# जिला बलौदाबाजार : छत्तीसगढ़ | Baloda Bazar District of Chhattisgarh

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जिला बलौदाबाजार : छत्तीसगढ़

 
सामान्य परिचय – सतनाम पंथ की अमर भूमि, वीरों की धरती बलौदाबाजार-भाटापारा एक नवगठित जिला है। जनवरी 2012 में रायपुर से अलग कर इस जिले का गठन किया गया। यह एक भूआवेष्ठित जिला है, जिसकी सीमा सर्वाधिक 7 जिलों को स्पर्श करती है। गुरू घासीदास की जन्म भूमि, तपोभूमि, वीर नारायण सिंह के सत्याग्रह भूमि, ममतामयी तथा कुशल राजनेता मीनाक्षी देवी (मिनीमाता) इस जिला के अमर व्यक्तित्व थे।
सतनाम पंथ के पावन धाम प्रयाग गिरौदपुरी वीरनारायण सिंह के सत्याग्रह स्थल सोनाखान, सीता माता की तपोभूमि तुरतुरिया तथा कबीर पंथ का तीर्थ स्थल दामाखेड़ा इस जिले की आस्था एवं निष्ठा, विश्वास तथा धर्म का केन्द्र है।
पुनीत सलीला महानदी इस जिले की जीवन रेखा है। प्रकृति का अद्वितीय उपहार बारनवापारा अभ्यारण्य है, जहां जीव-जन्तु खगविहंग, सांप-छछुन्दर, साल-सागौन का सघन वन प्रकृति प्रेमी वनस्पति शास्त्री पंछी विज्ञानियों के आकर्षण केन्द्र है।
रत्न गर्भा इस धरा में सोना तथा चूना का भण्डार है। वहीं वर्तमान औद्योगिक विश्व का आधार है तथा मजबूत जोड़ का पर्याय है। सीमेंट उद्योग का केन्द्र है। मूलतः बिंझवार आदिवासी तथा दलित समाज संस्कृति तथा सभ्यता का समोवित संस्कृति देखने को मिलती है। बलौदाबाजार इस जिले का मुख्यालय है।
जिला बलौदाबाजार : छत्तीसगढ़ | Baloda Bazar District of Chhattisgarh | बलौदा बाजार जिले के बारे में जानकारी | BalodaBazar Jila Ke Bare Me Jankari
इतिहास – यह जिला पूर्व में रायपुर राजस्व जिले में शामिल था। जन श्रुति के अनुसार प्राचीन काल में बैल और मवेशियों का बड़ा बाजार होने के कारण इस नगर का नाम बलौदा बाजार पड़ा।
सामान्य जानकारी
  • गठन – 2012
  • क्षेत्रफल – 4748 वर्ग कि.मी.
  • नदी – शिवनाथ, महानदी, कोडार नदी (वीर नारायण सिंह परियोजना)
  • पड़ोसी सीमा – मुंगेली, बिलासपुर, जांजगीर-चाम्पा, रायगढ़, महासमुन्द, रायपुर, बेमेतरा
खनिज
  • डोलोमाइट – भाटापारा, गाड़ाडीह, टिकुलिया, धनेली
  • सोना – सोनाखान, राजादेवरी
  • चुना पत्थर – सोनाडीह, रवान, हिरमी, झीपन
औद्योगिक क्षेत्र – औरेठी (प्रस्तावित)
सीमेंट उद्योग
  • 1) लाफाज सीमेंट कंपनी II – सोनाडीह
  • 2) अल्ट्राटेक सीमेंट कंपनी – हिरमी
  • 3) ग्रासीम सीमेंट कंपनी – रावन
  • 4) अम्बुजा सीमेंट कंपनी – रवान
निवासरत प्रमुख जनजाति
  • 1. बिंझवार
  • 2. सवरा
  • 3. कोंध
  • 4. परधान

केन्द्र संरक्षित स्मारक

1. महादेव मंदिर, नारायणपुर (बलौदाबाजार)

सिरपुर मार्ग पर ग्राम ठाकुरिया से 8 कि.मी. दूर नारायणपुर नामक गाँव में एक प्राचीन शिव मंदिर स्थित है, जिसे महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर महानदी के सुरम्य तट पर स्थित है। मंदिर पूर्वाभिमुखी है एवं एक चबूतरे पर स्थित है। इसका निर्माण बलुआ पत्थरों से 11वीं-12वीं शताब्दी में किया गया है।

2. आदित्य को समर्पित मंदिर (बलौदाबाजार)

राज्य संरक्षित स्मारक

1. सिद्धेश्वर मंदिर (पलारी)

सिद्धेश्वर मंदिर बलौदाबाजार से 25 कि.मी. दूर ग्राम पलारी में बालसमुंद तालाब के तटबंध पर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण लगभग 7-8वीं शती में हुआ था। ईंट से निर्मित यह मंदिर पश्चिमाभिमुखी है। इस मंदिर के द्वार पर नदी देवी गंगा एवं यमुना का चित्रण त्रिभंगमुद्रा में और सिरदल पर त्रिदेवों का अंकन किया गया है।
इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित सिरदल में शिव विवाह का चित्रण है एवं द्वार शाखा पर अष्ट दिक्पालों का अंकन मिलता है। मंदिर के गर्भगृह में सिध्देश्वर नामक शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। वर्तमान छत्तीसगढ़ में ईंट से निर्मित मंदिरों में इस मंदिर का नमूना उत्तम है। यह स्मारक छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा संरक्षित है।

2. चितावरी देवी मंदिर (धोबनी)

चितावरी देवी मंदिर रायपुर नगर से 57 कि.मी. दूर स्थित दामाखेड़ा नामक प्रसिद्ध स्थल (जहां पर कबीर पंथी गुरूओं की गद्दी स्थापित है) से 2 किलोमीटर की दूरी पर धोबनी नामक गांव में तालाब के किनारे प्रस्तर और ईंट से निर्मित है। ऊंची जगती पर निर्मित यह मंदिर मूलतः शिवमंदिर है जिसके गर्भगृह का परवर्ती मध्यकाल में जीर्णोद्धार किया गया। मंदिर के गर्भगृह में रखी विरुपित प्रतिमा चितावरी देवी के रूप में पूजित है। ईंट निर्मित ताराकृति वाले मंदिरों का यह सुन्दर उदाहरण है। जो 8-9वीं शती ईस्वी में निर्मित है। यह स्मारक छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा संरक्षित है।

3. प्राचीन शिव मंदिर (डमरू)

डमरू गांव के बाहर प्रस्तर से निर्मित, पूर्वाभिमुखी, जर्जर स्थिति में एक शिवमंदिर स्थित है। वर्तमान में इसका गर्भगृह रिक्त है। इस मंदिर के अतिरिक्त परिसर में दो लघु टीले विद्यमान हैं। इस शिव मंदिर परिसर में ही उत्खनित त्रिविक्रम, ब्रम्हा, विष्णु, शिव – पार्वती, सूर्य, यम चामुण्डा, अम्बिका, चंवरधारिणी की प्रतिमायें और कुछ मिथुन प्रतिमायें, नवनिर्मित महामाया देवी के मंदिर की भित्तियों में जड़ी हैं। उक्त प्राचीन मंदिर लगभग 12 वीं शती ईस्वी की हैं जो समकालीन वास्तु शिल्प एवं मूर्तिविद्या का अच्छा उदाहरण है।

4. मावली देवी मंदिर (तरपोंगा)

मावली देवी मंदिर छत्तीसगढ़ राज्य के बलौदाबाजार जिले में रायपुर से 62 कि.मी. तथा रायपुर-बिलासपुर रोड पर स्थित विश्रामपुर से 3 कि.मी. की दूरी पर स्थित तरपोंगा ग्राम में शिवनाथ नदी के दक्षिण तट पर स्थित है। वास्तव में यह प्राचीन ध्वस्त मंदिर स्थली है जहां पर ग्रामीणों ने नया मंदिर निर्मित कर दिया है, एवं पुरानी द्वार चौखट और कुछ मूर्तियों को मण्डप में दीवारों से जड़ दिया है। वर्तमान में यह मंदिर ‘मावली देवी’ अथवा ‘मावली माता‘ के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा यहां मावली माता के रूप में पुज्यनीय है। मावली माता का यह स्वरूप छत्तीसगढ़ में अधिक लोकप्रिय है। इस मंदिर की प्राचीन द्वार चौखट अलंकृत है। इसकी बायीं द्वारशाखा पर नदी देवी यमुना एवं दायीं द्वार शाखा पर नदी देवी गंगा खड़ी है। दीवार पर जड़ी हुई प्रतिमाओं में चतुर्भुजी विष्णु, महिषासुर मर्दिनी एवं उमा महेश्वर की प्रतिमायें महत्वपूर्ण है। शिवलिंग, नन्दी प्रतिमाएं, सती स्तंभों एवं योध्दा प्रतिमाओं का यहां पर अच्छा संग्रह देखा जा सकता है। इस मंदिर की द्वार चौखट एवं मंडप की प्रतिमायें 11-12वीं शती की है, किन्तु शेष योद्धा प्रतिमायें एवं अन्य वास्तुखण्ड जो मंदिर की बाह्यभित्ति के सहारे टिकाकर रखे गये हैं, वे 16-17वीं शती ईस्वी के हैं। पुरातत्वीय दृष्टि से यह संग्रह महत्वपूर्ण है। यह स्मारक छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा संरक्षित है।

पर्यटन स्थल

1. दामाखेड़ा (बलौदाबाजार)

कबीर पंथियों का धर्मस्थली “दामाखेड़ा” प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह स्थल बलौदाबाजार जिले में शिवनाथ नदी के तट पर स्थित है। यह कबीर पंथियों की नाम, महिमा वाली शाखा का केन्द्र है। यहां बाबा उग्रनाम साहब का मठ दर्शनीय है। संत समागम मेले का भीड़ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को देखा जाता है। विद्वान, श्रद्धालु तथा भक्तगण गुरू चरणों में श्रद्धा अर्पित कर आर्शीवाद प्राप्त करते हैं।

2. गिरौदपुरी धाम

बलौदाबाजार से 40 किमी दूर तथा बिलासपुर से 80 किमी दूर महानदी और जोंक नदियों के संगम से स्थित, गिरौदपुरी धाम छत्तीसगढ़ के सबसे सम्मानित तीर्थ स्थलों में से एक है। इस छोटे से गांव, जिसमें आध्यात्मिकता और ऐतिहासिक हित के गहरे संबंध है, छत्तीसगढ़ के सतनामी पंथ के संस्थापक, गुरु घासीदास जी का जन्म स्थान है।
कहा जाता है कि उन्होंने औरा-धौरा वृक्ष के नीचे लंबे समय तक तपस्या की है जो अभी भी वहां है। इस पवित्र स्थान को तपोभूमि भी कहा जाता है। यहां चरन कुंड और प्राचीन अमृत कुंड स्थित है, प्राचीन अमृत कुंड का पानी मीठा माना जाता है।

3. छातापहाड़ (गुरू घासीदास को ज्ञानप्राप्ति स्थल)

बलौदाबाजार के सोनाखान में छातापहाड़ अवस्थित है। वास्तव यह एक बहुत बड़ी शिला है, जहाँ सतनाम धर्म के प्रवर्तक गुरू घासीदास जी ने तप कर सिद्धि प्राप्त किया था।

4. भंडारपुरी

भंडारपुरी गुरू घासीदास जी की कार्य स्थली है। जहां इन्होंने सामाजिक क्रांति के माध्यम से समग्र छ.ग. में सतनामी संप्रदाय को विस्तारित किया।

5. तुरतुरिया

महर्षि वाल्मिकी की पुण्य स्थली तुरतुरिया प्रसिद्ध ऐतिहासिक, धार्मिक नगरी है। यह स्थल बलमदेई नदी के तट पर स्थित है। बौद्ध विहार के प्राचीन अवशेष एवं मूर्तियों के लिए यह स्थान ख्याति प्राप्त है। लव-कुश की जन्मस्थली होने का गौरव तुरतुरिया को जाता है। कुछ ही दूरी पर बारनवापारा अभ्यारण्य, यहाँ की प्राकृतिक सौंदर्यता को बढ़ाती है। महर्षि वाल्मिकी का आश्रम दर्शनीय है। छेरछेरा के अवसर पर यहां भव्य मेला लगता है।

6. बारनवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य

  • गठन – 1976 (वन्यजीव संरक्षण अधि. 1972 के तहत)
  • क्षेत्रफल – 245
  • चीतल, हिरण, बंदर आदि शाकाहारी जानवर सर्वाधिक
  • साँप सर्वाधिक | अन्य- बाघ, तेंदुआ, भालू, चिंकारा
  • तुरतुरिया आश्रम स्थित
  • इसके बीच से बलमदेई नदी गुजरती है।
  • इसमें देवधारा जलप्रपात स्थित है।
  • दर्शनीय स्थल- देवधारा जलप्रपात, छाता पथरा, तुरतुरिया, सिद्धखोल, मातागढ़ आदि।

7. सोनबरसा नेचर सफारी

जिला मुख्यालय से महज 3 कि.मी. दूर ग्राम पंचायत लटुआ स्थित सोनबरसा रिजर्व फॉरेस्ट को नेचर सफारी के रुप में विकसित किया गया है। इसमें डियर पार्क भी स्थित है । इस जंगल सफारी में लोगों को जिप्सी से भ्रमण करने की सुविधा है । यहाँ पर साइकिलिंग का मजा भी लिया जा सकता है। बच्चों के मनोरंजन के साथ ही पिकनिक मनाने की भी अच्छी जगह वन विभाग द्वारा बनाई गई है।

8. पर्यटन, संस्कृति और भाषा

पर्यटन की दृष्टि से बलौदाबाजार जिला अत्यन्त समृद्ध है। कसडोल में बारनवापारा अभ्यारण्य, तुरतुरिया (वाल्मिकी आश्रम), गिरौदपुरी में सतनाम पंथ के प्रर्वतक गुरू घासीदास की जन्म भूमि तथा यहां पर कुतुबमीनार से ऊंचा जैतखम्भ, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह की जन्म भूमि, सोनाखान, पलारी के बालसमुंद तालाब के किनारे सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, लवन के चंगोरी परिसर में शिवनाथ, महानदी व लीलागर नदी का संगम, सिमगा के सोमनाथ में शिवनाथ व खारून नदी का संगम प्रमुख स्थल है। जिले की मूल भाषा हिन्दी व छत्तीसगढ़ी है तथा प्राचीन परम्पराओं व संस्कृति का दर्शन यहां के सुआ, राऊत नांचा, कर्मा, पंथी, गौरा-गौरी पूजन आदि में दृषिटगोचर होता है।

प्रमुख व्यक्तित्व परिचय

1. गुरू घासीदास (1756-1836)

छत्तीसगढ़ की संत परम्परा में गुरू घासीदास का नाम सर्वोपरि है। इनका जन्म 18 दिसम्बर 1756 को बलौदाबाजार जिले के गिरौदपुरी में हुआ था। माता का नाम अमरौतिन बाई तथा पिता का नाम महंगूदास था। बाल्यकाल से ही हृदय में वैराग्य का भाव प्रस्फुटित था। समाज में व्याप्त पशुबलि तथा अन्य कुप्रथाओं का बचपन से ही विरोध करते रहे, समाज को नई दिशा प्रदान करने में अतुलनीय योगदान रहा है। सत्य से साक्षात्कार करना जीवन का लक्ष्य था।
वैराग्य प्रवृत्ति के साथ गृहस्थ कर्त्तव्यों का भार वहन करते हुए, अंधविश्वास से जकड़े, विषमताग्रस्त समाज के संबंध में विचार प्रवाह यथावत रहा, अंततः पुरी जाते हुए सारंगढ़ के पास आत्मबोध हुआ, और यात्रा स्थगित कर ग्राम गिरौद के समीप छातापहाड़ पर औरा-धौरा वृक्ष के नीचे तपस्या कर सतनाम को आत्मसात् किया। इस विलक्षण अनुभूति से जन-जन को सत्य से परिचित कराने के लिए अग्रसर हो गए।
भंडारपुरी आकर सतनाम का उपदेश निरंतर देने लगे, सात वचन सतनाम पंथ के सप्त सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित हुआ, जिसमें सतनाम पर विश्वास, मूर्ति पूजा का निषेध, वर्ण भेद से परे, हिंसा का विरोध, व्यसन से मुक्ति, परस्त्रीगमन की वर्जना और दोपहर में खेत न जोतना है। आपके उपदेशों से समाज के असहाय लोगों में आत्मविश्वास, व्यक्तित्व की पहचान और अन्याय से जूझने की शक्ति का संचार हुआ। सामाजिक तथा आध्यात्मिक जागरण के आधारशिला से आज छत्तीसगढ़ में सतनाम पंथ के लाखों अनुयायी हैं।
छ.ग. शासन ने उनकी स्मृति में सामाजिक चेतना/दलित उत्थान के क्षेत्र में गुरू घासीदास न्याय के क्षेत्र में गुरू घासीदास सम्मान स्थापित किया है।

2. शहीद वीरनारायण सिंह

1857 के स्वतंत्रता-संग्राम में मातृभूमि के लिए मर मिटने वाले शहीदों में छत्तीसगढ़ के आदिवासी जन-नायक, वीरनाराण सिंह का नाम सर्वाधिक प्रेरणास्पद है।
पिता की मृत्यु के बाद वीरनारायण सिंह सोनाखान के जमींदार बने। परोपकारी, न्यायप्रिय तथा कर्मठ शासन होने के कारण अंचल के लोगों से मिलते तथा उनकी उचित सहायता करते थे। 1854 में अंग्रेजी राज्य में विलय के बाद नए ढंग से टकोली नियत की गई जिसका विरोध किया गया, इससे रायपुर की डिप्टी कमिश्नर इलियट उनके घोर विरोधी हो गये।
1856 में छत्तीसगढ़ भीषण सूखे की चपेट में आ गया। लोग दाने-दाने को तरसने लगे, लेकिन कसडोल के व्यापारी माखन का गोदाम अन्न से भरा था। कहने पर भी जब व्यापारी अनाज देने को तैयार नहीं हुआ तो उन्होंने अनाज भंडार के ताले तुड़वा दिये। व्यापारी की शिकायत पर इलियट ने वीरनारायण सिंह के विरुद्ध वारंट जारी कर 24 अक्टूबर 1856 को संबलपुर से गिरफ्तार कर लिया गया। वीरनारायण सिंह 28 अगस्त, 1857 को अपने तीन साथियों सहित जेल से भाग निकले और सोनाखान पहुंच कर 500 बंदूकधारियों की सेना बनाई और अंग्रेजों के विरुद्ध जबरदस्त मोर्चाबंदी कर करारी टक्कर दी। भीषण संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने कूटनीति से कैद कर मुकदमा चलाया और 10 दिसम्बर, 1857 को फांसी दे दी गई।
अन्याय के खिलाफ सतत् संघर्ष का आव्हान, निर्भीकता, चेतना जगाने और ग्रामीणों में उनके मौलिक अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न करने के प्रेरक कार्यों को दृष्टिगत रखते हुए छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में आदिवासी एवं पिछड़ा वर्ग का उत्थान के क्षेत्र में शहीद वीर नारायण सिंह सम्मान स्थापित किया है।

मेला

1. दामाखेड़ा मेला

कबीर पंथियों की धर्म स्थली “दामाखेड़ा” में प्रसिद्ध मेला प्रतिवर्ष माघमूर्णिमा में लगता है।

ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत प्रमुख विद्रोह एवं क्रांति

1. सोनाखान विद्रोह (1856)

  • स्थान – सोनाखान, जिला-बलौदाबाजार
  • नेतृत्व – वीरनारायण सिंह (सोनाखान के जमींदार)
  • विरुद्ध – अकाल के दौरान सरकार के दमनकारी नीतियों के विरूद्ध
  • कारण – कसडोल के माखनलाल नामक व्यापारी के गोदाम से अनाज लूटकर अकाल पीड़ितों को बाँटना
  • गिरफ्तार – 02 दिसम्बर, 1857 में कैप्टन स्मिथ ने सोनाखान से भटगाँव, बिलाईगढ़, देवरी एवं कटंगी के जमींदारों ने अंग्रेजों का साथ दिया।
  • फाँसी – 10 दिसम्बर, 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक में।
  • तात्कालिक अधीक्षक – चार्ल्स इलियट।
  • वीरनारायण सिंह छत्तीसगढ़ स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम शहीद.
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