# संवैधानिक उपचारों का अधिकार एवं महत्त्व (रिट याचिका के महत्व)

उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय नागरिकों के मूल अधिकारों के ‘संरक्षक‘ एवं संविधान के ‘सजग प्रहरी‘ है। यह संविधान एवं अधिकारों की रक्षा के लिये ‘ढाल‘ का काम करते हैं। जब कभी किसी व्यक्ति के अधिकारों का अतिक्रमण होता है तो वह इनकी रक्षा के लिये न्यायालयों का दरवाजा खटखटा सकता है। न्यायालय ऐसे व्यक्तियों का समुचित अनुतोष प्रदान करते है। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत एवं उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी कर सकते हैं।

मै समझता हूँ, न्यायालयों का यह कदम एक आदर्श राज्य के प्रचलन का सूचक है। फिर नागरिकों का यह अधिकार भी अपने-आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है। मैं तो यह समझता हूँ कि नागरिकों का यह अधिकार मूल अधिकारों में ‘मूलभूत अधिकार‘ है, क्योंकि यदि यह अधिकार नहीं होता तो अन्य सारे अधिकार व्यर्थ होते और यह संविधान मात्र एक ‘कोरा दस्तावेज‘ बनकर रह जाता। अधिकार देकर उनकी रक्षा करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जीवन देकर उसकी रक्षा करना महत्वपूर्ण है। जब तक हमारे न्यायालय है तब तक नागरिकों के अधिकार भी सुरक्षित है, कोई उन्हें क्षति नहीं पहुॅचा सकता। संविधान की इस व्यवस्था ने इस सूत्र को चरितार्थ किया है – “जहाँ अधिकार है, वहाँ उपचार है।

अधिकारों का अतिक्रमण और न्यायालय की शरण

कोई भी व्यक्ति जिसके मूल अधिकारों का अतिक्रमण होता है, ऐसे अधिकारों की रक्षा एवं प्रवर्तन के लिये न्यायलय की शरण ले सकता है। यह अनुच्छेद 32 एवं अनुच्छेद 226 में किया गया एक सामान्य प्रावधान है। लेकिन अनुच्छेद 32 से परे अनुच्छेद 226 की एक विशेष बात है और वह यह है कि कोई व्यक्ति मूल अधिकारों के साथ-साथ अन्य अधिकारों के प्रवर्तन के लिये भी उच्च न्यायालय के द्वार पर पॉव रख सकता हैं। यह बात अनुच्छेद 226 में प्रयुक्त शब्द ‘किसी अन्य प्रयोजन के लिये‘ से स्पष्ट है, जबकि अनुच्छेद 32 में इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है।

लोक हित मामलों में रिट अधिकारिता

नागरिकों के मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिये संविधान में दो स्थानों पर व्यवस्था की गई है। (1) अनुच्छेद 32 में (2) अनुच्छेद 226 में। अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय के सम्बन्ध में जबकि अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों के सम्बन्ध में एक अथवा साधारण पाठक व्यक्ति के मन में यह विनय विचार आ सकता है कि अनुच्छेद 32 का क्षेत्र अनुच्छेद 226 के क्षेत्र से अधिक व्यापक होना चाहिये। ऐसा विचार आना स्वाभाविक भी है क्योंकि उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय की शक्तियों व्यापक होना परिकल्पित है। लेकिन संविधान ने यहाँ ऐसे विचारकों को निराश किया है अर्थात अनुच्छेद 226 के क्षेत्र को अनुच्छेद 32 के क्षेत्र से व्यापक स्वरूप प्रदान किया गया है।

अनुच्छेद 32 का क्षेत्र मात्र नागरिकों के मूल अधिकारों के प्रवर्तन तक ही सीमित है, जबकि अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत उच्च न्यायालय ‘अन्य प्रयोजनों‘ के लिये भी अनुतोष प्रदान कर सकते है। इस प्रकार उच्च न्यायालयों की यह अधिकारिता आंग्ल-विधि के विशेषाधिकार लेखों से भी आगे बढ़ गई है। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते है कि उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के साथ साथ अन्य अधिकारों की भी रक्षा करते है।

1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)

यह सार्वजनिक एवं महत्वपूर्ण रिट है। इसका मुख्य उद्देश्य अवैध रूप से निरूद्ध व्यक्ति को मुक्ति प्रदान करना है। इसका शाब्दिक अर्थ है – “निरूद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करो।” जब किसी व्यक्ति को अवैध रूप से परिरोधित अथवा निरूद्ध रखा जाता है तब ऐसे व्यक्ति की स्वतंत्रता को इसी रिट के माध्यम से सुनिश्चित किया जाता है। न्यायालय इस रिट के द्वारा –

  1. निरूद्ध करने वाले व्यक्ति से निरूद्ध किये जाने के कारण पूछता है,
  2. निरूद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश देता है,
  3. अवैध रूप से निरूद्ध किये जाने वाले पर उसे मुक्त अर्थात् स्वतंत्र करने का निर्देश देता है।

इस प्रकार यह रिट व्यक्ति की शारीरिक स्वतंत्रता से सम्बन्ध रखती है। न्यायालय अपनी इस रिट अधिकारिता का प्रयोग अत्यन्त सहृदयता, निर्भीकता एवं निडरता से करते है।

2. परमादेश (Mandamus)

उस देश में जहाँ विधि का शासन है, प्रत्येक व्यक्ति का जिसमें सरकार, निगम आदि भी सम्मिलित है कि वह अपने विधिक कर्तव्यों का पालन करे। यदि ऐसे कर्तव्यों का पालन नहीं किया जाता है तो किसी न किसी व्यक्ति के अधिकारों का अतिक्रमण अवश्य होता है। अतः ऐसी परिस्थितियों को रोकने के लिये ही संविधान में ‘परमादेश रिट‘ को स्थान दिया गया है। जब भी कोई व्यक्ति, लोक-प्राधिकारी सरकार निगम आदि अपने विधिक कर्तव्यों का पालन करने में उपेक्षा बरतते है तब न्यायालय द्वारा उनको यह आदेश दिया जाता है कि वे अपने विधिक कर्तव्यों का पालन करें अथवा कोई कार्य-विशेष नहीं करे। इस प्रकार यह आदेश सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों रूप में हो सकता है। इसका उद्देश्य होता है – “विधिपूर्ण कार्य किया जाये और अवैध कार्य नहीं किया जाये।”

वस्तुतः दैनिक जीवन में सदा काम आने वाली यह एक महत्वपूर्ण रिट है। आज लोकसेवकों में स्वार्थ की प्रवृत्ति के कारण अपने विधिक कर्तव्यों के प्रति उपेक्षावृत्ति में दिन-ब-दिन वृद्धि हो रही है। वे जानबूझकर या तो किसी काम को टालते है या उसमें व्यवधान पैदा करने का प्रयास करते हैं। अतः ऐसी परिस्थितियों में व्यथित व्यक्तियों के लिये एक मात्र सहारा न्यायालयों का रह जाता है।

3. प्रतिषेध (Prohibition)

यह एक प्रकार से न्यायिक रिट है जो अधीनस्थ न्यायालयों की अधिकारिता को नियन्त्रित करती है अर्थात यह रिट उस समय जारी की जाती है, जब –

  1. कोई न्यायालय अपनी अधिकारिता से बाहर कार्य कर रहा हो, अथवा
  2. अधिकारिता नहीं होते हुये भी अधिकारिता का प्रयोग कर रहा हो अथवा
  3. नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों की अवहेलना की जा रही हो।

इस प्रकार यह रिट मुख्य रूप से अधीनस्थ न्यायालयों को अपनी अधिकारिता के भीतर कार्य करने की सीख देती है। यह अधीनस्थ न्यायालय को यह आदेश देती है कि वह अपनी सीमाओं में कार्य करे। यदि सीमाओ से परे कार्य किया जाता है तो यह एक न्यायिक त्रुटि है और इसी न्यायिक त्रुटि को रोकना प्रतिषेध रिट का लक्ष्य हैं।

4. उत्प्रेषण (Certiorari)

प्रतिषेध की तरह यह भी एक न्यायिक रिट ही है। इसका उद्देश्य भी अधीनस्थ न्यायालयों को अपनी अधिकारिता में रहकर कार्य करने का पाठ पढ़ाना तथा अधीनस्थ न्यायालयों की त्रुटियों को दूर करना है। इस प्रकार यह रिट दोहरा कार्य करती है – निवारक एवं सुधारात्मक। यह रिट निम्नांकित अवस्थाओं में जारी की जाती है –

  1. जहाँ अधिकारिता के अभाव में अथवा अधिकारिता से परे कार्य किया जा रहा हो।
  2. जहाँ नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों की उपेच्छा की जा रही हो अथवा
  3. अभिलेख पर स्पष्ट रूप से कोई प्रकट त्रुटि प्रतीत होती हो ।

यह इस बात का सूचक है कि उत्प्रेषण रिट अधीनस्थ न्यायालयों से यही कहती है कि वे अपनी अधिकारिता का पूरा पूरा प्रयोग करें लेकिन उससे बाहर न जायें। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि अधीनस्थ न्यायालयों को न तो अपनी सामर्थ्य भूलना चाहिये और न ही अपनी सामर्थ्य से बाहर जाना चाहिये। यह सही भी हैं, क्योकि न्यायालय के लिये दोनों ही बाते अपेक्षित है।

5. अधिकार-पृच्छा ( Quo warranto)

रिट-श्रृंखला में यह अन्तिम किन्तु महत्वपूर्ण रिट है। इस रिट का मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति को किसी सार्वजनिक अथवा लोक पद को अवैध रूप से धारण करने से रोकना है। यह रिट तब जारी की जाती है जब कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद को अवैध रूप से धारण किये हुये होता है। | ऐसे व्यक्ति से इस रिट के माध्यम से पूछा जाता है कि वह यह पद किस प्राधिकार से धारण किये हुये होता है। ऐसे व्यक्ति से इस रिट के माध्यम से पूछा जाता है कि वह यह पद किस प्राधिकार से धारण किये हुये है। यहीं कारण है कि इस रिट का शाब्दिक अर्थ भी यहीं लगाया गया है कि “आपका प्राधिकार क्या है?”

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