# राजनीति विज्ञान का अर्थ, परिभाषाएं, विशेषताएं | Features of Political Science

राजनीति विज्ञान का अर्थ :

राजनीति विज्ञान के जनक होने का श्रेय यूनानियों को दिया जाता है, जिनमें प्लेटो व अरस्तू का योगदान उल्लेखनीय है। यूनानियों ने ही सबसे पहले राजनीतिक प्रश्नों को आलोचनात्मक और तर्क सम्मत चिन्तन की दृष्टि से देखा। हिन्दी भाषा का ‘राजनीति‘ शब्द, अंग्रेजी भाषा के ‘पॉलिटिक्स‘ (Politics) का अनुवाद है। अंग्रेजी भाषा का ‘पॉलिटिक्स’ शब्द यूनान भाषा के ‘पोलिस‘ शब्द का रूपान्तर है। यूनानी भाषा में ‘पोलिस’ शब्द का अर्थ है- नगर-राज्य (City State)। इन नगर राज्यों से सम्बद्ध विषयों को ‘पॉलिटिक्स’ कहा जाता था। उस समय नगर और राज्य पर्यायवाची शब्द थे, परन्तु धीरे-धीरे राज्य के स्वरूप में परिवर्तन आया और आज इन राज्यों का स्थान राष्ट्रीय राज्यों ने ले लिया है, अतः राज्य के इस विकसित और विस्तृत रूप से सम्बन्धित विषय को ‘राजनीति विज्ञान‘ कहा जाने लगा।

प्राचीन भारतीय शास्त्री ‘कौटिल्य’ ने भी अपनी प्रसिद्ध कृति ‘अर्थशास्त्र’ में लिखा है कि “राजनीतिशास्त्र राज्य सम्बन्धी विषयों का अध्ययन करता है।” आधुनिक युग में राज्य के स्वरूप, कार्य-क्षेत्र आदि में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं, जिसके कारण राजनीतिशास्त्र को केवल राज्य के अध्ययन तक सीमित न मानकर उसमें सरकार के अध्ययन को भी सम्मिलित कर लिया गया है। अन्य शब्दों में, राजनीतिशास्त्र राज्य और सरकार दोनों का अध्ययन करता है।

राजनीति-शास्त्र (विज्ञान) की परिभाषा :

राजनीति विज्ञान की सर्वस्वीकृत परिभाषा देना कठिन है। राजनीति विज्ञान की परिभाषा विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोणों से की है। गार्नर ने ठीक ही कहा है कि “राजनीति विज्ञान की उतनी ही परिभाषाएँ हैं, जितने राजनीति विज्ञान के लेखक है।”

राजनीति विज्ञान की परिभाषा दो दृष्टिकोणों से की गयी है-

  1. परम्परागत दृष्टिकोण
  2. आधुनिक दृष्टिकोण

1. परम्परागत दृष्टिकोण

परम्परागत राजनीति विज्ञान कल्पना और दर्शन पर आधारित है। राजनीति विज्ञान की परिभाषा देते हुए पाश्चात्य विद्वानों ने उसके अलग-अलग पहलुओं को देखा है। यही कारण है कि उनके मतों में भिन्नता है। परम्परागत दृष्टिकोण में राजनीति शास्त्र को चार अर्थों में परिभाषित किया जाता है –

  1. राज्य के अध्ययन के रूप में
  2. सरकार के अध्ययन के रूप में
  3. राज्य और सरकार के अध्ययन के रूप में
  4. राज्य सरकार और व्यक्ति के अध्ययन के रूप में
A. राज्य के अध्ययन के रूप में –
  • गैरिस के शब्दों में, “राजनीतिशास्त्र राज्य को एक शक्ति संस्था के रूप में मानता है, जो राज्य के समस्त संबंधों, उसकी उत्पत्ति, उसके स्थान, उसके उद्देश्य, उसके नैतिक महत्व, उसके आर्थिक समस्याओं, उसके वित्तीय पहलु आदि का विवेचना करता है।”
  • गार्नर के मतानुसार, “राजनीति विज्ञान का प्रारम्भ और अन्त राज्य से होता है।”
B. सरकार के अध्ययन के रूप में –
  • सीले के शब्दों में, “राजनीति विज्ञान शासन सम्बन्धी बातों का ठीक उसी प्रकार अध्ययन करता है, जिस प्रकार अर्थशास्त्र सम्पत्ति का, जीव विज्ञान जीव का, बीजगणित अंकों का तथा रेखागणित स्थान और परिमाण का अध्ययन करता है।”
  • लीलॉक के अनुसार, “राजनीतिशास्त्र सरकार से संबंधित अध्ययन है।”
C. राज्य और सरकार के अध्ययन के रूप में –
  • डीमॉक के शब्दों में, “राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध राज्य तथा उसके साधन सरकार से है।”
  • पाल जेनेट के शब्दों में, “राजनीति विज्ञान समाज विज्ञान का वह अंग है, जिसमें राज्य के आधार पर सरकार के सिद्धान्तों पर विचार किया जाता है।”
D. राज्य सरकार और व्यक्ति के अध्ययन के रूप में –
  • प्रो. लॉस्की के शब्दों में, “राजनीति विज्ञान के अध्ययन का सम्बन्ध संगठित राज्यों से सम्बन्धित मनुष्य के जीवन से है।”
  • हर्मन हेलर के अनुसार, “राजनीति विज्ञान के सर्वांगीण स्वरूप का निर्धारण व्यक्ति संबंधी मूलभूत पूर्व मान्यताओं से होता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के अध्ययन से स्पष्ट है कि राजनीति विज्ञान राज्य पर केन्द्रित है तथा राज्य ही राजनीति विज्ञान के अध्ययन पर प्रतिपाद्य विषय है। राज्य मानवों का एक विशेष संगठन है, जिसकी अभिव्यक्ति सरकार द्वारा होती है। अतः राज्य के अन्तर्गत मनुष्य और सरकार का विस्तृत अध्ययन राजनीति विज्ञान में होता है, क्योंकि व्यक्ति के बिना राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है एवं सरकार राज्य की इच्छाओं को क्रियान्वित करने वाला साधन है। इसलिए राजनीति विज्ञान में व्यक्ति और सरकार की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। इस सम्बन्ध में प्रो. लॉस्की ने कहा है, “राजनीति विज्ञान के अध्ययन का सम्बन्ध संगठित राज्यों से सम्बन्धित मनुष्य के जीवन से है,” अतः राज्य के अन्तर्गत व्यक्ति और सरकार दोनों का राजनीति विज्ञान के अध्ययन में विशिष्ट स्थान है।

2. आधुनिक दृष्टिकोण

आधुनिक समय में कुछ विद्वानों ने राजनीति विज्ञान की परिभाषा को राज्य तक सीमित नहीं रखा है। इन विद्वानों ने राजनीति विज्ञान के अध्ययन में राज्य के अतिरिक्त सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था को सम्मिलित किया है। इनके अनुसार राजनीति विज्ञान समाज विज्ञान का वह अंग है, जिसके अन्तर्गत मानवीय जीवन के राजनीतिक पक्ष का और जीवन के इस पक्ष से सम्बन्धित राज्य, सरकार तथा अन्य सम्बन्धित संगठनों का अध्ययन है।

इस दृष्टिकोण के विचारक कौलिन, लासवेल, मारगेन्थी, डहल, डेविड ईस्टन आदि हैं। ये सभी व्यवहारवादी विचारक हैं, जिनके विचारानुसार राजनीति विज्ञान, मनुष्य के राजनीति विज्ञान का अध्ययन उसके सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन के परिप्रेक्ष्य में करता है।

  • डॉ. इकबाल नारायण के अनुसार, “राजनीति विज्ञान की परिभाषा हम एक ऐसे विज्ञान के रूप में कर सकते हैं, जो मनुष्य के कार्य-कलापों का अध्ययन करता है, जिनका सम्बन्ध उनके राजनीतिक पहलू से होता है तथा उस अध्ययन में वह मनुष्य के जीवन के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, धार्मिक आदि सभी पहलुओं के पारस्परिक प्रभावों का भी अध्ययन करता है।”
  • हट्टन के शब्दों में, “शक्ति, शासन और अधिकार राजनीति विज्ञान है।”
  • डॉ. नागपाल के अनुसार, “राजनीति विज्ञान राज्य का, शासन का, मनुष्य के राजनीतिक क्रिया-कलापों का विज्ञान है।”

निष्कर्ष- आधुनिक दृष्टिकोण की राजनीति विज्ञान की सभी परिभाषाओं का स्तर यह है कि राजनीति विज्ञान, समाज विज्ञान का वह अंग है, जिसके अंतर्गत राज्य तथा शासन के अध्ययन के साथ-साथ मनुष्य के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक कार्य-कलापों तथा उनकी प्रक्रियाओं का अध्ययन भी किया जाता है। संक्षेप में, राजनीति विज्ञान को सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन कहा जा सकता है।

राजनीति विज्ञान की विशेषताएं :

1. परम्परावादी राजनीति विज्ञान की विशेषताएँ

परम्परागत राजनीति विज्ञान कल्पना और दर्शन पर आधारित है। यह अपने प्रतिपादक राजनीतिक दार्शनिक एवं चिन्तकों के व्यक्तित्व एवं दृष्टिकोण से प्रभावित रहा है। उन्होंने मानवीय चिन्तन में सामाजिक लक्ष्यों तथा मूल्यों की ओर ध्यान दिया है। आधुनिक युग में परम्परागत राजनीति विज्ञान के प्रबल समर्थकों की काफी संख्या है, जिनमें रूसो, काण्ट, हीगल, टी0एच0 ग्रीन, बोसांके, लास्की, ओकशॉट, लीलॉक, लियो स्ट्रॉस इत्यादि प्रमुख हैं।

परम्परागत राजनीति विज्ञान की प्रमुख विशेषतायें निम्नवत् स्पष्ट की जा सकती हैं-

1. ‘राज्य’ की प्रधानता एवं राज्य को एक नैतिक सामाजिक अनिवार्य संस्था माना है। फलतः उद्देश्य आदर्श राज्य की खोज के साथ ही इसके लिए अत्यधिक हटधर्मिता रही।

2. कल्पनात्मक, आदर्शों का अध्ययन एवं दर्शनशास्त्र से घनिष्ठता।

3. अध्ययन प्रतिपादक राजनीतिक दार्शनिकों एवं चिन्तकों के व्यक्तित्व से प्रभावित, फलतः व्यक्तिनिष्ठ अध्ययन।

4. अपरिष्कृत परम्परागत अध्ययन पद्धतियों (ऐतिहासिक) दार्शनिक का प्रयोग, फलतः वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग नहीं किया गया।

5. अध्ययन में नैतिकता और राजनीतिक मूल्यों पर विशेष बल दिया गया है।

6. यह प्रधानतः संकुचित अध्ययन है क्योंकि इसमें सिर्फ पाश्चात्य राज्यों की शासन व्यवस्था पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। एशिया, अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका आदि की राजनीतिक व्यवस्थाओं के अध्ययन को महत्व नहीं दिया गया है।

2. आधुनिक राजनीति विज्ञान की विशेषताएं

आधुनिक राजनीति विज्ञान अभी विकासशील अवस्था में है। आधुनिक राजनीति विज्ञान की मुख्य विशेषताएँ निम्नांकित है-

.) आधुनिक राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन मुक्तता की प्रवृत्ति पायी जाती है। यह परम्परागत राजनीति विज्ञान की सीमाओं को तोड़कर अध्ययन करते हैं। राजनीतिक घटनाएँ तथा तथ्य जहाँ भी उपलब्ध हों, चाहे वे समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र या धर्मशास्त्र के विषय हों, अब राजनीति विज्ञान के विषय बन गये हैं। उनका मानना है कि राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित करने वाली वास्तविक परिस्थितियों का अध्ययन किया जाये तथा उन्हीं के आधार पर राजनीतिक घटनाक्रम की व्याख्या व विश्लेषण किया जाये।

.) आधुनिक राजनीति विज्ञान व्यवहारिकतावादी अनुभावनात्मक व यर्थाथवादी दृष्टिकोण अपनाने पर जोर देता है। अधिकांश अध्ययन-ग्रंथ विश्लेषणात्मक व अनुभवात्मक हैं, जो पर्यवेक्षण माप, तार्किकता, युक्तियुक्तता आदि तकनीकों पर आधारित हैं।

.) आधुनिक राजनीति विज्ञान विभिन्न सामाजिक विज्ञानों तथा प्राकृतिक विज्ञानों से काफी प्रभावित रहा है। अतः नवीन पद्यतियों में वैज्ञानिक पद्यति को प्रमुख स्थान दिया गया है। वैज्ञानिक पद्यति के प्रयोग द्वारा अब राजनीति वैज्ञानिक सामान्यीकरणों व्याख्याओं और सिद्धान्त-निर्माण में लगे हैं। अब सिद्धान्त-निर्माण कठोर शोध प्रक्रियाओं पर आधारित है। शोध व सिद्धान्त में निश्चित संबंध में पाये जाने लगे हैं। सिद्धान्त निर्माण की प्रक्रिया अब शोध-उन्मुखी हो गयी है।

.) आधुनिक राजनीति विज्ञान के विद्वान इस तथ्य से सुपरिचित हैं कि जिन संस्थाओं और विषयों का अध्ययन वे करते हैं, उनका अध्ययन अन्य अनुशासनों में भी किया जा रहा है। अतः राजनीति विज्ञान को पृथक अस्तित्व प्रदान किया जाना चाहिए। डेविड ईस्टन, राईट डहल, आमण्ड, पॉवेल, कोलमैन, ल्यूसियन पाई, सिडनी वर्बा, कार्ल डायच, मैक्रीडीस आदि विद्वानों ने राजनीति विज्ञान को स्वतंत्र अनुशासन बनाये जाने के प्रयत्न किये।

.) आधुनिक राजनीति विज्ञान के विद्वान राजनीतिक तथ्यों और निष्कर्षो में एक सम्बद्धता एवं क्रमबद्धता लाना चाहते हैं। अपने क्षेत्र में विशिष्ट सुविज्ञता विकसित करना चाहते हैं ताकि वह स्वायत्ता प्राप्त कर सके। इसके लिए उन्होंने व्यवस्था सिद्धान्त या सामान्य व्यवस्था सिद्धान्त को राजनीतिक विज्ञान में ग्रहण किया। नियंत्रण और नियमन से संबंधित होने के कारण राजनीति विज्ञान की मौलिकता स्वतः प्रमाणित है।

.) आधुनिक राजनीति विज्ञान अध्ययन की इकाई के रूप में मानव व्यवहार को चुनता है। अतः उससे संबंधित सभी तत्वों व तथ्यों का विशलेषण किया जाना आवश्यक हो जाता है। इस विषय की अन्तः अनुशासनात्मकता इसका प्रमुख आधार है।

.) आधुनिक राजनीति विज्ञान तात्कालीक समस्याओं का समाधान करने पर ध्यान देता है। व्यवहारिकतावादी क्रांति के माध्यम से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि राजनीति विज्ञान विशुद्ध विज्ञान बनकर मात्र प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों तक सीमित हो जायेगा, किन्तु उत्तरव्यवहारिकतावादी युग ने अपने आपकों मूल्यों, नीतियों और समस्याओं से सम्बद्ध रखा तथा अपने अध्ययन से नागरिकों शासन को नीति-निर्माताओं व राजनीतिज्ञों को लाभान्वित करने का प्रयास।किया है।

.) आधुनिक राजनीति विज्ञान की अभी अपनी प्रारम्भिक अवस्था है। उसके पास अभी निश्चित सिद्धान्तों का अभाव है, किन्तु वह इस दिशा में प्रयत्नरत है। माइकेल हस इस ओर संकेत करते हुए तीन बिन्दुओं के आधार पर यह बताते है कि आधुनिक राजनीति विज्ञान में सिद्धान्त निर्माण की प्रवृत्ति दिखायी देती है। ये तीन बिन्दु हैं- 1. निर्णय-निर्माण 2. राजनीतिक विकास 3. द्वन्द तथा एकीकरण।

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