# जिला दंतेवाड़ा : छत्तीसगढ़ | Dantewada District of Chhattisgarh

जिला दंतेवाड़ा : छत्तीसगढ़

सामान्य परिचय – देवी सती की पौराणिक आख्यान और मां दन्तेश्वरी की श्रद्धा-आस्था-विश्वास की यह पावन भूमि है। काकतीय पितामह अन्नमदेव की गौरव गाथा से समृद्ध, यह जिला बैलाडिला पहाड़ियों के गर्भ में समाहित वर्तमान औद्योगिक एवं आधुनिक विश्व की आधार तत्व ‘लौह अयस्क’ का नाभिकेन्द्र है।
मामा-भांचा लोक परंपरा को जीवंत बनाता बारसूर नागवंशी राजाओं का वास्तुशैली एवं पुरातात्विक धरोहरों का संग्रहालय है। म्यूजियम छ.ग. प्रदेश का भेड़ाघाट, इन्द्रावती नदी पर सप्तधारा जलप्रपात बस्तर की धरती के प्राकृतिक श्रृंगार का अनुठा मिसाल है।
बोधघाट जलाशय पर निर्मित जल विद्युत परियोजना निश्चित ही सुनहरा बस्तर के दिशा में एक कदम है, परन्तु यह जिला वर्तमान में माओवादी हिंसा के कारण कुख्यात है।
जिला दंतेवाड़ा : छत्तीसगढ़ | Dantewada District of Chhattisgarh | दंतेवाड़ा जिले के बारे में जानकारी | Dantewada Jila Ke Bare Me Jankari | दंतेवाड़ा
इतिहास – वर्तमान दंतेवाड़ा जिला 1998 में अस्तित्व में आया, इससे पहले यह बस्तर जिले का तहसील था। यह बस्तर का दक्षिणी हिस्सा है और यहाँ बस्तरिया संस्कृति अब भी अपने शुद्ध रूप में पूरी तरह से मौजूद है।
भारत के सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य रामायण के नायक भगवान राम ने यहाँ अपना वनवास काटा। इस क्षेत्र को रामायण में दंडकारण्य कहा गया जो भगवान राम की कर्मभूमि रही।
हड़प्पा सभ्यता के लोग ई.पू. 1500 के आसपास बस्तर पहुँचे। इन्हें संस्कृत ग्रंथों में ‘नाग’ कहा गया। यह छिंदक नाग वर्तमान गोंड जाति के पूर्वज हैं।
सामान्य जानकारी
  • जिला गठन – 1998
  • जिला मुख्यालय – दंतेवाड़ा
  • विशिष्ट परिचय – दंतवाड़ा भू-आवेष्ठित जिला है।
  • पड़ोसी सीमा – बस्तर, बीजापुर, सुकमा।
  • प्रमुख नदी – इंद्रावती, डकिनी, शंखिनी।
  • पर्यटन – दंतेश्वरी मंदिर, बैलाडीला, बारसूर, आकाशनगर, कैलाशनगर, ढोलकल, बड़ा गणेश, गामावाड़ा आदि।
खनिज
  • 1) टिन – बचेली, कटेकल्याण, तोंगपाल, पाड़ापुर।
  • 2) लौह अयस्क – बैलाडीला, बचेली, किरंदूल।
  • 3) गेलेना – झिरका, बिजाम।
  • 4) ग्रेनाइट – भूसारास क्षेत्र।
  • 5) क्वार्टज – नागफनी, तुमनार।
  • 6) लेपिडो लाइट – गोविंदपाल-मुंडपाल क्षेत्र।
औद्योगिक क्षेत्र – टेकनार
उद्योग
  • राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (NMDC) – किरंदुल (1968), बचेली (1980), बैलाडीला (1988).
  • लाख उद्योग – दंतेवाड़ा।
प्रमुख जनजातियां –
  • माडिया
  • मुड़िया
  • धुरवा
  • भतरा

केन्द्र संरक्षित स्मारक

I. दंतेश्वरी देवी मंदिर (दंतेवाड़ा)

  • शंखिनी-डंकनी नदी के संगम पर स्थित।
  • निर्माता : राजा अन्नमदेव (काकतीय वंश).
  • यहाँ पर नरबली प्रथा प्रचलित था, जिसके विरोध में मेरिया विद्रोह हुआ था।
  • देवी सती के दत्त हिस्सा इस पावन भूमि में गिरा था। इस सतयुगीन मान्यता के कारण दंतेश्वरी नामकरण हुआ। यहां एक शक्ति पीठ है।

II. चंद्रादित्य मंदिर (बारसूर)

11 वीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित, बारसुर में चंद्रादित्य मंदिर शिव को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण छिंदक नागवंशीय शासक धारावर्ष के सेनापति चंद्रादित्य द्वारा बनवाया गया था। इन्हीं के नाम पर मंदिर का नाम रखा गया। यह एक टैंक के केंद्र में एक उच्च मंच पर बनाया गया है। मंडप में बारह पत्थर के खंभे हैं, जो देवताओं की छवियों के नक्काशीदार हैं।

III. बड़ा गणेश (बारसूर)

यह मंदिर छत्तीसगढ़ के बारसूर में स्थित है तथा इसका निर्माण चन्द्रादित्य द्वारा किया गया। यहां बालू पत्थरों से निर्मित गणेश की दो विशालकाय प्रतिमाएं हैं, बड़ी मूर्ति लगभग साढ़े सात फीट की है और छोटी की ऊंचाई साढ़े पांच फीट है। एक ही मंदिर में गणेश की दो मूर्तियों का होना विलक्षण है। माना जाता है कि यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा है। कहा जाता है कि इस मंदिर को यहां के राजा ने अपनी बेटी के लिए बनवाया था।

IV. मामा-भांजा मंदिर (बारसूर)

यह मंदिर बारसुर में स्थित है। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से यह एक है। यह मंदिर काफी ऊँचा है। मंदिर अब जर्जर अवस्था में है और भारतीय पुरातत्त्व विभाग इसे सुधारने के कार्य में लगा हुआ है।‌ वैसे तो ये मंदिर शिव को समर्पित है, लेकिन इसका नाम मामा-भांजा मंदिर है। कहा जाता है कि मामा और भांजा दो शिल्पकार थे, जिन्हें ये मंदिर सिर्फ एक दिन में ही पूरा करने का काम मिला था। उन दोनों ने मंदिर को एक दिन में बना दिया था।

V. महापाषाणीय स्मारक (उर्सकल), गामावाड़ा

दंतेवाड़ा से लगभग 14 किमी. की दूरी पर गामावाड़ा नाम का एक छोटा गाँव है। इस गाँव में पत्थर के बड़े स्तंभ पाए जाते हैं जिन्हें ‘स्मारक स्तंभ’ कहा जाता है। इन स्तंभों का निर्माण कई शताब्दियों पहले यहाँ के स्थानीय निवासियों ने अपने प्रिय मृत व्यक्तियों की स्मृति स्वरुप किया था।

VI. कारली का महादेव मंदिर

बारसुर के मामा-भांजा मंदिर के तर्ज पर 11वीं शताब्दी में नागर-शैली में निर्मित यह मंदिर तत्कालीन नागवंशी शासक सोमेश्वर देव की महारानी सोमली देवी ने बनवाया था। इस मंदिर की जलहरी व शिवलिंग; बत्तीसा मंदिर के जलहरी से मिलती है। मंदिर में सावन सोमवार के अलावा महाशिवरात्रि, माधपूर्णिमा जैसे खास अवसर में यहाँ मेला लगता है।

VII. दन्तेश्वरी मंदिर में रखी प्राचीन प्रतिमायें

राज्य संरक्षित स्मारक

I. बत्तीसा मंदिर (बारसूर)

इस मंदिर का निर्माण 1030 ई. में नागवंशी शासक सोमेश्वर देव ने अपने रानी के लिये बनवया था। दो गर्भगृह वाले इस मंदिर में दो शिवलिंग स्थापित है। इस मंदिर का पुनर्निर्माण 2003 में पुरातत्व विभाग द्वारा कराया गया। यहां पर बत्तीसा मंदिर नामक महत्वपूर्ण मंदिर विद्यमान है जिसमें 32 स्तंभों पर आधारित बड़ा मण्डप है, जो दो मंदिरों से संबंध है।

पर्यटन स्थल

I. ढोलकल गणेश (बैलाडीला)

ढोलकल ग्राम में 300 मीटर ऊँची पहाड़ी की चोटी पर यह दुर्लभ विशालकाय गणपति की प्रतिमा। स्थपित है। इस प्रतिमा को एकदंत गणपति कहा जाता है। 6 फीट ऊँची 212 फीट चौड़ी ग्रेनाईट पत्थर से निर्मित यह प्रतिमा वास्तुकला की दृष्टि से अत्यन्त कलात्मक है। गणपति की इस प्रतिमा में ऊपरी दांये हाथ में परशु, ऊपरी बायें हाथ में टूटा हुआ एक दंत, नीचे दांये हाथ में अभय मुद्रा में अक्षमाला धारण किए हुए तथा नीचे बांये हाथ में मोदक धारण किए हुए आयुध के रूप में अलंकृत है। पर्यकासन मुद्रा में बैठे हुए गणपति का सूंड बायीं ओर घूमती हुई शिल्पांकित है तथा उदर में सर्प लपेटे हुए तथा संकल को जनेऊ के रूप में धारण किए हुए है।

II. बारसूर

मंदिरों की नगरी बारसूर ऐतिहासिक, कला सांस्कृतिक स्थल के रूप में चिन्हित है। बारसूर दंतेवाड़ा जिले में इंद्रावती नदी के तट पर स्थित है। मामा-भांजा मंदिर की वास्तु संरचना एवं कलाशैली अद्वितीय है। गणेश की विशाल प्रतिमा विश्व के अनुपम मूर्तियों में से एक है। देवराली मंदिर, चंद्रादित्य मंदिर आदि धार्मिक आस्था का केंद्र है।

III. बैलाडीला

‘भारत की पहली खुली खदान’ बैलाडीला सार्वजनिक महत्व का स्थल है। सर्वोत्तम किस्म के हेमेटाइट लौह अयस्क पाया जाना समृद्धि का द्योतक है। दण्डकारण्य की सबसे ऊँची चोटी नंदीराज और आकाश नगर दर्शनीय स्थल है। यहां देश का सबसे बड़ा कन्वेयर तंत्र स्थापित है। जापान जैसे विकसित देश के निर्भरता यहाँ के सामरिक महत्व को दर्शाता है।

IV. आकाश नगर

प्राकृतिक आकर्षण का केंद्र आकाश नगर कई सालों से सबसे ज्यादा देखी जाने वाली पर्यटन स्थलों में से एक रहा है। छत्तीसगढ़ का यह पर्यटन स्थल निश्चित रूप से एक थके हुए यात्री के लिए उत्तेजित साबित होगा क्योंकि यह देश के अतीत के साथ भरपूर प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ ऐतिहासिक बंधन प्रदान करता है।

V. कैलाश नगर

कैलाश नगर दंतेवाड़ा का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। बैलाडीला पर्वत श्रृंखला का कैलाश नगर अपने चरम पर एक चोटी, साहसी और सुंदर है।

VI. दंतेवाडा

प्रसिद्ध दंतेश्वरी माता का मंदिर इसी तहसील में है। दन्तेश्वरी माता के मंदिर का निर्माण रानी भाग्येश्वरी देवी ने कराया था। यहां एशिया की सबसे ऊंची वाल्टेयर, रेल्वे लाईन स्थित है। विश्व प्रसिद्ध लौह अयस्क, किरंदुल और बैलाडीला की खदानें इसी जिले में है।

प्रमुख व्यक्तित्व

1. महेन्द्र कर्मा

उनका जन्म 5 अगस्त 1950 दंतेवाड़ा जिले में हुआ था। उन्होंने 1969 में जगदलपुर के उच्च माध्यमिक विद्यालय से अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की और 1975 में दंतेश्वरी कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्होनें 1991 में जनजागरण अभियान शुरू किया तथा 2003-08 तक छ.ग. विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे तथा 2000-03 छत्तीसगढ़ में उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री रहे। 2005 में, उन्होंने छत्तीसगढ़ में नक्सलियों (माओवादियों) के खिलाफ सलवा जुडूम आंदोलन का आयोजन करने में एक शीर्ष भूमिका निभाई। 25 मई, 2013 को दरभा में माओवादी हमले में उनका निधन हो गया। इन्हें बस्तर टाईगर के रूप में जाना जाता है।

II. सोनी सोरी

  • जन्म-1975
यह आदिवासी स्कूल शिक्षक समेली गांव में आम आदमी पार्टी के राजनीतिक नेता बने। 2011 में माओवादीयों के लिये एक संवेदना के रूप में कार्य करने के आरोप में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। तथा अप्रैल 2013 को जेल से रिहा होने के बाद इन्होंने माओवादी विद्रोहियों और सरकार के बीच संघर्ष में पकड़े गये लोगों के अधिकारों के लिए प्रचार करना शुरू किया तथा आम आदमी पार्टी में शामिल हुए। फरवरी 2016 में दंतेवाड़ा जिले में अज्ञात लोगों द्वारा एसिड हमले का शिकार हो गये। सोनी ने कहा जीवन में मेरा लक्ष्य आदिवासियों के लिए न्याय प्राप्त करना है। 18 मई 2018 को इन्होंने जोखिम पर मानव अधिकार रक्षकों के लिए फट लाईन डिफेडर पुरस्कार जीता।

आंदोलन

सलवा जुडुम आंदोलन

सलवा जुडुम आंदोलन नक्सली हिंसा के खिलाफ स्थानीय समुदाय द्वारा चलाया गया आंदोलन है। आदिवासी और सटे इलाकों में चल रहे सरकार नक्सल हिंसा में अक्सर आम आदमी भी निशाना बनते आये हैं। कुछ स्थानीय नेताओं ने नक्सली हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई, जिसमें महेन्द्र‌ कर्मा का नाम प्रमुख है। जिसका नाम सलवा जुडुम पड़ा। 25 मई 2013 को इनके नेता और कांग्रेस सदस्य महेन्द्र कर्मा की हत्या नक्सलियों ने की।
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