# क्षेत्रीय-अध्ययन/कार्य : विशेषताएं, अनिवार्यताएं, प्रमुख चरण, लाभ एवं सीमाएं (Kshetriya Adhyayan)

क्षेत्रीय-अध्ययन/कार्य :

क्षेत्रीय-अध्ययन अथवा क्षेत्रीय कार्य एक ऐसी अनुसन्धान प्रणाली है, जिसके द्वारा प्राकृतिक रूप से घटनाक्रमों के घटित होने वाली की समयावधि में ही सामाजिक व्यवहार और अन्तः क्रिया और सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। इस अनुसन्धान प्रणाली में चरों के नियन्त्रण पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। इस प्रकार के क्षेत्र प्रयोगों में जो विशिष्ट वैज्ञानिक पद हैं उन पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है। ऐसे अध्ययनों में कभी-कभी कुछ ऐसी परिकल्पनाएँ या अन्तर्दृष्टि मिल जाती है जिसके आधार पर क्षेत्र प्रयोग करके नियम और सिद्धान्तों का प्रतिपादन करना सम्भव हो जाता है।

क्षेत्र अध्ययन चूँकि समाज की वास्तविक परिस्थितियों में किये जाते हैं। अत: इन परिस्थितियों में जिन चरों का अध्ययन किया जाता है वह बहुत सी सशक्त होते हैं इन चरों का सामाजिक व्यवहार और अन्तःक्रिया से स्पष्ट सम्बन्ध दिखायी पड़ता है।

क्षेत्रीय अध्ययन की विशेषताएं :

क्षेत्रीय अध्ययन की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

1. सूक्ष्म अध्ययन– क्षेत्रीय अध्ययन के अन्तर्गत अनुसंधानकर्ता घटना स्थल पर जाकर सूक्ष्मता से छानबीन करता है।

2. यन्त्रों का थैला– अनुसंधानकर्ता जिस क्षेत्र का अध्ययन करने जाता है, उसके सम्बन्ध में किस यन्त्रों या साधनों का प्रयोग करेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह क्षेत्र ग्रामीण है या शहरी। ग्रामीण क्षेत्र में उसे अधिक जटिल या कठिन यन्त्रों की आवश्यकता नहीं होती है। जबकि शहरी क्षेत्र में उसे वहाँ के वातावरण, लोगों के स्वभाव और आदतों के अनुरूप अपने को अधिक तथा पूर्ण साधनों तथा अभियांत्रिकी से सम्पन्न होकर जाना होता है।

3. उपयोगी ज्ञान– क्षेत्रीय अध्ययन अधिक उपयोगी होता है क्योंकि इसमें अध्ययनकर्त्ता को अपने अनुसंधान के कार्य को चयनित क्षेत्र के स्तर के अनुसार चलाना होता है।

4. मनोरंजनपूर्ण अनुसंधान– क्षेत्रीय अध्ययन में अनुसंधानकर्त्ता को बड़े दिलचस्प किस्से कहानी सुनने और वहाँ के संस्कृति, लोक कला, लोक संगीत, शिल्प कला, नाटक और रंगशालायें देखने को मिलती हैं। ये सभी उसकी समस्या समाधान में काफी सहायक होती हैं।

5. आकस्मिकता अथवा मुठभेड़– इस प्रकार के अध्ययन में अनुसंधानकर्त्ता न केवल अध्ययनकर्त्ता क्षेत्र विशेष के लोगों के व्यवहार और उनकी आदतों को ध्यान में रखकर अध्ययन करता है। दूसरी ओर, क्षेत्र के लोग स्वयं भी उसके आचरण, व्यवहार तथा स्वभाव को जानने के इच्छुक रहते हैं।

क्षेत्रीय अध्ययन की प्रमुख अनिवार्यताएं :

क्षेत्रीय अध्ययन पद्धति के सफल प्रयोग के लिये कुछ प्रमुख अनिवार्यताएं हैं, जिनके अभाव में अध्ययन अपूर्ण, अव्यवस्थित और अनिर्धारित रहता है, जो निम्न प्रकार हैं-

1. क्षेत्रीय भाषा का ज्ञान– क्षेत्रीय भाषा का ज्ञान भी क्षेत्रीय अध्ययन के लिये अनिवार्य है। क्षेत्रीय भाषा जानने वाला अध्ययनकर्त्ता क्षेत्र के अनुसंधान से सम्बन्धित लोगों से सम्पर्क करके अध्ययन से सम्बन्धित उपयोगी सामग्री प्राप्त कर सकता है।

2. क्षेत्र विशेष में निवास– सफल क्षेत्रीय अध्ययन के लिये अध्ययनकर्त्ता उस क्षेत्र विशेष का निवासी होना आवश्यक है। निवासी होने से वह क्षेत्र की समस्याओं, सुविधाओं, प्रभावशील व्यक्तियों, लाभप्रद संस्थाओं और समुदायों से भली-भाँति परिचित रहता है। ये सभी लाभ क्षेत्र के बाहर से आये अध्ययनकर्त्ता को आसानी से उपलब्ध नहीं हो सकते हैं।

3. पक्षपातपूर्ण धारणाओं पर नियन्त्रण– क्षेत्रीय अध्ययन में अध्ययनकर्त्ता को अपने अध्ययन में पूर्वाग्रहों (Bias), अभिनतियों पर पूर्ण नियन्त्रण रखना चाहिये। अध्ययनकर्त्ता जिस क्षेत्र का निवासी है, उसे उस क्षेत्र की अच्छाइयों या बुराइयों के आधार पर पूर्व धारणायें नहीं बना लेनी चाहिये।

क्षेत्रीय अध्ययन के लाभ :

क्षेत्रीय अध्ययन के निम्नलिखित लाभ होते हैं-

1. समस्या समाधान में सहायक– क्षेत्रीय अध्ययन द्वारा क्षेत्र की समस्या विशेष का समाधान आसानी से किया जा सकता है। यदि क्षेत्रीय अध्ययन न किये जाएँ तो कभी-कभी छोटी समस्या भी गम्भीर रूप धारण कर सकती है।

2. विशेषीकरण को प्रोत्साहन– जिस प्रकार वैयक्तिक अध्ययन में सामान्यीकरण की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है, उसी प्रकार क्षेत्रीय अध्ययन में विशेषीकरण को प्रोत्साहन मिलता है। क्षेत्र के सभी कारकों का पता लगाने के बाद व्यवस्था विशेष का पता लगाया जाता है।

3. व्यवस्था को समझने में सहायक– क्षेत्रीय अध्ययन द्वारा सभी कारकों को दृष्टि में रखते हुए वहाँ की व्यवस्था जैसे शिक्षा, पंचायतीराज, कृषि, प्रशासन आदि का पता लगाया जा सकता है।

4. अधिक विश्वसनीय व उपयोगी– वैयक्तिक अध्ययन की सामग्री पक्षपातपूर्ण और व्यक्ति प्रधान हो सकती है परन्तु क्षेत्रीय अध्ययन में अध्ययनकर्त्ता स्वयं स्थलीय निरीक्षण करके सत्य और असत्य का पता लगाता है। अत: उसके अध्ययन और उसके द्वारा एकत्रित सामग्री विश्वसनीय कही जा सकती है।

5. शिक्षा एवं प्रशिक्षण का साधन– शिक्षा विस्तार का एक महत्त्वपूर्ण साधन क्षेत्रीय अध्ययन है, क्षेत्रीय अध्ययन में ऐसे नवीन साधनों का प्रयोग किया जाता है, जिनके प्रयोग द्वारा नवीन तथ्य सामने आते हैं, जिनका परिचय वहाँ की जनता और पाठकों को होता है। इस कारण से अनुसंधानकर्त्ता एवं उत्तरदाता दोनों की ही जानकारी में वृद्धि होती है। अतः कहा जा सकता है क्षेत्रीय अध्ययन से अनुसंधानकर्त्ता को शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्राप्त होता है।

क्षेत्रीय अध्ययन की सीमाएं :

जहाँ एक ओर क्षेत्रीय अध्ययन बहुत उपयोगी है वहीं दूसरी ओर इसकी कुछ सीमायें भी हैं, जिनका विवरण निम्न प्रकार हैं-

1. विभिन्न क्षेत्रों के कारक भिन्न-भिन्न हो सकते हैं और उनका प्रभाव भी भिन्न-भिन्न हो सकता है। अतः क्षेत्रीय अनुसंधान का परिणाम क्षेत्र विशेष तक सीमित होकर रह जाता है, उसका उपयोग दूसरे क्षेत्र के लिये नहीं हो सकता।

2. ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी साधनों की कमी है, जागरुकता का अभाव है, जिसके कारण अनुसंधानकर्त्ता को जानकारी प्राप्त करने में या तो कठिनाई आती है या फिर उसे सही जानकारी नहीं मिल पाती है।

3. क्षेत्र के विभिन्न कारकों की अज्ञानता के कारण अध्ययन भ्रमपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं।

4. यदि कोई शहरी क्षेत्र का अनुसंधानकर्त्ता ग्रामीण क्षेत्रों में अध्ययन के लिये जाता है, तो ग्रामीण लोग उसके साथ तथा वह ग्रामीणों के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते हैं। अतः ऐसी दशा में क्षेत्रीय अध्ययन से इच्छित एवं पूर्ण जानकारी नहीं मिल पाती है।

5. अध्ययनकर्त्ता स्वयं की सीमाओं के कारण भी क्षेत्रीय अध्ययन पद्धति को प्रभावशाली रूप से काम में नहीं ला पाता है। वह स्वयं को नवीन वातावरण और परिस्थितियों के अनुकूल ढालने में असमर्थ पाता है। उसमें उत्साह का अभाव पाया जाता है जो उसके अनुसंधान के परिणाम को प्रभावित कर सकता है।

यद्यपि क्षेत्रीय अध्ययन की अनिवार्यताओं के अनुसार साधन उपलब्ध कराना प्रायः मुश्किल होता है। तथापि यह पद्धति सर्वोत्तम, विश्वसनीय एवं उपयोगी है।

क्षेत्र अध्ययन के पद अथवा चरण :

फेस्टिंगर और काट्ज (1953) ने क्षेत्र अध्ययन के निम्न पदों का वर्णन किया है-

1. प्रारम्भिक योजना

2. प्रारम्भिक निरीक्षण अभियान

3. अनुसंधान अभिकल्प की रचना

4. अनुसंधान सम्बन्धी यन्त्रों और प्रतिक्रियाओं का पूर्व परीक्षण

5. क्षेत्र का वास्तविक अध्ययन

6. प्रदत्त विश्लेषण

फेस्टिंगर और काट्ज द्वारा बताये हुए पदों को स्वीकार करते हुए अनेक क्षेत्र अध्ययन किये गये हैं। इस दिशा में हुए अध्ययनों के आधार पर क्षेत्र अध्ययनों के पदों में दो पद और जोड़े गये हैं। ये दो पद हैं— (i) उद्देश्य और परिकल्पनाएँ, इस पद को उपरोक्त पदों में तीसरे नम्बर पर जोड़ा गया है। (ii) परिणाम और विवेचना इस पद को उपरोक्त वर्णित पदों में अन्तिम पद के रूप में स्वीकार किया गया है। अतः उपर्युक्त 6 के स्थान पर 8 पदों का वर्णन निम्नलिखित है-

1. प्रारम्भिक योजना

अनुसंधानकर्ता क्षेत्र अध्ययन को विधिवत् योजना के आधार पर प्रारम्भ करता है। प्रारम्भिक योजना निर्माण में वह कम-से-कम अग्रलिखित तीन बिन्दुओं पर विचार करता है—

(i) अनुसंधान करने में समय कितना लगेगा? अनुसंधान की विभिन्न अवस्थाएँ कितनी अवधि में पूरी हो पायेंगी, दूसरे शब्दों में वह विभिन्न अनुसंधान पदों की समय सारणी (Time table of the steps of research) तैयार करता है।

(ii) प्रारम्भिक योजना निर्माण में वह यह भी निश्चित करता है कि उसके क्षेत्र अध्ययन का विषय विस्तार कितना होगा (Scope of the research)।

(iii) प्रारम्भिक योजना निर्माण में अनुसंधानकर्ता अनुसंधान के सामान्य उद्देश्यों का निर्धारण करता है कि वह अपने क्षेत्र अध्ययन में क्या-क्या उद्देश्य देखेगा (General objectives of the research)।

अनुसंधानकर्ता के उपरोक्त निर्णय अस्थायी निर्णय (Tentative decisions) होते हैं। इन निर्णयों के सम्बन्ध में वह अन्तिम रूप से निर्णय प्रारम्भिक निरीक्षण अभियान के बाद करता है। इसके अतिरिक्त अध्ययनकर्ता साहित्य अध्ययन के आधार पर पहले किये गये क्षेत्र अध्ययनों की समीक्षा करता है और अपनी अध्ययन समस्या के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी साहित्य सर्वेक्षण के आधार पर प्राप्त करता है। इस महत्वपूर्ण जानकारी में उसे अध्ययन चरों, चरों की मापन पद्धतियाँ, अनुसंधान के लिए आवश्यक उपकरण तथा अनुसंधान के लिए सहायक अनुसंधानकर्ताओं की संख्या आदि के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त होती हैं।

2. प्रारम्भिक निरीक्षण अभियान

क्षेत्र-अध्ययन प्रारम्भ करने से पूर्व अनुसंधानकर्ता के लिए आवश्यक होता है कि वह उन अध्ययन इकाइयों या उस समुदाय से परिचित हो जाये जिसका उसे अध्ययन करना है। कई बार अनुसंधानकर्ता उस अध्ययन क्षेत्र में या समुदाय विशेष में जाकर बस जाता है और अध्ययन-क्षेत्र की इकाइयों से मिलकर अपनी अध्ययन समस्या से सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं की जानकारी प्राप्त करता है।

फेस्टिंगर और काट्ज ने प्रारम्भिक निरीक्षण अभियान में अनुसंधानकर्ता क्या-क्या करता है इसकी सूची निम्न प्रकार से दी है-

(i) अध्ययनकर्ता जिस समूह, समुदाय या संस्था का अध्ययन कर रहा है। उसकी संरचना कैसी है, उसमें कितने मुख्य समूह और कितने उपसमूह हैं इसकी जानकारी प्राप्त करता है।

(ii) अध्ययन समूह या समुदाय के क्या-क्या लक्ष्य हैं, उनकी मूल्य अवस्था (Value System) या केन्द्रीय मूल्य (Central values) क्या हैं, इस प्रकार की जानकारी प्राप्त करता है।

(iii) प्रारम्भिक निरीक्षण अभियान में वह अध्ययन समूह का या समुदायों और उसके उपसमूहों में आन्तरिक तनाव की क्या स्थिति है? उनमें तनाव के कारण सम्भावित संघर्ष कौन-कौन से हैं?

(iv) अध्ययन समूह या समुदाय के उपसमूहों में पारस्परिक सम्बन्धों के स्वरूप का निरीक्षण, प्रारम्भिक निरीक्षण अभियान में किया जाता है।

(v) अध्ययन समूह के समुदाय के सामूहिक उद्देश्य कौन-कौन से हैं? इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपनाये गये साधन कौन-कौन से हैं? साधनों की उपयुक्तता क्या है? आदि का अध्ययन।

(vi) अध्ययन समूह या समुदाय के विभिन्न उपसमूह में स्वायत्तता और पराधीनता के व्यवहार का स्वरूप क्या है?

(vii) अध्ययन समूह के लोगों में आत्म-निर्भरता (Self-sufficiency) किस प्रकार की है?

(viii) अध्ययन समूह या समुदाय के विभिन्न उपसमूहों में शक्ति का प्रदर्शन और शक्ति के प्रभाव की प्रकृति क्या है?

(ix) विभिन्न अध्ययन उपसमूहों के सदस्यों के व्यवहार नियन्त्रण के कौन-कौन से साधन हैं और इन साधनों की समूह में क्या मान्यता है?

(x) विभिन्न उपसमूहों के व्यक्ति, विचार और सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं अर्थात् उनके संचार या सूचना स्रोत क्या-क्या हैं?

क्षेत्र अध्ययनकर्ता अपने अध्ययन के सम्बन्ध में उपर्युक्त सूचनाएँ प्रारम्भिक निरीक्षण अभियान के अन्तर्गत एकत्रित करने का प्रयास करता है। इसके लिए वह अध्ययन समूह या समुदाय के विभिन्न लोगों से बातचीत के आधार पर विश्वसनीय और वस्तुनिष्ठ जानकारी प्राप्त करता है वह क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं और समूह के नेताओं से भी यह जानकारी प्राप्त कर सकता है। यदि अध्ययनकर्ता शुद्ध और विश्वसनीय जानकारी प्राप्त करना चाहता है तो इसके लिए सहभागी निरीक्षण (Participant observation) सबसे अच्छा साधन होता है।

3. उद्देश्य और परिकल्पनाएं

जब कोई अध्ययनकर्ता अपने अध्ययन समुदाय का अध्ययन-क्षेत्र और उसके उपसमूहों के सम्बन्ध में प्रारम्भिक अभियान पूरा कर लेता है और प्रारम्भिक निरीक्षण अभियान से सम्बन्धित उपर्युक्त वर्णित 10 बिन्दुओं की जानकारी प्राप्त कर लेता है तो उसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उसकी अध्ययन समस्या का वास्तविक स्वरूप क्या होगा? उसे अपनी अध्ययन समस्या के सम्बन्ध में यह भी ज्ञान हो जाता है कि अध्ययन समस्या के किन-किन पहलुओं का अध्ययन करना है अथवा अध्ययन समस्या से सम्बन्धित कौन-कौन से प्रमुख प्रश्न हैं? इस प्रकार की सूचनाओं के आधार पर ही अध्ययनकर्ता अपने अध्ययन के उद्देश्यों को बनाता या निश्चित करता है। उसके अध्ययन के उद्देश्य एक या एक से अधिक हो सकते हैं। अपने इन अध्ययन उद्देश्यों के आधार पर वह अस्थायी परिकल्पना या परिकल्पनाएं (Tentative Hypothesis) ही बनाता है जिससे कि वह अपनी अध्ययन समस्या का अध्ययन सुचारु रूप से कर सके।

4. अनुसंधान अभिकल्प की रचना

क्षेत्र-अध्ययन के इस पद के अन्तर्गत सर्वप्रथम अनुसंधानकर्ता यह निश्चित करता है कि उसके अध्ययन की प्रकृति या प्रकार क्या है अर्थात् उसका अध्ययन अन्वेषणात्मक अध्ययन (Exploratory study) है या परिकल्पनाओं की जाँच करने वाला (Hypothesis testing study) है। कभी-कभी अनुसंधान का प्रकार पहले प्रकार के अन्तर्गत होता है और कभी-कभी दूसरे प्रकार के अन्तर्गत होता है और ऐसा भी हो सकता है कि उसका अध्ययन अन्वेषणात्मक है या परिकल्पनाओं की जाँच करने वाला तब वह यह निश्चय करता है कि समस्या से सम्बन्धित विभिन्न उद्देश्यों और परिकल्पनाओं के अध्ययन में कितना समय लगेगा? और अध्ययन किस प्रकार से और किन अध्ययन विधियों से किया जायेगा? अध्ययन विधियों के साथ वह इस पद के अन्तर्गत यह भी निश्चित कर लेता है कि उसे प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण कैसे करना है?

5. अनुसंधान सम्बन्धी यन्त्रों और प्रक्रियाओं का पूर्व निरीक्षण

उपरोक्त पदों को पूर्ण कर लेने के बाद इस पद के अन्तर्गत अनुसंधानकर्ता यह निश्चित करता है कि उसे अपने अनुसंधान में कौन-कौन से यन्त्र और उपकरण चाहिए, जिनकी सहायता से वह सच्चे और विश्वसनीय आँकड़ों का संग्रह कर सके। क्षेत्र अध्ययनों में बहुधा तथ्य संकलन के जिन यन्त्रों का या साधनों का उपयोग किया जाता है, वे इस प्रकार हैं- प्रश्नावली, अनुसूची, साक्षात्कार अनुसूची, विभिन्न प्रकार की व्यवहार मापनियाँ और सूचना प्रपत्र आदि।

क्षेत्र अध्ययनकर्ता अपने अध्ययन में आवश्यकतानुसार एक या अनेक तथ्य साधन और यन्त्रों का उपयोग कर सकता है। क्षेत्र अध्ययनकर्ता को चाहिए कि जहाँ तक सम्भव हो उसे अपने अध्ययन में मानकीकृत यन्त्र, उपकरण, साधन और परीक्षण आदि ही उपयोग में लाने चाहिए। कभी-कभी यह भी होता है कि मानकीकृत यन्त्र, परीक्षण, उपकरण आदि उपलब्ध नहीं होते हैं। इस अवस्था में अध्ययनकर्ता स्वयं आवश्यकतानुसार परीक्षण, यन्त्र, उपकरण आदि का निर्माण करता है। नये अनुसंधानकर्ताओं को मानकीकृत साधन ही अपनाने चाहिए और यदि साधन बनाने भी पड़ें तो ये साधन बहुत सावधानी से बनाने चाहिए और आवश्यकतानुसार तथ्य संग्रह के साधनों का मानकीकरण भी कर लेना चाहिए। कोई भी क्षेत्र अध्ययनकर्ता तथ्यों के संकलन के लिए जब तथ्य संकलन के अमानकीकृत साधन उपयोग में लाता है तब उसके इन साधनों से प्राप्त आंकड़ों की विश्वसनीयता और आँकड़ों की सत्यता सन्देहपूर्ण होती है। अतः उसे तथ्यों के संकलन के लिए अमानकीकृत साधनों को उपयोग में नहीं लाना चाहिए।

6. क्षेत्र का वास्तविक अध्ययन

इस पद के अन्तर्गत अध्ययनकर्ता वास्तव में अपने क्षेत्र में अध्ययन समस्या से सम्बन्धित आँकड़ों का संग्रह करता है। आँकड़ों का संग्रह वह उन्हीं यन्त्रों, उपकरणों और परीक्षण आदि की सहायता से करता है जिनको उसने अध्ययन के पहले चुना था। वह आँकड़ों का संग्रह अध्ययन योजना और अभिकल्प के अनुसार ही करता है। योजना के अन्तर्गत जो सावधानियाँ और नियन्त्रण निश्चित किये गये होते हैं उन सावधानियों और नियन्त्रणों का अनुसरण करते हुए तथ्यों का संग्रह करता है। अध्ययन-क्षेत्र में जाकर वह अध्ययन योजना और अध्ययन अभिकल्प में कोई भी परिवर्तन नहीं करता है। पूर्व निर्धारित अध्ययन योजना और अभिकल्प के अनुसार तथ्यों का संग्रह वह बहुत ईमानदारी से करता है। तथ्यों के संग्रह में वह अध्ययन समूह की विभिन्न इकाइयों से पूरा-पूरा सहयोग प्राप्त करके उनसे विश्वसनीय तथ्य एकत्रित करता है। आवश्यकतानुसार वह अध्ययन समूह के वरिष्ठ सदस्यों, नेताओं और समाज सुधारकों से भी सहयोग प्राप्त करता है। आँकड़ों का संग्रह कितना सत्य और विश्वसनीय होगा। यह क्षेत्र अध्ययनकर्ता की मेहनत, कौशल और दक्षता पर भी निर्भर करता है।

7. प्रदत्त विश्लेषण

अध्ययनकर्ता आँकड़ों का संग्रह करने के बाद आँकड़ों का सारणीयन करता है और उनका सांख्यिकीय विश्लेषण करता है। क्षेत्र अध्ययनों से प्राप्त परिणामों का सांख्यिकीय अध्ययन करने के लिए वह सह-सम्बन्ध निकालने की सांख्यिकीय विधियाँ, काई वर्ग परीक्षण और टी-परीक्षण जैसी सांख्यिकीय विधियों का उपयोग करता है। कुछ अध्ययनकर्ता आँकड़ों के विश्लेषण में क्रॉस-ब्रेक्स का उपयोग करते हैं। आधुनिक युग में क्षेत्र अध्ययनों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण बहुस्तरीय विश्लेषण (Multivariate analysis) के आधार पर किया जाता है।

8. परिणाम और विवेचना

प्रदत्तों का सांख्यिकीय विश्लेषण करने के बाद जो अध्ययन परिणाम क्षेत्र अध्ययनकर्ता को प्राप्त होते हैं, वह प्राप्त अध्ययन परिणामों की विवेचना करता है। विवेचना के आधार पर वह अपनी समस्या से सम्बन्धित चरों का स्पष्ट रूप से वर्णन करता है और आवश्यकतानुसार सामाजिक व्यवहार के कारणों की खोज करता है। अर्थात् वह अपनी विवेचना के कार्य-कारण सम्बन्ध का वर्णन करता है।

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