# जिला गरियाबंद : छत्तीसगढ़ | Gariaband District of Chhattisgarh

जिला गरियाबंद : छत्तीसगढ़

सामान्य परिचयगरियाबंद छत्तीसगढ़ का नवगठित जिला है। नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण इस धरा की भूगर्भ में हीरा, मोती का असीम भंडार है। कथाओं में राम वनवास की गाथा, जबकि जनश्रुति में समुद्रगुप्त के दक्षिण अभियान की समृद्ध ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। गढ़ और किला अपने विकरालता में हैहयवंशी राजाओं की महानता का बखान कर रहे हैं, वहीं देवभोग का क्षेत्र रानी कोस्तुभेश्वरी देवी की गाथा बयां करती है।
काल्पनिक कथाओं के अनुसार राजा के पुत्र ने इस नगर को बसाया। अजातशत्रु के राजधानी परिवर्तन के उपाख्यानों में भी इसकी झलक मिलती है। उदंती अभ्यारण्य की मोर सावन की हरियाली में घटनाओं के बीच आदिवासी लोक धुनों एवं गीतों की बसंत बेला के साथ सौंदर्य का अनुपम दृश्य प्रस्तुत करता है।
चांद की दूधिया रोशनी में मोतियों जैसे चमकती घटारानी, जलप्रपात सूर्य की पहली किरणों की लालिमा में माणिक्य सौंदर्यबोध करता है। राजिम आस्था, एवं आध्यात्म का संगम स्थल है। यहां गंगा, यमुना के समान संस्कृति का अविरल धारा सदियों से प्रवाहमान है। एक ओर जहां इसकी धरा मन को छू जाने वाली नैसर्गिक सौंदर्य एवं जैव संपदा से समृद्ध है, वहीं इसके गर्भ में हीरा, मोती जैसे मूल्यवान (अमूल्य) रत्न छिपे हैं।
जिला गरियाबंद : छत्तीसगढ़ | Gariaband District of Chhattisgarh | गरियाबंद जिले के बारे में जानकारी | Gariaband Jila Ke Bare Me Jankari | गरियाबंद
सामान्य जानकारी
  • गठन – 2011
  • जिला मुख्यालय – गरियाबंद
  • क्षेत्रफल – 5823 वर्ग किलोमीटर
  • पड़ोसी सीमा – धमतरी, रायपुर, महासमुंद + ओडिशा राज्य
  • नदी – महानदी, पैरी, सोंढुर
खनिज –
  • गार्नेट – गोहेकला, धुपकोटा, लाटापारा, केंदुवन
  • अलेक्जेंड्राइट – लाटापारा, सेन्दमुड़ा
  • हीरा – बेहराडीह, पाइलीखण्ड, कोदोमाली, जांगड़ा, कुसुमपुरा, टेम्पील
  • लौह अयस्क – मछुआ बहल
  • मैग्निज – छुरा, परसोली
औद्योगिक क्षेत्र – बेलटुकरी
निवासरत प्रमुख जनजाति – कमार, भुंजिया, गोंड

केन्द्र संरक्षित स्मारक

1. राजीव लोचन मंदिर (राजिम)‌

महानदी, पैरी, सोंढूर के संगम पर स्थित राजिम, (जिसे छत्तीसगढ़ का प्रयाग भी कहा जाता है) में स्थित राजीव लोचन मंदिर‌ का निर्माण नलवंशीय शासक विलासतुंग ने 700-740 ई. में किया था। तथा इसका जीर्णोद्धार कल्चुरी शासक पृथ्वीदेव द्वितीय के‌ सेनापति जगतपाल देव ने किया था।
इस मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा है। प्रतिवर्ष यहां पर माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक एक विशाल मेला लगता है। यहां पर महानदी, पैरी नदी तथा सोंढुर नदी का संगम होने के कारण यह स्थान छत्तीसगढ़ का त्रिवेणी संगम कहलाता है। संगम के मध्य में कुलेश्वर महादेव का विशाल मंदिर स्थित है।
कहा जाता है कि वनवास काल में श्री राम ने इस स्थान पर अपने कुलदेवता महादेव जी की पूजा की थी। इस स्थान का प्राचीन नाम कमलक्षेत्र है। ऐसी मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में भगवान विष्णु के नाभि से निकला कमल यहीं पर स्थित था और ब्रह्मा जी ने यहीं से सृष्टि की रचना की थी। इसीलिये इसका नाम कमलक्षेत्र पड़ा।

2. सीताबाड़ी (राजिम)

छत्तीसगढ़ में पुरातत्व विभाग को एक पुराना कुआं मिला है। प्रयागराज राजिम में मिला यह कुआं लगभग ढाई हजार साल पुराना बताया जा रहा है। पुरातत्वविदों ने इसका निर्माण मौर्यकाल के समय होना बताया है। 5.25 मीटर व्यास और 80 फीट गहरे इस कुएं के चारों तरफ प्लेटफार्म बना हुआ है। प्लेटफार्म की लंबाई 7.05 मीटर और चौड़ाई 7.05 मीटर है। विभाग को इससे पहले भी राजिम के सीताबाड़ी में चल रहे खुदाई में ढाई हजार साल पहले की सभ्यता के प्रमाण मिले हैं। साथ ही महाभारत कालीन कृष्ण-केशी की युद्धरत मुद्रा वाली मूर्ति भी मिली है।

3. रामचंद्र मंदिर (राजिम)

रामचंद्र मंदिर, भगवान राम को समर्पित मंदिर है जिसे राजिम में 400 साल पहले गोविंदलाल द्वारा बनवाया गया था, जो एक प्रसिद्ध बैंकर था और रायपुर से एक मर्चेंट भी था। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर के बनने में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री सिरपुर के मंदिरों के खंडहर से लिया गया है। मंदिर के खंभों में काफी नक्काशी खुदी हुई है जिन्हें गंगा और यमुना कहा जाता है।

राज्य संरक्षित स्मारक

1. फणिकेश्वरनाथ महादेव मंदिर (फिंगेश्वर)

इस मंदिर का निर्माण राजिम के कुलेश्वर महादेव मंदिर के काल में किया गया है। फणिकेश्वरनाथ नामक शिवलिंग प्रमुख मंदिर के गर्भगृह में प्रतिस्थापित है। यह मंदिर पूर्वाभिमुखी है तथा गर्भगृह एवं मंडप इसके दो अंग है। इसका मंडप सोलह स्तंभों पर आधारित है। मंदिर की द्वार चौखट में नदी देवियां प्रदर्शित होता है। मंदिर में अनेक प्राचीन मूर्तियां रखी है, जिनमें चतुर्मुखी गणेश जी, भैरव बाबा की प्रतिमा प्रमुख है। मान्यतानुसार श्री राम जी वनवास के समय इस रास्ते से होकर गुजरे थे और माता सीता ने इसी मंदिर में शिव जी की पूजा व जल अभिषेक किया था। इसलिए इन्हें पंचकोसी धाम के नाम से भी जाना जाता है।

2. कुलेश्वर मंदिर (राजिम)

पुरातत्वीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व का स्थल राजिम रायपुर से 48 कि.मी. दक्षिण दिशा में महानदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। जहां पैरी एवं सोंढुर नदी का महानदी से संगम होता है। इसका प्राचीन नाम “कमल क्षेत्र” एवं “पदमपुर” था।
इसे “छत्तीसगढ़ का प्रयाग” माना जाता है। राजिम के राजीव लोचन देवालय में विष्णु भगवान की पूजा होती है। राजेश्वर, दानेश्वर एवं रामचन्द्र मंदिर इस समूह के अन्य महत्वपूर्ण मंदिर है। कुलेश्वर शिव मंदिर संगम स्थली पर ऊंची जगती पर निर्मित है।
नवमीं शती ई. में निर्मित यह मंदिर पूर्वाभिमुखी है। इस मंदिर में गर्भगृह, अन्तराल एवं मण्डप है। मण्डप की भित्ति में आठ पंक्तियों का क्षरित-अस्पष्ट प्रस्तर अभिलेख जड़ा हुआ है। यहां क्षेत्रीय कला एवं स्थापत्य से संबंधी दुर्लभ कलात्मक प्रतिमाएं मण्डप में दर्शनीय है।‌ (यह राजिम में नदी के संगम में होने के कारण धमतरी जिला में लिया जाता है।)

पर्यटन स्थल

1. जतमई‌ माता मंदिर

गरियाबंद में रायपुर से 85 किमी की दूरी पर स्थित है। एक छोटा सा जंगल के खूबसूरत स्थलों के बीच, जतमई मंदिर माता जतमई के लिए समर्पित है। मंदिर खूबसूरती से कई छोटे शिखर या टावरों और एक एकल विशाल टॉवर के साथ ग्रेनाइट के बाहर खुदी हुई है। मुख्य प्रवेश द्वार के शीर्ष पर एक पौराणिक पात्रों का चित्रण भित्तिचित्र में देख सकते हैं। जतमई की पत्थर की मूर्ति गर्भगृह के अंदर रखा गया है।

2. घटारानी मंदिर (घटारानी जलप्रपात)

जतमई मंदिर से 25 किलोमीटर दूर स्थित एक बड़ा झरना हैं। जतमई मंदिर में उत्साह और भक्ति के साथ नवरात्रि पर्व मनाया जाता है, यहाँ नवरात्रि की तरह विशेष उत्सव के मौकों पर सजावट देखने को मिलता है। मानसून के बाद यहां यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय‌ रहता है। मंदिर के निकट एक झरना बहती है, जो इस जगह को और अधिक आकर्षक बना देता है। झरना इस गंतव्य को पूरे परिवार के लिए एक पसंदीदा पिकनिक स्पॉट बनाने में प्रवाहपूर्ण है। झरना मंदिर में प्रवेश करने से पहले एक डुबकी लेने के लिए सबसे अच्छी जगह है। जतमई मंदिर जाने के लिए रायपुर से वाहनों की सुविधा आसानी से उपलब्ध हो जाती है।

3. सिकासार जलाशय

सिकासार जलाशय का निर्माण सन् 1977 में पुर्ण हुआ। सिकासार बाँध की लंबाई 1540 मी. एवं बाँध की अधिकतम ऊंचाई 32 मी. है। सिकासार जलाशय में 2 x 3.5 = 7MW क्षमता का जल‌ विद्युत संयंत्र 2006 से स्थापित है। जिससे सिंचाई के साथ साथ‌ विद्युत उत्पादन किया जाता है।

4. उद्यन्ती सीतानदी टाईगर रिजर्व

उद्यन्ती एवं सीतानदी अभ्यारण्य को संयुक्त रूप से उद्यन्ती-सीतानदी टाईगर रिजर्व‌ 2009 से घोषित किया गया। उद्यन्ती अभ्यारण्य की स्थापना 1983 में हुआ। इसका क्षेत्रफल 249 वर्ग किमी है तथा इस अभ्यारण्य के बीच से उद्यन्ती नदी बहती है, जिसमें गोदना जलप्रपात स्थित है। यहां सर्वाधिक मात्रा में वनभैंसा एवं मोर पाये जाते हैं। सीतानदी अभ्यारण्य की‌ स्थापना 1974 में हुआ तथा इसका क्षेत्रफल 559 वर्ग किमी है। यह छ.ग. का सबसे प्राचीन अभ्यारण्य है। यहां सर्वाधिक मात्रा में तेंदुआ पाए जाते हैं। यह दोनों संयुक्त रूप से 2006 में प्रोजेक्ट टाईगर और 2009 में टाईगर रिजर्व घोषित किया गया।

प्रमुख व्यक्त्वि

1. पं. सुंदरलाल शर्मा (छ.ग. का गाँधी) (1881-1940)

पंडित सुंदरलाल शर्मा एक मूर्धन्य साहित्यकार जीवंत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कर्मठ व्यक्तित्व तथा गांधीवादी समाजसेवी थे। मानवता एवं देश प्रेम से ओतप्रोत पंडित सुंदरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ राज्य के “प्रथम स्वप्नदृष्टा” छत्तीसगढ़ी साहित्य के पितामह‌छत्तीसगढ़ के गांधी” तथा सामाजिक समानता एवं धार्मिक सहिष्णुता के सूत्रधार कहलाते हैं। विलक्षण प्रतिमा के धनी पंडित सुंदरलाल शर्मा एक साहित्यकार चित्रकार तथा मूर्तिकला के पारंगत कलाकार थे। छत्तीसगढ़ी हिंदी, उड़िया, बांग्ला, मराठी, बोलियों एवं भाषाओं के बहुभाषाविद् थे।
  • जन्म – 21 दिसम्बर, 1881
  • स्थान – ग्राम चमसूर (राजिम)
  • पिता – श्री जियालाल तिवारी
  • माता – श्रीमती देववती
  • मृत्यु – 28 दिसंबर 1940

समारोह/मेला

1. राजिम कुंभ मेला

छत्तीसगढ़ में राजिम कुंभ का मेला माघ पूर्णिमा से शिवरात्रि तक चलता है। इस मेले में कई सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। तीर्थ नगरी राजिम के महानदी, पैरी और सोंढुर नदियों के संगम पर माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक विगत 13 वर्षों से राजिम कुम्भ मेला का आयोजन होता आ रहा है।
छत्तीसगढ़ का प्रयाग “राजिम” आस्था एवं आध्यात्म की पूण्य भूमि है। प्रतिवर्ष यहां पर माघ पूर्णिमा में राजिम कुंभ का आयोजन होता है। महानदी, पैरी तथा सोंढुर नदी के त्रिवेणी संगम पर यह नगर बसा है। नलवंशी शासक विलासतुंग द्वारा 8 वीं शताब्दी में निर्मित राजीव लोचन मंदिर, पंचायन शैली में वास्तु कला का बेजोड़ नमूना है। संगम स्थल पर कुलेश्वर महादेव, की ख्याति अपनी अलौकिक एवं चमत्कारिक दैवीय शक्तियों के कारण दूरस्थ अंचलों तक है। रामचंद्र मंदिर, सीताबाड़ी आदि राजिम नगर के पौराणिक महत्ता का परिचायक है।
दत्त कथाओं के अनुसार, धर्मपरायण सती तेलिन माता ‘राजिम’ के नाम पर इस नगर का नामकरण माना जाता है। वैदिक धार्मिक आख्यान एवं मान्यताओं के अनुसार “हरिहर” अर्थात शैव-वैष्णव पंथ भारत में सर्वोत्तम संगम राजिम को माना जाता है। यहां भगवान विष्णु (राजीव लोचन) तथा भगवान शिव (कुलेश्वर महादेव) एक-दूसरे के सम्मुख विराजमान है।
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