# प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य | Freedom of Press and Expression

प्रेस की स्वतन्त्रता :

संविधान में प्रेस की आज़ादी के विषय में अलग से कोई चर्चा नहीं की गई है, वहाँ केवल वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के विषय में उल्लेख किया गया है। किसी भी पत्रकार के लिए यह आवश्यक है कि वह समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए स्वतन्त्रता के साथ कार्य करे, और इसके लिए उसकी कुछ नैतिक जिम्मेदारियाँ भी हैं। इन नैतिक जिम्मेदारियों को समझने के लिए प्रेस कानूनों की जानकारी जरूरी है। प्रेस अधिनियम तथा वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के विषय में जानने से पहले हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या हमारे समाज मे वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए ? और क्या हमारे समाचार पत्र पत्रिकाएं या मीडिया के अन्य अंगों को अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए ?

इन प्रश्नों पर विचार करने पर हम सामान्यतः इस रूप में उत्तर पाते हैं कि हमारे समाज में वाक् और अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी ही चाहिए और हमारे मीडिया को भी अभिव्यक्ति की पूरी आजादी होनी चाहिए। मनुष्य ने अपने विचारों, कल्पनाओं और भावों को अभिव्यक्त करने के लिए प्रारम्भ से ही विभिन्न संसाधनों का प्रयोग किया। उसने प्रतीक, संकेत, वाक्, लेखन, प्रिंट और अब इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों द्वारा अपनी भावानुभूतियों को अभिव्यक्त किया।

लिपि के विकास के साथ विचारादि को संरक्षित करने के संसाधन सुलभ हो गए और अब यह सुनिश्चित हो गया है कि सूचनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति किसी भी प्रजातान्त्रिक समाज के विकास के लिए अत्यावश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति का यह मौलिक अधिकार है कि वह अपने विचारों, अपने मत और अपने भावों की अभिव्यक्ति करे। इसे हम वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के रूप में जानते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के साथ प्रेस की स्वतन्त्रता भी शामिल है। हालाँकि भारतीय संविधान में प्रेस की आज़ादी का अलग से उल्लेख नहीं किया गया है, किन्तु आम आदमी की आज़ादी में ही प्रेस की आज़ादी भी निहित है और इस बात की चर्चा हमारे संविधान की प्रस्तावना में भी की गई है। प्रेस की स्वतन्त्रता एक नारा नहीं है अपितु जनतान्त्रिक व्यवस्था की एक विशेषता है।

जब हम कहते हैं कि हमारे देश में प्रेस स्वतन्त्र है तो यह सवाल उठता है कि प्रेस की स्वतन्त्रता का हमारे देश के परिप्रेक्ष्य में क्या अभिप्राय है। प्रेस की स्वतन्त्रता के लिये संविधान में सरकार से यह अपेक्षा की गई है कि वह प्रेस के स्वतन्त्र संचालन में बाधा न डाले।

उच्चतम न्यायालय ने भी अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि निम्न प्रकार से प्रेस की स्वतन्त्रता को बाधित किया जाना असंवैधानिक है-

1. समाचार पत्रों का सेंसर किया जाना।

2. समाचार पत्रों (प्रेस) के परिचालन पर प्रतिबन्ध।

3. समाचार पत्र प्रारम्भ किये जाने पर रोक और

4. समाचार पत्र के लिये सरकारी सहायता की अनिवार्यता।

प्रेस की आजादी बनाये रखने के लिए भारतीय नागरिकों को कुछ महत्वपूर्ण अधिकार मिले है। जिनके तहत-

1. देश का कोई भी नागरिक (मानसिक रोगी या दीवालिया के अतिरिक्त) किसी भी स्थान से कोई समाचार पत्र निकाल सकता है।

2. समाचार पत्र की अवधि (दैनिक / साप्ताहिक / पाक्षिक आदि) वह स्वयं तय कर सकता है।

3. समाचार पत्र की कीमत व उसके वितरण का क्षेत्र वह स्वयं निर्धारित कर सकता है ।

4. सामान्य स्थितियों में समाचार पत्र के वितरण पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

5. समाचार पत्र की प्रसार संख्या बढ़ाने पर कोई रोक नही हो सकती और

6. संपादक सरकार द्वारा दिये गए किसी समाचार को प्रकाशित करने के लिए बाध्य नहीं है तथा किसी जनहित के समाचार को छापने से उसे रोका नहीं जा सकता ।

यही समस्त अधिकारी इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए भी लागू माने जाते हैं।

जब समाचार पत्र में किसी समाचार के प्रकाशन को रोका नहीं जा सकता तथा न ही समाचार पत्र का प्रकाशन पूर्व सेंसर किया जा सकता है तो ऐसे में समाचार में अज्ञानतावश भूलवश, लापरवाही के चलते अथवा जानबूझकर भी ऐसे समाचारों के प्रकाशन की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता जो किसी नागरिक अथवा समाज के लिये हानिकारक अथवा दुष्प्रभाव वाले हों। स्पष्ट है कि यदि कोई समाचार समाज के लिये हानिकारक है तो उस पर प्रतिबंध लगना चाहिये। चूंकि समाचार के प्रकाशन से पूर्व प्रतिबंध की व्यवस्था नहीं है इसलिये ऐसी व्यवस्था आवश्यक है कि यदि किसी मीडिया संस्थान द्वारा विभिन्न दिशा निर्देशों का उल्लंघन हो तो सम्बन्धित संस्थान को इसके लिये दण्डित किया जा सके। किसी समाचार से समाज को निम्न प्रकार से हानि पहुंच सकती है :

1. किसी व्यक्ति पर लांछन अथवा झूठा आरोप लगाना।

2. स्त्रियों का अशिष्ट रूपण अथवा अश्लीलता फैलाना।

3. विभिन्न राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों में बाधक बनना।

4. बालकों व किशोर आयु के नागरिकों को अपराध, हिंसा, जुगुप्सा, यौन अपराध के लिये प्रेरित करना।

5. दूसरे व्यक्तियों द्वारा रचित लेख, कविता, गीत, चित्र, संगीत आदि को अपने नाम से प्रचारित करके श्रेय लेना इत्यादि।

हमारे देश में प्रचलित प्रेस कानून इन्हीं बिन्दुओं के अनुरूप बनाए गए हैं तथा ऐसे मामलों को हतोत्साहित करने के लिए दंड का प्रावधान भी किया गया है।

हमारे देश में मीडिया के लिए कानूनों की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई थी। शुरुआती दौर में प्रेस के खिलाफ कानून के इस्तेमाल का उदाहरण देश के प्रथम समाचार पत्र के प्रकाशन के दौरान ही देखने में आ गया था जब अठारहवीं शताब्दी में तत्कालीन ब्रिटिश गर्वनर जनरल वारेन हेस्टिंग्स, उनकी पत्नी तथा तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी के प्रकाशन के विरोध में सम्पादक, प्रकाशक जेम्स आगस्टस हिकी को जेल भेज दिया गया था। यद्यपि उस दौर में प्रेस कानून अस्तित्व में नहीं थे और अदालती कार्यवाही के द्वारा ही प्रेस के खिलाफ कार्रवाई की जाती थी।

1799 में पहली बार समाचार पत्र में संपादक, प्रकाशक तथा मुद्रक का नाम प्रकाशित किया जाना अनिवार्य किया गया। इसी दौरान प्रकाशन पूर्व सेंसरशिप भी लागू की गई। 1823 में प्रेस के लिये लाइसेंस प्रथा लागू की गई लेकिन 1835 में इसे संशोधित करके समाचार पत्रों के ‘मेटफाक्स एक्ट के तहत काफी राहत दी गई। तथा लाइसेंस प्रणाली समाप्त कर दी गई। इसके बाद समाचार पत्र कानून की परिधि में रहकर समाचार प्रकाशन के लिये स्वतन्त्र हो गए। हालांकि 1857 में लार्ड कैनिंग ने लाइसेंस प्रथा पुनः प्रारम्भ कर दी।

जब भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) लागू हुई तो इसमें प्रेस सम्बन्धी नियम नहीं थे लेकिन सामान्य कानून के तहत आम नागरिकों की ही तरह समाचार पत्रों के संपादकों, प्रकाशकों व लेखकों के लिये भी मानहानि, अश्लीलता फैलाने जैसे मामलों में दोषारोपण की शुरुआत इसी के साथ हो गई थी। प्रेस से सम्बन्धित पहला कानून 1867 में प्रेस एवं पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम के रूप में अमल में आया।

पराधीन भारत में प्रेस की स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाने के लिये मुख्यतः दो कानून बनाए गए। 1878 में लार्ड लिटन ने वर्नाकुलर प्रेस एक्ट लागू किया किन्तु अपनी कठोरता के कारण इसका व्यापक विरोध हुआ और इसे मात्र तीन वर्ष बाद 1881 में समाप्त करना पड़ा । इसके तहत भारतीय भाषाओं में प्रकाशित समाचार पत्रों को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध विद्रोहपूर्ण लेखन से रोका जाना था। दूसरा कानून शासकीय गुप्त बात अधिनियम था जिसके तहत किसी भी प्रकार की सरकारी जानकारी प्राप्त करना, दस्तावेज साथ रखना आदि प्रतिबन्धित व दण्डनीय का कारक बनाया गया था।

ब्रिटिश काल में समय – समय पर विभिन्न अन्य कानूनों द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित रखने के प्रयास किए जाते रहे लेकिन व्यापक विरोध के बाद उन्हें संशोधित या समाप्त भी किया जाता रहा।

स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद कानून का उपयोग समाचार पत्रों पर अंकुश लगाने नहीं बल्कि उनके विकास के लिए किया गया जिसमें अभिव्यक्ति तथा प्रेस की स्वतंत्रता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन समाज व देश पर हानिकारक प्रभाव डाल सकने वाले समाचारों पर यथोचित रोक के लिये लागू कानून यथावत ही रखे गये। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य अधिनियम भी लागू किये गए।

प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

सत्ता पर कब्जा बनाए रखने की लालसा ने प्रेस तथा अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को हमेशा ही कुचलना चाहा है। सत्ता और प्रेस की स्वतन्त्रता के बीच लम्बे समय तक संघर्ष की स्थिति बनी रही है। अनेक विचारकों तथा शासन व्यवस्थाओं ने प्रेस को स्वतन्त्रता न देना ही उचित समझा जबकि कुछ विचारक तथा व्यवस्थाएँ इस स्वतन्त्रता की पक्षधर भी रहीं।

सुप्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो विचारो की अभिव्यक्ति का समर्थक नहीं था। प्लेटो के अनुसार केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही सत्ता का हकदार है तथा हर आम व्यक्ति को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता। अपनी पुस्तक ‘द रिपब्लिक’ में प्लेटो ने कहा है कि सत्ता को ही कला, संस्कृति, लेखन, संगीत आदि पर नियन्त्रण का अधिकार है। वे सत्ता को आम आदमी से बहुत ऊपर और उत्कृष्ट मानते हैं।

प्लेटो की ही तरह मैकियोवैली तथा जार्ज हीगेल ने भी सत्ता को सर्वोच्च और उत्कृष्ट दर्जा प्रदान किया है।

लेकिन 16वीं शताब्दी के बाद से यह परिदृश्य बदलने लगा। जॉन मिल्टन ने अपनी पुस्तक ‘ऐरोवैजिटिका’ में यह विचार प्रतिपादित किया है कि अपने हित और अहित की चिन्ता करने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को है तथा सत्य को हमेशा के लिए दबा कर नहीं रखा जा सकता। अठारहवीं शताब्दी में जॉन स्टुअर्ट मिल ने इस विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि-‘ सत्ता की भूमिका समाज के बड़े वर्ग के हित का संरक्षण करने वाली होनी चाहिए। मिल ने समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता की वकालत की।

उन्नीसवीं शताब्दी में प्रेस के बढ़ते प्रभाव तथा विभिन्न राष्ट्रों की स्वतन्त्रता के बाद अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पैरोकारों की तादाद में भारी वृद्धि हुई और इसे सार्वजनिक स्वीकृति मिलने लगी । लीग ऑफ नेशन्स की स्थापना के बाद विशेषकर 1923 के बाद जेनेवा कान्फ्रेन्स और अन्य संगोष्ठियों के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार निर्विवाद रूप से स्थापित हो गया और संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1946 में सूचना की स्वतन्त्रता का घोषणापत्र जारी किया।

हमारे देश में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान विभिन्न ऐसे कानून बनाए जाते रहे जो प्रेस की स्वतन्त्रता के खिलाफ थे किन्तु इनका व्यापक विरोध होने के कारण इन्हें कुछ ही समय बाद वापिस भी करना पड़ा या इनमें संशोधन करना पड़ा। 1947 में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद लागू भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल किये जाने के बाद भारत के नागरिकों को अभिव्यक्ति की व्यापक स्वतन्त्रता प्राप्त हुई।

यह हम जान चुके हैं कि भारत के सविधान के 19 से 22 अनुच्छेदों में स्वतन्त्रता के अधिकारों के विविध पक्षों का उल्लेख किया गया है। साथ ही संविधान के प्रथम (1951) तथा सोलहवें (1963) संशोधनों में इस स्वतन्त्रता पर सात प्रकार के प्रतिबन्ध लगाए गए हैं- राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय अवमान, मानहानि तथा अपराध उद्दीपन। हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में स्पष्टतः कहा है कि ‘इस स्वतन्त्रता का प्रयोजन यह है कि सरकारी और सार्वजनिक अधिकारी जनता के दिमाग के अभिभावक नहीं बन सकते। वर्ष 2005 में लागू सूचना के अधिकार अधिनियम के बाद अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को और अधिक बल मिलता है।

वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता :

हमारे संविधान के 19वें से 22वें अनुच्छेदों में स्वतन्त्रता के अधिकारों के विविध पक्षों का विवेचन किया गया है। 19वें अनुच्छेद में भारतीय नागरिकों को मौलिक अधिकार के रूप में निम्नलिखित स्वतन्त्रताएँ प्राप्त हैं-

1. वाक् स्वातन्त्र्य और अभिव्यक्ति स्वातन्त्र्य की

2. शान्तिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन की

3. संगम या संघ बनाने की

4. भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की

5. भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने का और बस जाने की

6. कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार और

यहां यह स्पष्ट है कि संविधान में प्रेस की स्वतन्त्रता का कोई प्राप्त अधिकार नहीं दिया गया है, वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता में ही वस्तुः प्रेस की स्वतन्त्रता का अधिकार भी समाहित है।

भारतीय संविधान ने देश के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान की है। किन्तु यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि यह स्वतन्त्रता निर्बाध नहीं है अपितु इसमें समाज व देश हित के अनुरूप कुछ प्रतिबंध भी हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के लिये आवश्यक है कि उस माध्यम को भी उतनी ही स्वतन्त्रता प्राप्त हो सके जितनी संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत देश के नागरिकों को दी गई है। वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के ही अन्तर्गत प्रेस की स्वतन्त्रता को भी सम्मिलित माना गया है। यह स्पष्ट है कि प्रेस की स्वतन्त्रता के बगैर वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता अर्थहीन है, क्योंकि प्रेस ही मुख्यतः विचारों की वाहक है। यहां यह भी जान लेना चाहिए कि इस स्वतन्त्रता के तहत चिह्न, अंक, संकेत (शारीरिक भाषा) को भी अभिव्यक्ति का एक माध्यम माना गया है। यद्यपि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अनेक उद्देश्य हैं वह इसके द्वारा सम्पादित होने वाले कार्यों की सूची बहुत लम्बी है लेकिन मुख्यतः इसके निम्न उद्देश्य माने जाते हैं –

1. व्यक्ति की आत्म उन्नति में सहायक होना ।

2. सत्य की खोज में सहायक होना ।

3. निर्णय लेने की क्षमता को सुदृढ़ करना और

4. स्थिरता एवं सामाजिक परिवर्तन में युक्ति युक्त सामंजस्य स्थापित करने में सहायक होना ।

आमतौर पर यह समझा जाता है कि प्रेस की अभिव्यक्ति कोई अतिरिक्त या निर्बाध स्वतन्त्रता है तथा वह किसी के भी खिलाफ किसी प्रकार के आरोप या लांछन लगा सकती है किन्तु ऐसा नहीं है। आम नागरिक व प्रेस को यह स्वतन्त्रता एक ही अधिनियम द्वारा समान रूप से दी गई है।

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