंभ किया तथा इसके निर्माण कार्य को वासटा देवी की पुत्र महाशिव गुप्त बालार्जुन ने पूरा किया। यह मंदिर उत्तर गुप्त वास्तुकला का श्रेष्ठ उदाहरण है। मंदिर की गर्भगृह में विष्णु भगवान की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के द्वार पर विष्णु के प्रमुख अवतार कृष्ण लीला के दृश्य अलंकरणात्मक प्रतीक मिथुन दृश्य और वैष्णव द्वारपालों का आंकन है।

2. सिरपुर स्थित समस्त टिले

राज्य संरक्षित स्मारक

1. आनंद प्रभु कुटी विहार, सिरपुर

सन् 1953-56 ई. में श्री एम.जी. दीक्षित ने सागर विश्वविद्यालय की ओर से सिरपुर में उत्खनन कार्य कराया था। उत्खनन के फलस्वरूप यहां से दुमंजिला विहार के भग्नावशेष एवं तत्कालीन संस्कृति के विविध पुरावशेष प्रकाश में आये हैं।

पूर्वाभिमुखी, आनंद प्रभु कुटी विहार नामक ईंट निर्मित यह स्मारक वास्तव में बौद्ध भिक्षुओं का आराधना एवं निवास स्थल था, जिसमें आनंद प्रभु नामक प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु कभी निवास किया करता था। अतः उनके नाम पर ही इस विहार का नाम आनंद प्रभु कुटी विहार पड़ गया है। इसका निर्माण लगभग 7वीं शती ईस्वी में हुआ था। प्रमुख मध्यवर्ती कक्ष में भगवान बुद्ध की विशाल पदमासनस्थ प्रतिमा स्थापित है। नदी देवी एवं पदमपणि अवलोकितेश्वर की प्रतिमा भी इसमें रखी हुई है। विहार के सभी कक्ष ईंट निर्मित हैं और महामंडप की ओर खुले हुए हैं। बौद्ध विहारों के प्रतिनिधि स्मारक के रूप में इन स्मारकों की गणना की जा सकती है। बौद्ध विहारों के अवशेषों की दृष्टि से सिरपुर अत्यन्त समृद्ध है। सिरपुर की पहचान विश्व विख्यात सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में होती है।

2. स्वास्तिक विहार, सिरपुर

सिरपुर में ही आनन्द प्रभु कुटी विहार से लगभग 400 मीटर की दूरी पर एक अन्य समकालीन बौद्ध विहार अवस्थित है। ऐसा कहा जाता है कि पवित्र स्वास्तिक के आकार के निर्मित होने के कारण स्वास्तिक विहार के नाम से जाना जाता है। यह सुन्दर विहार लगभग 7वीं शती ईस्वी में निर्मित हुआ था। मूलतः यह दुमंजिला विहार था, जिसका ऊपरी भाग नष्ट हो गया है। इस विहार के गर्भगृह में भूस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की विशालकाय पाषाण प्रतिमा दर्शनीय है। यह उत्खनित विहार महत्त्वपूर्ण राज्य संरक्षित स्मारक है। आकार में यह आनन्द कुटी विहार से कुछ छोटा है। इस ईंट निर्मित विहार का मुख पूर्व दिशा की ओर है तथा बौद्ध कला एवं बाल उदाहरण है।

3.  जगन्नाथ मंदिर, खल्लारी

यह स्मारक महासमुंद जिले में महासमुंद नगर से बागबाहरा रोड पर 22 कि.मी. की दूरी पर खल्लारी नामक गांव में स्थित है। खल्लारी से प्राप्त प्रस्तर-अभिलेख से यह तथ्य ज्ञात होता है कि इस नारायण (जिसे अब जगन्नाथ मंदिर कहते हैं) मंदिर को देवपाल नामक मोची ने 13वीं शती ईस्वी में बनवाया था।

इसमें इस स्थान का नामोल्लेख ‘खल्लवाटिका‘ के रूप में हुआ है। यह मंदिर पूर्वाभिमुख है एवं इसमें तीन अंग-गर्भगृह, अन्तराल खंड एवं मण्डप है। मण्डप 16 स्तंभों पर आधारित है। पंचरथ भू-विन्यास प्रकार का यह स्मारक नागर शैली में निर्मित है। रायपुर के कल्चुरि कालीन मंदिर-वास्तु का यह प्रतिनिधि उदाहरण है। यहाँ पर पहाड़ी में विद्यमान खल्लारी माता का निर्माण मंदिर लगभग 15वीं ईस्वी में हुआ था।

पर्यटन स्थल

1. सिरपुर

“चित्रांगदपुर” के नाम से प्रसिद्ध सिरपुर ऐतिहासिक एवं धार्मिक नगरी है। महासमुंद जिले की विशेषता बढ़ाने में इनका समूल्य योगदान है। पौराणिक ग्रंथ महाभारत में उल्लेख मिलता है। इसे शरभपुरियों व पाण्डुवंशी शासकों की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है।

संपन्नता की नगरी महाभारत कालीन अर्जुन व चित्रांगदा के पुत्र भब्रुवाहन की राजधानी होना ऐतिहासिकता को बतलाती है। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत के अनुसार छठी से दसवीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म का प्रमुख स्थल रहा है। बौद्ध ग्रंथ अवदान शतक के अनुसार महात्मा बुद्ध यहाँ आए थे, जिसकी झलक देखी जा सकती है। पाण्डुवंशियों के काल में सिरपुर का वैभव परमोत्कर्ष पर था।

प्राचीन श्रीपुर नगरी में लाल ईंटों से निर्मित “लक्ष्मण मंदिर” स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। राष्ट्रीय स्तर पर शीर्षस्थ पुरस्कृत होना प्रसिद्धि को दर्शाता है। बारनवापारा अभ्यारण्य के जीव-जन्तु पर्यटकों को बिना डोर खींच लाता है। आनंद प्रभु कुटी विहार, स्वास्तिक विहार, गंधेश्वर महादेव, संग्रहालय दर्शनीय स्थल हैं।

छत्तीसगढ़ की इस नगरी में ‘बौद्ध पूर्णिमा’ के अवसर पर ‘सिरपुर महोत्सव’ का आयोजन किया जाता है। प्रतिवर्ष ‘माघ पूर्णिमा’ के अवसर पर मेला लगता है। स्थानीय एवं देश के प्रमुख कलाकारों द्वारा रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है, जो लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

2. गंधेश्वर महादेव मंदिर (सिरपुर, महासमुंद)

महानदी के तट पर स्थित यह मंदिर एक शिव मंदिर है। इस मंदिर परिसर में विभिन्न भग्नावशेषों से प्राप्त- बुद्ध, नटराज, उमा-महेश्वर, वराह, विष्णु, वामन, महिषासुरमर्दिनी, नदी देवियां आदि की कलात्मक प्रतिमाएं और खंडित अभिलेख सुरक्षित रखी गई हैं। इस मंदिर के मण्डप का निर्माण प्राचीन मंदिरों एवं विहारों से प्राप्त स्तंभों में किया गया है।

3. खल्लारी

खल्लवाटिका‘ के नाम से प्रसिद्ध खल्लारी ऐतिहासिक व धार्मिक नगरी है। इस मंदिर में महाभारत काल के लाक्षागृह के साक्ष्य हैं। इस लाक्षागृह में भीम के पद चिह्न ‘भीम-खोह’ धरोहर के रूप में आज भी है। यह महासमुंद जिले में स्थित कल्चुरियों की लहुरी शाखा की प्रारंभिक राजधानी थी।

रायपुर के कल्चुरियों की लहुरी शाखा के शासक ब्रम्हदेव के शासनकाल में सन् 1415 ई. में देवपाल नामक मोची द्वारा निर्मित प्रख्यात खल्लारी माता का मंदिर धार्मिक आस्था का केन्द्र है। चैत्र पूर्णिमा पर खल्लारी मेला भराता है, जो यहाँ के लोकप्रियता को बढ़ाता है।

4. चण्डी माता मंदिर घुंचापाली (बागबाहरा, महासमुंद)

चण्डी माता का मंदिर महासमुंद जिले के घुंचापाली ग्राम में है जो बागबाहरा से काफी नजदीक है यहां पर जाने के लिए उत्तम सड़क मार्ग है। यहीं पर पहाड़ के ऊपर माता विराजमान है, माता की मूर्ति स्वयम्भू स्वरूप है। यहाँ पर मुख्य मंदिर से ऊपरी पहाड़ पर छोटी चंडी माता है जो गुफा के अन्दर विराजमान है। यह मंदिर जंगली भालूओं के प्रतिदिन यहां प्रसाद ग्रहण के लिए आगमन महत्वपूर्ण विषय है।

5. माँ रूद्रेश्वरी मंदिर (सिंघोड़ा)

यह मंदिर महासमुंद जिले के सरायपाली ब्लाक में स्थित है, जो जिले से लगभग 110 किमी. की दुरी पर मुख्य सड़क के किनारे स्थित है। इसका निर्माण बाबा श्री शिवानन्द जी द्वारा लगभग 25-30 वर्ष पहले किया गया था।

इस मंदिर के अंदर एक गुफा है। मंदिर के दिवारों पर 9 दुर्गा कि प्रतिमा निर्मित है जिसके नीचे सिक्के दिवार पर चिपकते हैं।

6. गढ़फूलझर – मां रामचंडी मंदिर

7. शिशुपाल पर्वत

यह पूर्वी उच्च भूमि श्रृंखला की सबसे ऊंचा पर्वत है। यह इस अंचल का प्रमुख पर्वत होने के साथ-साथ यहां पर मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है। मकर संक्रान्ति में यहां मेला लगता है। 25 साल पहले अनादि गाड़ा व संकर बरीहा के प्रयासों से यह पर्व शुरू हुआ था, तब से निरंतर आयोजित किया जा रहा है। इसके पास घोड़ादरहा जलप्रपात स्थित है। इसकी ऊंचाई लगभग 660 फिट है, इसके नजदीक ही पुजारीपाली पर्यटन स्थल स्थित है। अंग्रेजों द्वारा अधिकार कर लिये जाने पर यहां की रानी ने अपने मर्यादा की रक्षा के लिए घोड़े की आंख में पट्टी बांधकर इस जल प्रपात से कुदकर अपनी जान दे दी, इसलिए इसे घोड़ादरहा के नाम से जाना जाता है। इसके नजदीक में कालीदरहा बांध व घोरघाट डेम है, तथा धारी डोंगरी चोटी 899 मीटर ऊंचाई के साथ पूर्वी उच्च भूमि की सबसे ऊंची चोटी है।

8. कोडार डेम

यह डेम महानदी की सहायक नदी सुखा नदी की सहायक नदी कोडार नदी पर स्थित है। वर्ष 1981 में कोडार नदी पर कोडार डेम/शहीद वीरनारायण सिंह परियोजना प्रारंभ हुआ था। कोडार जलाशय से खरीफ सीजन में लगभग 16 हजार 554 हेक्टेयर और जल उपलब्धता पर आधारित रबी सीज़न में डेढ़ से ढाई हजार हेक्टेयर की सिंचाई होती है।

9. बावनकेरा

इस धार्मिक स्थल पर मुंगई माता का मंदिर है। मुंगई माता को दुर्गा माता का रूप माना जाता है तथा स्वप्न देवी के रूप में पूजा की है। यहां पर साल के दोनों नवरात्री में मनोकामना ज्योति जलाई जाती जाती है।

10. पटेवा

छ.ग. के इस धार्मिक स्थल पर पतईमाता का मंदिर पहाड़ के ऊपर स्थित है। यहां माता की भव्य स्वरूप को दुर्गा माता की रूप मानी जाती है।

प्रमुख व्याक्तित्व

1. यति यतनलाल (महासमुंद)

सामाजिक और सांस्कृतिक जागृति के प्रणेता यति यतनलाल जी आरंभ से ही रचनात्मक कार्यों के माध्यम से जन-जागरण के लिए निरंतर प्रयासरत रहे और दलित उत्थान व उन्हें संगठित करने के उद्देश्य से गांव-गांव में घूमकर हीन भावना दूर करने के लिए अथक प्रयास किया। कूरीतियों और बुराईयों से जूझते हुए हर पल विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन साहस और संकल्प के साथ उद्यम में जुटे रहे। 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रचार कार्य में संयोजक तथा नगर प्रमुख के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। महासमुन्द तहसील में जंगल सत्याग्रह के सूत्रधार रहे तथा गिरफ्तार भी किए।

1933 में हरिजन उद्धार आंदोलन के प्रचार में सक्रिय हो गये। महात्मा गांधी के निर्देशानुसार 1935 में ग्रामोद्योग, अनुसूचित जाति उत्थान और हिन्दू मुस्लिम एकता की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। स्वतन्त्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अनेक बार जेल गये। ग्रामीण जनता के उत्थान के लिए सदैव कटिबद्ध रहे और ग्रामोद्योग के महत्व पर प्रचार करने में संलग्न रहे।

यति यतनलाल जी श्रेष्ठ वक्ता, लेखक, समाज सुधारक भी थे। छत्तीसगढ़ में अहिंसा के प्रचार में अविस्मरणीय योगदान को दृष्टिगत रखते हुए छ.ग. शासन ने उनकी स्मृति में अहिंसा एवं गौ-रक्षा में यति यतनलाल सम्मान स्थापित किया है।

समारोह/मेला

1. सिरपुर मेला

परम्परा और आस्था का पर्व सिरपुर महोत्सव का आयोजन माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक होता है। अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरातात्विक स्थलों की सूची में सिरपुर का सर्वोच्च स्थान है। यहां माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक मेला आयोजित होता है। यह प्राचीनकाल में सिरपुर श्रीपुर के नाम से विख्यात था। यह स्थान नाट्यकला के इतिहास में विशिष्ट कला तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। सिरपुर की प्राचीनता का सर्वप्रथम परिचय शरभपुरीय शासक प्रवरराज तथा सुदेवराज के ताम्रपत्रों से उपलब्ध होता है, इसमें श्रीपुर से भूमिदान का उल्लेख भी मिलता है। यहां अनेकानेक मंदिर, मठ, बौद्ध विहार, सरोवर तथा उद्यमों का निर्माण महाप्रतापी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के काल में करवाया गया।

2. करियाध्रुवा मेला, अर्जूनी पिथौरा

मड़ई मेले के आस्था का प्रतीक है, और सामाजिक संस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ जन चेतना जागृत करने में भी महत्वपूर्ण भमिका निभाते हैं।

किंवदंतियों के अनुसार मेला आयोजन स्थल कौड़िया राजा करियाध्रुवा एवं धुवरीन का स्थान है। पौष माह की पूर्णिमा को यहाँ प्रतिवर्ष मड़ई का आयोजन होता है। यहाँ करियाध्रुवा एवं धुवरीन की शादी के पश्चात् विदाई में विलंब होने के कारण गांव के बाहर रात में दोनों की पाषण प्रतिमा बनने की कहानी प्रचलित है एवं यही इनके मंदिर का निर्माण कराया गया है।

3. खल्लारी

इसका प्राचीन नाम खल्लवाटिका थी। यहां लाक्षागृह में महाभारत कालीन भीम के पदचिन्ह मिले। यहां चैत्र पूर्णिमा पर तीन दिन का मेला लगता है। पहाड़ के ऊपर दुर्गा माता की मंदिर है जिसे खल्लारी माता कहते हैं। पर्वत के नीचे जहां मेला लगता है वहां खल्लारी माता, शिव मंदिर, श्री राम जानकी, जगन्नाथ मंदिर और काली माता की प्रतिमा है। किंवदंतियों के अनुसार मां खल्लारी का आगमन ग्राम बेंमचा में हुआ था। ऊपर पहाड़ी में माता तक पहुंचने के लिए 844 सीढ़ी चढ़ना पड़ता है। यहां चैत्र माह में मेला लगता है।

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