# छत्तीसगढ़ में प्रचलित लोकगीत | Folk Songs of Chhattisgarh | Chhattisgarh Ke Lok Geet

छत्तीसगढ़ी लोक गीत

किसी क्षेत्र विशेष में लोक संस्कृति के विकास हेतु लोकगीतों का प्रमुख योगदान होता है। इन गीतों का कोई लिपिबद्ध संग्रह नहीं होता, यही कारण है कि इनकी तुलना वेदों से की जाती है जो श्रुति पर आधारित रहते हैं। लोकगीतों के लिपिबद्ध होने से उनकी मौलिकता नष्ट हो जाती है साथ ही समयानुसार परिवर्तनशीलता का गुण भी नष्ट हो जाता है।
छत्तीसगढ़ के लोक गीत | Folk Songs of Chhattisgarh | Chhattisgarh Ke Lok Geet | छत्तीसगढ़ी लोक गीत | छत्तीसगढ़ में प्रचलित लोकगीतों के नाम | लोक गीत
लोकगीतों की मौलिकता ही उनकी विशेषता होती है। हृदय की गहराईयों से निकलने के कारण इनमें कृत्रिमता का अभाव होता है। लोकगीतों का जन्म जीवन के अनुभवों से होता है। इन गीत की रचना गीतकार किसी खास उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं करते हैं। आंतरिक भावों को प्रदर्शित करना ही लोकगीतों का मुख्य उद्देश्य होता है। लोकगीतों के गीतकार गीत में अज्ञात रहता है।
लोकगीतों की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है –
  • लोकगीतों के मूल में जातीय विशेषताएं आदिम परंपराएं होती है, इनमें मनोरंजन तत्व के साथ-साथ संस्कृति और संस्कारों का चित्रण मिलता है।
  • लोकगीत अलिखित होते हैं।
  • लोकगीतों की उत्पत्ति प्रकृति से होती है, अर्थात् इनका रचना काल अज्ञात रहता है।
  • भावना प्रधान तत्व व स्वाभाविकता होती है।

छत्तीसगढ़ के लोकगीत

छत्तीसगढ़ के लोकगीतों का वर्गीकरण निम्न रूप में किया जा सकता है –
 
संस्कार गीत
  • जन्म के गीत
  • विवाह के गीत
पर्व गीत
  • सुआ गीत
  • गौरा गीत
  • मड़ई गीत
  • डंडा गीत
  • फाग गीत
  • जवांरा गीत
  • भोजली गीत आदि।
श्रृंगार गीत
  • ददरिया
  • बारहमासी
विविध गीत
  • करमा गीत
  • बांस गीत
  • पंडवानी गीत
  • पंथी गीत आदि।

जन्म गीत

स्त्री के गर्भावस्था से लेकर शिशु के जन्म तक विभिन्न गीत गाए जाते हैं और उल्लासमय वातावरण निर्मित किया जाता है, इन गीतों को “सोहर गीत” कहा जाता है। इन गीतों में गर्भवती माता की भावनाओं, उसकी शारीरिक अवस्थाओं, उल्लासादि का वर्णन किया जाता है। सोहर गीत गाते समय विघ्नहर्ता श्री गणेश जी का स्मरण किया जाता है।

विवाह गीत

छत्तीसगढ़ के लोक जीवन प्रचलित विवाह के विभिन्न चरणों में भिन्न-भिन्न गीत गाए जाते हैं। इन विवाह गीतों में मंगनी जंचनी, चुलमाटी, तेलचघी, बारात प्रस्थान, बारात स्वागत, समधी भेंट, भांवर, टिकावन और विदाई गीत आदि के विभिन्न गीत प्रचलित हैं।
1. मंगनी जंचनी गीत – इन गीतों के साथ ही छत्तीसगढ़ में विवाह की शुरुआत हो जाती है। मंगनी जंचनी का अर्थ है- देखना परखना, शादी से पूर्व लड़का लड़की को पसंद करने का कार्य होता है और सगाई के साथ विवाह की बात पक्की की जाती है।
2. चुलमाटी गीत – विवाह अनुष्ठान की प्रारंभिक प्रक्रिया चुलमाटी होती है। नदी, तालाब या अन्य किसी पवित्र जगह से मिट्टी लाकर घर में चूल्हा बनाया जाता है, जिसमें विवाह के निर्मित पदार्थों का निर्माण किया जाता है। यह गीत तब गाया जाता है जब घर के स्त्रियां नए वस्त्र पहन मिट्टी लेने पवित्र स्थल तक जाती हैं। घर से उस स्थल तक चुलमाटी गीत गुंजायमान होता है।
3. तेलचघी – दूल्हा और दुल्हन को हल्दी तेल चढ़ाते समय यह गीत गाए जाते हैं। यह कार्य वर तथा वधु दोनों पक्षों द्वारा किया जाता है। आंगन में बांसों का मड़वा बनाया जाता है। मड़वा में कलश प्रज्ज्वलित करके लड़का और लड़की को तेल हल्दी लगाया जाता है।
4. बहडोरी गीत – 
 
5. नहडोरी गीत – दूल्हे को स्नान करवाया जाता है और नए वस्त्र व आभूषण पहनाया जाता है। स्त्रियां गाने गाती है, इस रस्म की गानों में दूल्हे का दुल्हिन लाने का आग्रह रहता है। सभी स्त्रियां उसे आशीर्वाद और शुभकामनाएं प्रदान करते हैं।
6. बारात प्रस्थान – वर पक्ष में बारात प्रस्थान के समय घर में स्त्रियां मंगलगीत गाती है।
7. बारात स्वागत – सजी-धजी बारात जब वधू पक्ष के घर पहुंचती है उस समय बारात के स्वागत में अनेक मंगल गीत गाए जाते हैं।
8. परघनी गीत – बारात परघाते समय (बारात के स्वागत के समय) स्त्रियां गीत गाकर हर्ष व्यक्त करती हैं, इस समय बारात पक्ष के लोगों को अनेक तरह से उपमायें देकर चिढ़ाया जाता है।
9. टिकावन गीत – शादी के समय भांवर के पहले टिकावन रस्म होती है, इसमें नाते-रिश्तेदार लड़की को उपहार देते हैं।
10. भांवर गीत – मंडप के नीचे अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए जाते हैं और पाणिग्रहण संस्कार होते हैं। फेरों भांवरों के बीच नारियों द्वारा प्रश्नोत्तर शैली में सु-मधुर गीत गाए जाते हैं।
11. विदाई गीत – विवाह के उल्लासमय वातावरण के पश्चात विदाई की रस्म करुण वातावरण बना देती है। इस अवसर पर दुख व्यक्तिगत न होकर सामूहिक हो जाता है। वधू पक्ष का प्रत्येक व्यक्ति इस दुख में भागी होते हैं।
यह देखा जा सकता है कि विवाह संस्कार में जहां सभी ओर उल्लास, आनंद और उत्साह छाया रहता है, वहीं विदाई के समय यह सारा भाव लुप्त हो जाते हैं। चारों ओर रूदन और आंसू ही दिखाई पड़ता है। लड़की के मां-बाप, भाई-बहन सभी दुखी हो जाते हैं।

पर्व गीत

यदि पर्वों की दृष्टि से देखा जाए तो छत्तीसगढ़ वर्ष के बारहों महीने कोई न कोई पर्व मनाता रहता है, इन विभिन्न पर्वों पर छत्तीसगढ़ के जनजीवन में अनेक लोकगीत भी प्रचलित है। कुछ प्रमुख स्थानीय लोकगीतों का विवरण निम्नानुसार हैं –
सुआ गीत (Suaa Geet) – सुआ या सुवाना स्त्रियों के द्वारा किया जाने वाला नृत्य है, इस नृत्य के साथ सुआ गीत भी गाई जाती है। सुआ नृत्य कुंवार महीने में खरीफ फसल के तैयार होने के बाद और दिवाली के कुछ दिन पूर्व आरंभ किया जाता है।
सुआ गीत-नृत्य में एक टोकरी में मिट्टी के बने दो सुआ और धान की नई बालियां रखकर लाल कपड़े से ढक दिए जाते हैं। टोकरी को लेकर स्त्रियां टोलियों में निकलते हैं और नजदीक गांव के घरों में जाकर अपनी टोकरी को रखकर सभी स्त्रियां टोकरी के चारों ओर खड़ी होकर एक स्वर में गीत गाते हुए ताली के थाप पर वृत्ताकार घेरे में झुककर नाचते हैं। कभी कभी दो दलों में विभक्त होकर परस्पर प्रश्नोत्तर करते हुए गीत गाते है। गीत-नृत्य की समाप्ति पर भेंट स्वरूप उस घर से जो भी सामग्री, चावल, धान, पैसे आदि मिलते है उसे एकत्र करती जाती हैं।
सुआ गीतों में नारी जीवन के सुख-दुख, हर्ष-विषाद की व्यथा का चित्रण होता है। किसी-किसी गीत में यद्यपि हास्य और श्रृंगार रस दिखाई देता है किंतु प्रमुखतः सुआ गीत में करुण रस की प्रधानता होती है।
गौरा गीत (Goura Geet) – कार्तिक महीना छत्तीसगढ़ में अनेक पर्वों का महीना होता है। दीपोत्सव भरे इस महीने में गौरी चौरा में आदिवासी गौरा-गौरी की पूजा अर्चना करते हैं, इस पूजा में गांव के हर व्यक्ति शामिल होते हैं। भगवान शंकर और देवी पार्वती की मिट्टी की मूर्तियां बनाकर चबूतरे पर स्थापित की जाती है। महीने भर चलने वाला यह पर्व दिवाली की अगली सुबह संपन्न होती है, इसके पश्चात गौरा-गौरी की प्रतिमाओं को ग्रामवासी नदी या तालाब में विसर्जित करते हैं। गौरा-गौरी पूजन के समय महिलाएं अनेक गीत गाते है। शिव-पार्वती विवाह का प्रतीकात्मक आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर अनेक विवाह गीत भी गाए जाते हैं साथ ही देवी पार्वती की स्तुति की जाती है।
मड़ई गीत – मड़ई गीत राऊतों के द्वारा गाये जाने वाला गीत है। राऊत लोग स्वयं को श्री कृष्ण के वंशज मानते हैं, दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर से राऊत नृत्य आरंभ होता है।
गोवर्धन पूजा के दिन दहियान (गांव में गाय चराने के लिए ले जाते समय जिस स्थान पर एकत्रित की जाती है) में पूजा अर्चना सम्पन्न करने के पश्चात् उन घरों में, जहां की गायें ये चराते है जाकर गाय भैसों को सुहई बांधते हैं जोकि पलाश वृक्ष की छाल और मयूर पंख से बने होते हैं।
इस अवसर पर राऊत नृत्य भी करते हैं, नृत्य के समय राऊत स्वयं को कौड़ियों और मोर पंखों की सहायता से सजाते हैं, साथ में रखे तेंदू की लाठी को भी घुंघरू और मोर पंख से सजाकर रखते हैं, पैरों में घुंघरू बांधे रहते हैं, नृत्य के बीच बीच में दोहा पढ़ा जाता है, दोहा खत्म होते ही ये झूमकर नाचने लगते हैं। गाए जाने वाले दोहों की विषय वस्तु ऐतिहासिक, सामाजिक, पौराणिक कुछ भी हो सकती है।
राऊत नृत्य के समय गाए जाने वाले गीत को ही “मड़ई गीत” के नाम से जाना जाता है।
फाग गीत – छत्तीसगढ़ अंचल में प्रकृति की रंगीली मनोहर छवि चहुं ओर व्याप्त है। होली पर्व में होलिका दहन के समय फाग गीत गाया जाता है। छत्तीसगढ़ी होली लोकगीतों में जहां एक ओर संयोग पक्ष की मादकता और माधुर्य होती है, वहीं दूसरी ओर विरह के गीतों में व्यथा और टीस देखी जा सकती है।
जवारा गीत – क्वांर और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम 9 दिन “नवरात्र” के माने जाते हैं। देवी के प्रकोप से बचने के लिए तथा उनकी कृपा दृष्टि बनी रहे इस दृष्टि से इन 9 दिनों तक उपवास रखकर शक्ति की पूजा की जाती है। नवरात्र में घट स्थापना की जाती है। भूमि पर बांस की आयताकार चौहदी बनाकर अनाज भिगोया जाता है, इनसे अंकुरित पौधों को ही जवांरा कहते है। नौ दिनों के उपरांत रामनवमी को इन जवारों को नदी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है। जवारा बोकर देवी की शक्ति स्वरूप मानकर उनके आव्हान में जो गीत गाए जाते हैं उन्हें जवारा गीत कहते हैं।
भोजली गीत – यह त्यौहार श्रावण मास में मनाया जाता है। श्रावण शुक्ल को विविध पात्रों और टोकरियों में मिट्टी भरकर गेहूं, धान या मक्का आदि बीज बोया जाता हैं और उन्हें अंधेरे कमरे में रखते हैं। अंकुर आने पर हल्दी पानी डाला जाता है। महिलाएं इकट्ठे होकर रोज धूप-दीप में पूजा करते हैं और भोजली गीत गाती है। रक्षाबंधन के दूसरे दिन भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा को भोजली गीत का जुलूस निकाला जाता है और नदी या तालाब के घाट पर पूजा के पश्चात विसर्जन किया जाता है। भोजली के हरे पीले-पौधे का परस्पर आदान-प्रदान कर परस्पर मैत्री संबंध में बंधते हैं।
★ माता सेवा गीत – भारत के प्रायः हर क्षेत्र में महामारियों को दैवीय प्रकोप माना जाता है और इनसे बचने के लिए अनुष्ठानादि किए जाते हैं। इसी परंपरा में पल्लवित माता सेवा रूपी अनुष्ठान छत्तीसगढ़ में माता सेवा गीत की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
चिकित्सा दृष्टिकोण से विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि माता या चेचक रोग चूंकि एक त्रिदोषण और संक्रामक रोग है। अतः इसके इलाज के लिए रुग्ण के स्थान को शुद्ध और सात्विक रखा जाता है। इस रोग के लिए किसी विशिष्ट प्रकार की चिकित्सा नहीं की जाती है। स्थान और वातावरण की स्वच्छता के लिए नीम पत्तियों का प्रयोग, गंध, धूप का हवन किया जाता है। मंत्र रूप में जिन गीतों का प्रचलन है वह माता सेवा गीत कहलाते हैं, इनमें देवी स्तुति और रोग से रक्षा हेतु प्रार्थना की जाती है।

श्रृंगार गीत

श्रृंगार मनुष्य की सबसे कोमल भावना को प्रदर्शित करता है। श्रृंगार रस सर्वाधिक तृप्त करने वाला रस होता है इसलिए इसे रसराज कहा गया है। श्रृंगार प्रधान गीतों में मानव हृदय की स्वभाविक वृत्तियों का अनोखा चित्रण मिलता है। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में श्रृंगार रस प्रधान गीत मुख्यतः ददरिया और बारहमासी गीत होते हैं।
ददरिया – ददरिया में लोकजीवन के विभिन्न सांस्कृतिक पहलुओं का दर्शन होता है। ददरिया मूलतः प्रश्नोत्तर पर आधारित दो पंक्तियों में रचित छंद है।
ददरिया में छत्तीसगढ़ की सामाजिक स्थिति, खानपान, रहन-सहन स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। जैसे – छत्तीसगढ़ की ग्रामीणजन का मुख्य भोजन बासी है और बासी से ही ददरिया की शुरुआत होती है –
बटकी म बासी अऊ चुटकी म नून
मैं तो गावथव ददरिया तै कान दे के सुन।।
बारहमासी गीत – बारहमासी गीत में प्रकृति के बदलते परिवेशों में उसके मनोमुग्धकारी सौंदर्य से उद्दीप्त मनोभाव का प्रदर्शन होता है। बारहमासी गीत मुख्यतः सेवागीत के रूप में गाए जाते हैं। चैत्रमास, नववर्ष से आरंभ कर पूरे वर्ष भर की प्राकृतिक सुंदरता और बदलती परिस्थितियों का प्रभाव गीतों में परिलक्षित होता है।

विविध गीत

बांस गीत – बांस गीत छत्तीसगढ़ के राऊतों की सांस्कृतिक धरोहर है। इनमें राऊत जाति की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परम्परा परिलक्षित होती है।
यह बांसुरी की श्रेणी में आने वाला असामान्य वाद्य होता है। इसका उपयोग अंचल के राऊतों द्वारा उस समय किया जाता है जब ये अपने पशुओं को चराने के लिए चारागाह ले जाते हैं।
बांस गीत के आयोजन इसके गायकों का दल अपनी प्रमुख भूमिका निर्वाह करते हैं। एक या दो गायक गीत गाते हैं और शेष बांस बजाते हैं। बांस गीतों की विषयवस्तु में मुख्यतः सामाजिक तथा प्राकृतिक विषयों को शामिल किया जाता है।
करमा गीत – करमा मुख्यतः नृत्य गीतों की श्रेणी में आता है। करमा लोकगीतों में जीवन की वास्तविक और मानवीय संवेदनाओं का चित्रण ही प्रमुखतया पाया जाता है। प्रेम और प्रकृति प्राधान्य मानवीय भावनाएं करमा गीतों में पाई जाती है। काव्य के बंधनों से मुक्त, सहज मुक्तक, छंद नियमों से स्वतंत्र करमा के प्राण उसकी स्वाभाविकता में निहित होते हैं।
पंडवानी गीत – पंडवानी छत्तीसगढ़ लोकगायन की एक शैली है जो महाभारत की कथा पर आधारित है। छत्तीसगढ़ में पंडवानी की दो शैलियां प्रचलित है – कापालिक और वेदमती। कापालिक शैली से तात्पर्य पंडवानी की उस शैली से है जो पूर्ण रूप से लोकोन्मुखी है। कापालिक शब्द का अर्थ यहां तांत्रिक समुदाय से न होकर लोक स्मृति का परिचायक है, जो कथाएं कपाल में सुरक्षित है उन्हें स्थानीय संबोधन कापालिक कहा जाता है। वेदमती शैली का अर्थ वे काव्य अथवा गाथा से है जो लिपिबद्ध होकर ग्रंथ के रूप में आ चुकी है। लिखित शब्द को स्थानीय बोली में वेद कहकर संबोधित किया जाता है।
पंथी गीत – छत्तीसगढ़ में पंथी नृत्य सतनामी संप्रदाय के लोगों के द्वारा किया जाता है। यह एक गीत-नृत्य होता है, इसमें नृतक एक घेरा बनाकर तालबद्ध नृत्य करते हैं। इस नृत्य में नृत्य के साथ ही पंथी गीत गाए जाते हैं। इन गीतों में सतनामी संप्रदाय के संत गुरु घासीदास की महिमा का वर्णन होता है। उनके उपदेशों का गायन ही पंथी गीत है।
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