# छत्तीसगढ़ की लोक कथाएं एवं लोक नाट्य | छत्तीसगढ़ की लोक गाथा | Folk Tales And Folk Drama of Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ के लोक संस्कृति में सृष्टि के रहस्यों से लेकर प्राचीन तत्त्वों एवं भावनाओं के दर्शन होते रहे हैं। अलौकिकता, रहस्य, रोमांच इसकी रोचकता को बढ़ाते हैं। लोककथाएँ, लोकमानस की मूल भावना के रूप को स्थूल प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त करती रही है, वहीं लोकनाट्य छत्तीसगढ़ के पौराणिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप को प्रत्यक्ष प्रदर्शित करती है।

छत्तीसगढ़ में प्रचलित कुछ प्रमुख लोककथा और लोकनाट्य निम्न है –


छत्तीसगढ़ की लोक गाथा/कथाएं


★ भरथरी

यह छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोककथा गायन है। इसमें मुख्यतः राजा भरथरी और रानी पिंगला के वियोग गाथा का वर्णन किया जाता है। इस लोककथा में श्रृंगार रस की प्रधानता होती है। वाद्य यंत्र सारंगी व इकतारा का प्रयोग किया जाता है।

भरथरी गायन की प्रमुख गायिका – सुरुज बाई खांडे (बिलासपुर).

★ लोरिक चंदा (चंदैनी गायन)

लोरिक व चंदा के प्रेम प्रसंग पर आधारित यह मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित प्रेम गाथा है। इसे छत्तीसगढ़ में भी “चंदैनी गायन” के रूप में क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ गाया जाता है। छत्तीसगढ़ में चंदैनी गायन के समय प्रमुख वाद्ययंत्र के रूप में टिमकी और ढोलक का प्रयोग किया जाता है।

चंदैनी गायन के प्रमुख कलाकार – चिंता दास.

★ ढोलामारू

ढोलामारु मूलतः राजस्थान की लोकगाथा है, लेकिन इसका प्रचलन पूरे उत्तर भारत में पाया जाता है। इस प्रेम गीत को स्थानीय लोकशैली की कुछ विशेषताओं के साथ छत्तीसगढ़ में भी गाया जाता है।

प्रमुख कलाकार – सुरुज बाई खांडे & जगन्नाथ कुम्हार.

★ पंडवानी

पंडवानी सबल सिंह चौहान द्वारा रचित छत्तीसगढ़ी महाभारत पर आधारित महाभारत कालीन पांडवों की कथा का छत्तीसगढ़ी स्वरूप है। इस कथा में प्रमुख नायक भीम को लिया जाता है।

छत्तीसगढ़ी पंडवानी को दो शैली प्रचलित है –

  1. वेदमाती
  2. कापालिक

1. वेदमती शैली – शास्त्र सम्मत गायन (गायन + नृत्य).

प्रमुख गायक –

  • झाड़ूराम देवांगन
  • पुनाराम निषाद
  • ऋतु वर्मा

2. कापालिक शैली – सिर्फ कथात्मक.

  • यह कथा गायक के स्मृति या कतार में होती है।
  • देवार जातियों में प्रचलित।
  • प्रमुख कलाकार – श्रीमती तीजन बाई (पद्मश्री)
  • प्रमुख वाद्य यंत्र- तंबूरा।

पंडवानी में एक मुख्य गायक के अलावा अन्य अनेक कलाकार भी शामिल होते हैं। जिनमें “रागी” की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जो प्रस्तुतिकरण के दौरान बीच बीच में “हुंकारी” भरता है।

★ फुलकुंवर की गाथा

इस गाथा में स्थानीय शासक राजा जनक की पत्नी फुलकुंवर की मुंगलों से युद्ध किए जाने और इस क्रम में फुलकुंवर की पराक्रम व वीरता का वर्णन किया जाता है।

★ फुलबासन की कथा

श्री राम के वनवास काल के दौरान जब उन्होंने लक्ष्मण व सीता के साथ छत्तीसगढ़ के क्षेत्र में समय व्यतीत कर रहे थे, उस समय सीता द्वारा लक्ष्मण जी से फूलबासन नामक पुष्प की मांग पर आधारित कथा है।

★ कल्याणसाय की गाथा

यह छत्तीसगढ़ के कल्चुरी शासन कालीन गाथा है जिसमें कल्याणसाय का शौर्य और वीरता का उल्लेख किया जाता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय लोक गाथा प्रचलित है, जो विभिन्न बोलियों में स्थानीय स्तर पर गाई जाती है।

इस क्रम में बस्तर क्षेत्र में “भूमकाल गीत” भतरी प्रचलन में, “धनकुल गीत” हल्बी बोली में, साथ ही सरगुजा संभाग में कुडुख बोली में “धर्मेश की गाथा” प्रचलित है। इसके अलावा दुर्ग संभाग में “दशमत गाथा“, “अहिमन रानी की गाथा” आदि प्रचलित है।

★ बांस गीत

बांस गीत को छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख गाथा गायन माना जाता है। यह मुख्यतः यादवों के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। इसकी प्रस्तुति में गायक, वादक व रागी की अहम के होती है। इसमें बांस द्वारा निर्मित वाद्ययंत्र का प्रयोग किया जाता है। यह गाथा करुणा प्रधान विषयों पर आधारित है। सीता बसंत, मोरध्वज, आदि इस गाथा के प्रमुख नायक हैं। इसके प्रमुख कलाकार कैजूराम यादव, नूकुल यादव हैं।

★ ददरिया गीत

ददरिया गीत को “छत्तीसगढ़ी गीतों का राजा” कहा जाता है। ददरिया का शाब्दिक अर्थ – दर्द से भरे गीत है। यह मुख्यतः श्रृंगार प्रधान लोकगीत है। इसमें प्रेमगीतों को विभिन्न स्वरूपों में गाया जाता है। इसके अंतर्गत स्त्री व पुरुष दोनों की अहम भूमिका होती है। प्रश्नोत्तर या सवाल जवाब शैली का प्रयोग किया जाता है। बैगा जनजाति में विशेष प्रचलन, मुख्यतः दशहरा के अवसर पर इसका आयोजन किया जाता है, गायन के साथ नृत्य भी करते हैं। इस अवसर पर जीवनसाथी के चयन की भी मान्यता है।

★ जगार गीत

छत्तीसगढ़ के समय दक्षिणी भाग में इसका प्रचलन है। बस्तर क्षेत्र में इसे हल्बी बोली में प्रस्तूत किया जाता है। इसे धनकुल गीत भी कहा जाता है। प्रमुख वाद्य यंत्र धनकुल का प्रयोग किया जाता है।

इसके अलावा छत्तीसगढ़ में विभिन्न पर्वों या अवसरों पर भी लोकगीत गाए जाने का प्रचलन है जिनमें प्रमुख रूप से –

  • जंवारा गीत – मां दुर्गा देवी की स्तुति में।
  • जसगीत – देवी पूजा में।
  • भोजली गीत – भोजली पर्व के समय।
  • सवनाही गीत – वर्षा ऋतु के आगमन पर।
  • सेवा गीत – नवरात्रि समय देवी पूजा के लिए।
आदि उल्लेखनीय है।

इनके अलावा वैवाहिक संस्कार के समय विभिन्न परंपराओं का निर्वहन करते हुए अनेक लोकगीत गाए जाते हैं।


छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य


★ नाचा

नाचा छत्तीसगढ़ संस्कृति का एक प्रसिद्ध स्वरूप है। इसके आयोजन हेतु विशेष पर्व या अवसर की आवश्यकता नहीं होती। नाचा का विषय-वस्तु आम-जन से जुड़ी होती है, इस लोकनाट्य के माध्यम से मुख्यतः सामाजिक कुरीतियों, सामाजिक विषमताओं व आडम्बरों पर प्रहार किया जाता है। इसमें हास्य व व्यंग्य की प्रमुख भूमिका होती है।

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सामान्यतः पुरुष कलाकार ही भाग लेते हैं और महिलाओं की पात्र भी स्वयं निभाते हैं। नाचा का आयोजन समूह के रूप में किया जाता है इसमें गीत, संगीत व नृत्य तीनों की प्रस्तुति होती है। इसका मंचन खुले स्थानों पर किया जाता है।

नाचा को लोकप्रिय बनाने में प्रमुख कलाकारों की भूमिका रही है जिनमें दाऊ दुलारसिंह मंदराजी, रामचंद्र देशमुख, महासिंह चंद्राकर, हबीब तनवीर आदि उल्लेखनीय है। दाऊ मंदराजी को “नाचा के भीष्म पितामह” की संज्ञा दी गई है।

नाचा को लोकप्रिय बनाने हेतु निम्न मंचन की स्थापना की गई है –

  • नवेली नाचा पार्टी – (दाऊ दुलारसिंह मंदराजी के द्वारा)
  • चंदैनी गोंदा – (रामचंद्र देशमुख के द्वारा)
  • सोनहा बिहान – (महाशय चंद्राकर के द्वारा)
  • न्यू थियेटर – (हबीब तनवीर के द्वारा)

इन मंचों के माध्यम से स्थानीय कलाकारों ने नाचा को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

★ रहस

रहस श्रीकृष्ण लीला का छत्तीसगढ़ी रूपांतरण है जो कि उत्तर प्रदेश की रासलीला से प्रभावित नाट्यलीला है। यद्यपि छत्तीसगढ़ में भी इसका आधार “श्रीमद्भागवत” के अलावा रेवाराम द्वारा लिखित “पांडुलिपि” है। रहस्य में श्रीकृष्ण को नायक और कंश को प्रतिनायक के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। इसका आयोजन खुले मंच या बेड़े में किया जाता है। रहस की प्रमुख तीन नर्तक की भूमिका; जिसे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का प्रमुख माना जाता है। इसके अंतर्गत श्रीकृष्ण, पांडवों व अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित की जाती है।

नाचा के दो प्रकार बताए गए हैं
  1. संवर्ण रहस
  2. सतनामी रहस
  • बिलासपुर क्षेत्र की रहस को प्रमुख मानी जाती है।
  • प्रमुख कलाकार – केसरी सिंह, मंझला महाराज।

★ गम्मत

गम्मत को भी नाचा से संबंधित नाट्य माना जाता है। इसमें लोकजीवन के सुख-दुख संबंधित विषयों का प्रदर्शन किया जाता है। मुख्यतः गम्मत के द्वारा हास्य व्यंग्य की शैली में सामाजिक बुराइयों व आडम्बरों पर प्रहार किया जाता है। इसका संवाद गायन शैली में होता है।

गम्मत के दो स्वरूप प्रचलित हैं –
  1. खड़ी गम्मत
  2. रतनपुरिया गम्मत

खड़ी गम्मत में कलाकार खड़े होकर प्रस्तुति देते हैं जबकि रतनपुरिया गम्मत में बैठकर प्रस्तुति करते हैं।

★ खम्भ-स्वांग

खम्भ-स्वांग मुख्यतः कोरकू जनजाति में प्रचलित है। इसका आयोजन कुंवार माह में नवरात्रि से देवप्रबोधिनी एकादशी तक किया जाता है। मान्यतानुसार रावण पुत्र मेघनाथ ने एक बार कोरकु जनजाति की रक्षा की थी जिस की स्मृति में यह आयोजन किया जाता है जिसमें एक खंबे के पास प्रस्तुतीकरण किया जाता है।

★ दही-काण्ड

मुख्यतः छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों में प्रचलित इस नाट्य में कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर श्रीकृष्ण के जीवनपक्षों का प्रस्तुतीकरण किया जाता है। कदम की वृक्ष के नीचे राधा-कृष्ण की मूर्ति पर स्थापित कर इसके आसपास श्रीकृष्ण से जुड़े तथ्यों का प्रदर्शन किया जाता है। इसमें श्रीकृष्ण के मित्र मनसुका का पात्र विदूषक या जोकर की भूमिका होती है जो दही से भरी मटकी फोड़ता है।

★ माओपाटा

यह मुड़िया जनजाति का शिकार-नाटिका है, इसका स्वरूप गीतनाट्य की तरह है। इसमें आखेट पर जाने की तैयारी से लेकर आखेट करने व सकुशल वापस लौटने और विजय समारोह मनाया जाने तक की घटनाओं का नाटकीय प्रस्तुतिकरण किया जाता है। सामान्यतः दो युवक गौर या बाइसन बनते है। इसमें टिमकी आदि वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है।

★ भतरानाट्य

भतरा जनजाति की यह नृत्य मड़ई या अन्य शुभ अवसरों पर आयोजित किया जाता है। इस नाट्य में उड़िया व अन्य भाषाओं का प्रभाव दिखाई देता है। यह कथात्मक व पौराणिक विषयों पर आधारित होती है। इसमें नगाड़ा, मंजीरा, मृदंग आदि वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है। इस नाट्य में प्रायः मुखौटों की भूमिका होती है।

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