# औद्योगिक क्रान्ति के कारण | Due to Industrial Revolution | Audyogik Kranti Ke Karan

औद्योगिक क्रान्ति के प्रमुख कारण :

सामान्यतः क्रान्ति शब्द से तात्पर्य राजनीतिक परिवर्तन से लिया जाता रहा है जो हिंसात्मक हुआ करती थी लेकिन बाद में क्रान्ति शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया गया। जब विश्व के किसी भी क्षेत्र में पुरातन व्यवस्था के स्थान पर एकाएक नई व्यवस्था का संचार होता है जिससे समाज के वैचारिक एवं कार्यिक क्षेत्रों में अप्रत्याशित परिवर्तन होता है। तो उसे क्रान्ति कहा जाता है।

ऐसी क्रान्तियों से सामाजिक जन-जीवन पूर्णतः प्रभावित होता है जिससे इनकी सभ्यता एवं संस्कृति में बदलाव आता है। इसी परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक क्षेत्र में इंग्लैण्ड की रक्तहीन क्रान्ति, अमेरिकी क्रान्ति, फ्रांस की क्रान्ति एवं रूस की क्रान्ति, औद्योगिक क्षेत्र में इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति एवं अन्य देशों की औद्योगिक क्रान्तियाँ और भारत में राजनीतिक औद्योगिक क्रान्ति के साथ हरित क्रान्ति, श्वेत क्रान्ति एवं नीली क्रान्ति को देखा जा सकता है जिससे समाज में एक नए आयाम का उद्भव हुआ।

औद्योगिक क्रान्ति के प्रमुख कारण | Due to Industrial Revolution | Audyogik Kranti Ke Karan | औद्योगिक क्रांति के कारणों की विवेचना कीजिए

सर्वप्रथम औद्योगिक क्रान्ति का विकास इंग्लैण्ड में हुआ, बाद में औद्योगिक क्रान्ति का प्रसार विश्व के अन्य सभी देशों में हुआ जिसका सामान्यतः निम्नलिखित कारण था-

1. वैज्ञानिक अविष्कार

यूरोप में बौद्धिकता के विकास से अनेक वैज्ञानिक अविष्कार हुए जिससे परम्परागत व्यवस्थाओं, उत्पादनों, रहन-सहन एवं यातायात से परिवर्तन हुआ जिससे यूरोप एवं अन्य देशों में नई-नई तकनीक एवं विधियों का आगमन हुआ। इन अविष्कारों के कारण नये-नये यन्त्रों एवं मशीनों का उपयोग होने लगा जिससे यूरोप एवं सम्पूर्ण विश्व में औद्योगिक क्रान्ति हुई। इस क्रान्ति का प्रसार आज तक हो रहा है। इन्हीं अविष्कारों से आज मनुष्य ब्रह्माण्ड का रहस्य जानने के लिए प्रयासरत है।

2. जनसंख्या में वृद्धि

यूरोप एवं विश्व में धीरे-धीरे जनसंख्या की वृद्धि दर में विकास हुआ जिससे उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना परम्परागत कृषि व्यवस्था द्वारा असम्भव था। अतः आवश्यकता के अनुसार नये-नये संसाधनों एवं उद्योगों का विकास करना आवश्यक हो गया था जिससे सभी व्यक्तियों की रोजी-रोटी एवं मूल आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। मनुष्यों की बढ़ती हुई माँग एवं आवश्यकता ही औद्योगिक क्रान्ति को प्रोत्साहित की।

3. पूँजी का संचय और सामाजिक परिवर्तन

यूरोप का व्यापार जब एक देश से दूसरे देश में विकसित हुआ तो दूसरे देश से प्राप्त लाभ से उनकी धन सम्पदा का विकास हुआ और दूसरे देशों की सभ्यता एवं संस्कृति के विचारों से एक नई सामाजिक परिवर्तन की लहर समस्त विश्व में व्याप्त हो गई। पूँजी के संचय के कारण पूँजी को और विकसित करने के लिए उद्योगों की स्थापना हुई। इसी सन्दर्भ में यूरोप के देशों ने केन्द्रीय बैंकों की स्थापना की जिससे उनकी पूँजी सुरक्षित रहे और आवश्यकतानुसार उनको उद्योगों के विकास के लिए ऋण भी प्राप्त हो सके। उद्योगों के विकास से मनुष्यों की आवश्यकताओं एवं विचारों में परिवर्तन हुआ।

जब व्यक्तियों की आकांक्षाओं का विकास हुआ तो औद्योगिक क्रान्ति में तीव्रता आयी। औद्योगिक विकास के कारण आज मनुष्यों का झुकाव प्राचीन आध्यात्मिक विचारों से आधुनिक भौतिकवाद एवं उपभोक्तावाद की ओर हो गया है जिसमें सब कुछ प्राप्त करने की इच्छा मनुष्यों की होती जा रही है जिससे औद्योगिक क्रान्ति में प्रसार हुआ।

4. राष्ट्रीयता एवं फ्रांसीसी क्रान्ति

1789 ई. में फ्रांसीसी क्रान्ति हुई। इस क्रान्ति के कुछ ही समय बाद नेपोलियन बोनापार्ट ने फ्रांस में राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार करके सम्पूर्ण यूरोप को युद्ध की विभीषिका में डाल दिया। इस युद्ध से जहाँ समस्त यूरोप में बेरोजगारी का प्रसार हुआ वहीं पर सभी देशों में राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ। सभी देश अपनी सर्वश्रेष्ठता के लिए उद्योगों को प्रोत्साहन देने लगे। इसमें इंग्लैण्ड सबसे अग्रणी था जो अपने यहाँ अत्यधिक उद्योगों की स्थापना करके विश्व में अपना आधिपत्य स्थापित करने में सफल रहा। इसी युद्ध और राष्ट्रीयता की भावना ने औद्योगिक क्रान्ति को अत्यधिक बल दिया जिससे बेरोजगारी की समस्या का समाधान भी हुआ और जनसाधारण भी अपने देश के प्रति समर्पित होने लगा।

5. भौगोलिक खोज

कोलम्बस, वास्कोडिगामा एवं अन्य खोजकर्ताओं ने समुद्री यात्राओं के माध्यम से विश्व के अनेक देशों की खोज की। ये देश अत्यन्त पिछड़े हुए थे लेकिन यहाँ यह संसाधनों एवं कच्चे मालों का भण्डार था। अतः यूरोप के देशों ने यहाँ पर अपना अधिपत्य जमाना शुरू कर दिया जिससे उन्हें अपने निर्मित मालों के विक्रय के लिए बाजार मिल गया और कच्चे माल की भी व्यवस्था हो गई। धीरे-धीरे यूरोप के देशों की महत्वाकांक्षाएँ बढ़ती गईं जिससे उन्होंने अपने देश के विकास और गौरव के लिए अनेक प्रकार की आधुनिक मशीनों का अविष्कार करके नये-नये उद्योगों की स्थापना अपने एवं अन्य देशों में की थी जिससे औद्योगिक क्रान्ति का प्रसार हुआ।

6. खनिज संसाधनों का ज्ञान

विश्व के देशों को खनिजों का ज्ञान बहुत कम था। जहाँ पर लोहा, कोयला इत्यादि खनिजों की जानकारियाँ भी थीं वहाँ पर उसकी उपयोगिता के ज्ञान का अभाव था, परन्तु वैज्ञानिक अविष्कारों से लोहा, कोयला, चूना, ताँबा, मैंगनीज, खनिज तेलों एवं अन्य अनेक खनिजों का ज्ञान प्राप्त हुआ। जब इन खनिजों की उपयोगिता का ज्ञान हुआ तो समस्त यूरोप का औद्योगिकरण हुआ। जिस खनिज की मात्रा जिस स्थान पर अधिक होती थी वहाँ पर उसी प्रकार का उद्योग स्थापित होने लगा। इस प्रकार धीरे-धीरे सम्पूर्ण विश्व में औद्योगिक क्रान्ति का प्रसार हुआ।

7. वैज्ञानिक अनुसंधानों से अन्धविश्वासों में कमी

प्राचीन एवं मध्यकाल में समस्त विश्व में अपनी संस्कृति एवं सभ्यता के अनुसार अन्धविश्वासों का अत्यधिक प्रचलन था लेकिन बौद्धिकता के विकास और वैज्ञानिक खोजों एवं तर्कों से इसमें कमी आई जिससे धीरे-धीरे अधिकतर व्यक्ति परम्परा का त्याग करके वैज्ञानिक विचारों एवं अनुसन्धानों को स्वीकार करने लगे। इसके अलावा विश्व के देशों एवं समाजों में सांस्कृतिक विनिमय से इन अन्धविश्वासों में कमी आई। अन्धविश्वासों में कमी के कारण व्यक्तियों की महत्वाकांक्षाओं एवं आवश्यकताओं में वृद्धि हुई जिसके कारण औद्योगिक क्रान्ति का प्रसार हुआ।

इस प्रकार इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति का प्रारम्भ अवश्य हुआ था लेकिन यूरोप एवं विश्व में धीरे-धीरे इसका प्रसार हुआ। औद्योगिक क्रान्ति के प्रसार के अनेक कारण हैं जिनमें वैज्ञानिक अनुसन्धान, भौगोलिक खोज, खनिजों का ज्ञान, जनसंख्या में वृद्धि, राष्ट्रीयता की भावना एवं महत्वाकांक्षा का विकास, अन्धविश्वासों में कमी एवं सामाजिक परिवर्तन और पूँजी का संचय एवं केन्द्रीय बैंकों की स्थापना प्रमुख हैं। विश्व में आज तक औद्योगिक विकास हो रहा है जिसके कारण विश्व के जनसाधारण को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ नये-नये तकनीकों के उपयोग का अवसर मिल रहा है।

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