# ए. आर. अन्तुले बनाम आर. एस. नाइक वाद

ए. आर. अन्तुले बनाम आर. एस. नाइक वाद :

ए. आर. अन्तुले बनाम आर. एस. नाइक वाद अधिकारों एवं निदेशक सिद्धान्तों में विहित न्याय की संकल्पना से जुड़ा है। इस वाद में न्यायालय ने अधिकारों का विस्तार करते हुए आपराधिक मामलों में त्वरित न्याय पर निर्णय दिया, न्यायालय के अनुसार – “आपराधिक मामलों में आरोपित व्यक्ति को त्वरित न्याय प्राप्त करना मौलिक अधिकार है एवं संवैधानिक लक्ष्य भी है…”

इसी वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने निदेशक तत्वों में निहित शीघ्र न्याय पाने के लक्ष्य को एक महत्वपूर्ण अधिकार मानकर विस्तृत दिशा निर्देश निर्धारित किये यथा- त्वरित परीक्षण एवं निर्णय आपराधिक न्याय का सार है (अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था में शीघ्र एवं त्वरित न्याय एक महत्वपूर्ण अधिकार है)। यद्यपि त्वरित न्याय मौलिक अधिकारों में स्पष्टतः अंकित नहीं किया गया है परन्तु इसे संवैधानिक लक्ष्य ही मानकर न्यायालय प्राथमिकता दे।

यद्यपि न्यायालय ने परीक्षण की समय सीमा निर्धारित नहीं की और आरोपित करने वाले पक्ष पर यह दायित्व रखा कि वह विलम्ब के औचित्य को सिद्ध करे। न्यायालय ने साथ ही इस वाद में यह भी अभिनिर्धारित किया कि त्वरित न्याय-जांच, परीक्षण, अपील पुनर्विचार सभी स्तरों पर लागू हो। पुनः दोषी व्यक्तियों का त्वरित न्याय के अन्तर्गत अधिकार है कि-

# रिमाण्ड एवं दोष सिद्ध से पूर्व निरूद्ध किये जाने की अवधि (जितनी सम्भव हो) सूक्ष्म हो, अर्थात दोषी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से निरूद्ध न रखा जाए।

# अत्यधिक विस्तृत परीक्षण या खोज के परिणामस्वरूप उठने वाली चिन्ता, या परेशानियों अथवा व्यय को भी कम किया जाय।

# किसी भी मामले में अनावश्यक विलम्ब गवाह या साक्ष्य की अनुपस्थिति, आरोपी की क्षमताओं को कम करती है।

पुनश्च न्यायालय ने इस वाद में स्पष्ट मत रखा कि आरोपी व्यक्ति को मात्र इस आधार पर त्वरित न्याय से दूर नहीं किया जा सकता कि वह ऐसे न्याय की मांग न कर सका। समय सीमा न्यायालय के मत में- परिस्थितियों एवं कारणों की विवेचना अपराध की प्रकृति, गवाह एवं आरोपियों की संख्या, या न्यायालय के कार्य स्थिति पर निर्भर करेगी। साथ ही यदि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि आरोपी के त्वरित न्याय का उल्लंघन हुआ है तो उसके दोषों के आधार को समाप्त कर दिया जाएगा।

दूसरे, इस वाद में यह भी प्रश्न उठाया गया कि क्या न्यायालय भी जो विधि द्वारा स्थापित है और विधि के अन्तर्गत शक्तियों का प्रयोग करते हैं संविधान द्वारा अनु० 12 में परिभाषित राज्य के अन्तर्गत हैं (संविधान में इस अनु० 12 के अन्तर्गत न्यायालय स्पष्टतः अंकित नहीं है) सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय पीठ द्वारा इस वाद में अभिनिर्धारित किया गया कि-

“न्यायालय कोई ऐसा आदेश या निर्देश जारी नहीं कर सकते जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन में हो… संविधान के अनु० 12 द्वारा परिभाषित राज्य के अन्तर्गत न्यायालय भी हैं।”

सारांशतः इस निर्णय ने अधिकारों को विस्तार दिया तथा निदेशक तत्वों में निहित सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय की स्थापना या न्याय के समान अवसर जैसे संवैधानिक लक्ष्यों को प्राथमिकता दी।

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