# विशिष्ट वर्ग के बालकों की शिक्षा के उद्देश्य, प्रयास (Aims of Education of Exceptional Children)

विशिष्ट वर्ग के बालकों की शिक्षा के उद्देश्य :

हमारे देश में शिक्षा के मुख्य उद्देश्य वैयक्तिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं चारित्रिक आधारों पर निर्धारित किये गये हैं, जो निम्नलिखित हैं-

  1. बालक का मानसिक विकास
  2. शारीरिक विकास
  3. नैतिक विकास
  4. चारित्रिक विकास
  5. सामाजिक विकास
  6. उदार दृष्टिकोण का विकास
  7. आजीविका की तैयारी हेतु सजगता
  8. समायोजन की भावना का विकास
  9. सहिष्णुता का विकास।

उपरोक्त सामान्य उद्देश्यों का विशिष्ट बालकों के उद्देश्यों में निकटता का सम्बन्ध है। दोनों ही उद्देश्य बालक का सर्वांगीण विकास करते हैं एवं उसे समाज में एक सुनियोजित नागरिक बनाने हेतु मार्ग प्रशस्त कराते हैं ये उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

1. मानसिक विकास का उद्देश्य

विशिष्ट बालकों की शिक्षा का उद्देश्य उनका मानसिक (बौद्धिक विकास करना भी है ताकि वह अपनी बुद्धिमता का प्रयोग बुद्धिमान व्यक्तियों के साथ रहकर कर सके और उसे पूर्णतः विकसित कर सके। इसके साथ ही मन्द बुद्धि बालकों की शिक्षा का उद्देश्य भी यह है कि कम से कम उनका इतना मानसिक विकास तो हो ही जाये जिससे कि वे अपनी आजीविका भली-भाँति चला सकें।

2. शारीरिक विकास का उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य केवल मानसिक विकास ही नहीं है अपितु शारीरिक विकास भी है। विशिष्ट बालकों और विशेष तौर पर विकलांग बालकों को शिक्षा देने का उद्देश्य तो यह है कि उनकी शारीरिक दुर्बलता अथवा विकलांगता की कमी महसूस न हो। उनकी विकलांगता को दूर करने हेतु शिक्षा में कुछ प्रयास होने चाहिए ताकि सामान्य बालकों की शिक्षा का उद्देश्य भी उनके शारीरिक विकास की प्रक्रिया से जुड़ सकें।

3. व्यावसायिक दक्षता का उद्देश्य

विशिष्ट बालकों को दो रूपों में बाँटा गया है- (1) प्रतिभावान, (2) मन्द बुद्धि अथवा पिछड़े। इनमें से मन्द बुद्धि बालकों को तो इस प्रकार की शिक्षा दी ही जानी चाहिए जिससे कि उनकी व्यावसायिक प्रगति हो सके। क्योंकि आज शिक्षा का व्यावहारिक सम्बन्ध रोजगार से है। मन्द बुद्धि बालकों को कम से कम इस प्रकार का व्यावसायिक प्रशिक्षण तो दे ही देना चाहिए जिससे कि वे अपना जीवनयापन भली-भाँति कर सकें। इसी प्रकार शारीरिक रूप से विकलांग बालकों के लिए भी उनसे सम्बन्धित प्रशिक्षण दिये जाने चाहिए, ताकि वे भी रोजगार से जुड़कर आत्मनिर्भर बन सकें।

4. कलात्मक विकास का उद्देश्य

विशिष्ट या असाधारण बालकों में इतनी कलात्मक प्रतिभा होती है कि यदि शिक्षा के द्वारा उन्हें उचित दिशा में मार्गदर्शन दिया जाय अथवा सही अवसर प्रदान किये जायें तो वे अपनी कलात्मक कुशलता का भरपूर उपयोग कर सकते हैं। इससे उनकी हीन भावना दूर होने के साथ-साथ आजीविका के नये स्रोत बनते हैं। फलस्वरूप वे आनन्द से जीवनयापन कर सकते हैं।

5. चारित्रिक एवं आध्यात्मिक विकास का उद्देश्य

सामान्य बालकों की तरह विशिष्ट बालकों के लिए शिक्षा का उद्देश्य भी उनका चारित्रिक एवं आध्यात्मिक विकास होना चाहिए, ताकि उनका सही दिशा में विकास हो सके। क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध मानसिक विकास से है।

6. विशिष्ट संसाधनों का प्रयोग का उद्देश्य

इन विशिष्ट प्रकार के बालकों के लिए विशिष्ट शिक्षण साधन, विशिष्ट शिक्षण विधि, विशिष्ट अध्यापक, विशिष्ट सहायक सामग्री, विशिष्ट पाठ्यक्रम तथा विशिष्ट अभ्यास आदि सभी संसाधनों की आवश्यकता है। दूसरे अर्थों में हम यह कह सकते हैं कि इनके लिए शिक्षा का विशेष आयोजन होना चाहिए ताकि वे सामान्य बालकों के समान विकास कर सकें। यदि प्रतिभावान है तो उसका भी विकास हो सके।

7. वैयक्तिक निर्देशन का उद्देश्य

विशिष्ट अथवा असाधारण बालकों के लिए विशिष्ट एवं व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता होती है, क्योंकि आज के समय में शिक्षा की सारी व्यवस्था एवं प्रक्रिया जटिल होती जा रही है। बालकों के लिए वैयक्तिक निर्देशन सही दिशा में प्रगति करने हेतु आवश्यक है। निर्देशन देते समय बालक से सम्बन्धित प्रत्येक पहलू पर ध्यान देना चाहिए; जैसे- (1) शारीरिक दशा, (2) सीखने की क्षमता, (3) स्कूल रिकार्ड, (4) सामाजिक सामंजस्य, (5) रुचि एवं ध्यान।

8. अध्यापकों का चुनाव

अध्यापकों को विशिष्ट बालकों को पढ़ाने का प्रशिक्षण भी देना चाहिए। साधारण बालकों को पढ़ाने का अनुभव विशिष्ट बालकों के शिक्षण के लिए बहुत आवश्यक है। प्रशिक्षण प्राप्ति के साथ-साथ अध्यापक में विशिष्ट बालकों को निर्देशित करने में रुचि हो। उनकी समस्याओं को समझने के लिए उसमें सहानुभूतिक दृष्टिकोण हो। अध्यापक को विशिष्ट शिक्षा से सम्बन्धित अभिमुखीकरण (Orientation) पाठ्यक्रम भी पूरा करना चाहिए।

9. विशिष्ट बालकों की कक्षाओं का निरीक्षण

छोटे शहरों में विशिष्ट कक्षा के निरीक्षण का कार्य एक सहायक उप-निरीक्षक अथवा प्राथमिक निरीक्षक (S.D.I.) को देना चाहिए। बड़े नगरों में प्रत्येक सम्बन्धित विद्यालय का एक निरीक्षक होना चाहिए। इस निरीक्षक को विशिष्ट बालकों को पढ़ाने का अनुभव, इस क्षेत्र में विशिष्टीकरण तथा विशिष्ट शिक्षा में M. A. की डिग्री होनी चाहिए। इसके कार्य प्रशासन तथा निरीक्षण दोनों ही हैं। इसे पाठ्यक्रम को तैयार करना, सामान का प्रबन्ध करना, अध्यापकों की नियुक्ति करना तथा स्थानान्तरण आदि का प्रबन्ध करना चाहिए। इन निरीक्षकों को विशेष शिक्षा के क्षेत्र में हुए प्रत्येक परिवर्तन व विकास से अवगत होना चाहिए। इससे वे अपने कार्यक्रम को यथोचित रूप से विकसित कर सकते हैं। इन बालकों की कक्षाओं को लेने वाले अध्यापकों के वेतन-भत्ते भी विशेष होने चाहिए तथा उन्हें अपने प्रधानाध्यापक के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। अध्यापकों के लिए सेवा प्रशिक्षण (In-service Training) तथा विस्तार सेवा (Extension Service) होनी चाहिए।

10. गाँव के विशिष्ट बालकों हेतु उचित ध्यान

इन बालकों को भी विशिष्ट शिक्षा को उतनी ही आवश्यकता है जितनी कि उन विशिष्ट बालकों को जो शहरों में रहते हैं। माता-पिता को अपने बच्चों को दूर पढ़ाई के लिए नहीं भेजते हैं। ऐसी स्थिति में निम्नलिखित कार्य करें- (1) गाँव के बालकों के लिए शहरों में छात्रावास का प्रबन्ध करना चाहिए, (2) उन्हें विद्यालय ले जाने के लिए बसों का प्रबन्ध होना चाहिए जो प्रतिदिन विद्यार्थियों को घर वापस छोड़कर भी आएँ। राज्य सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

विशिष्ट वर्ग के बालकों की शिक्षा हेतु प्रयास :

विशिष्ट बालकों की शिक्षा के उद्देश्यों के अन्तर्गत इनके लिए विशेष शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इसके लिए सरकार के प्रयास के साथ-साथ सामाजिक संगठनों एवं सामाजिक संस्थाओं के द्वारा भी प्रयास किये जाने चाहिए। प्रमुख रूप से हमारे देश में इस क्षेत्र में किये जा रहे प्रयास निम्नलिखित हैं:

1. देहरादून में 1972 में राष्ट्रीय दृष्टिहीन विकलांग संस्थान खोला गया है। इसमें दृष्टि बाधित व्यक्तियों को शिक्षा देने के लिए शिक्षक तैयार किये जाते हैं। साथ ही यह संस्था नेत्रहीन व्यक्तियों की शिक्षा के क्षेत्र में अनेक शोध कार्य भी कर रही है।

2. नेत्रहीन बालकों के लिए राष्ट्रीय अन्ध संघ नामक संस्था बहुत कार्य कर रही है। यह संस्था व्यक्तिगत और सामाजिक संस्थाओं के द्वारा किये जा रहे कार्यों में सहयोग एवं समन्वय कर रही है। यह संस्था अनेक अंध विद्यालय एवं उनके लिए कार्यशाला एवं औद्योगिक गृहशाला भी खोल रही है।

3. अलीपावर राष्ट्रीय मूक बधिर संस्थान मुम्बई द्वारा मूक बधिर बालकों की शिक्षा एवं व्यवसाय के लिए बहुत-बहुत कार्य किये जा रहे हैं। यह संस्था 1982 से कार्यरत है।

4. राष्ट्रीय अपंग विकलांग संस्थान कोलकाता (1984) भी विकलांग बालकों की शिक्षा हेतु कार्य कर रहा है।

5. राष्ट्रीय मानसिक विकलांग संस्थान हैदराबाद की स्थापना भी 1984 में हुई थी। यह संस्थान मानसिक रूप से विकलांग बालकों की शिक्षा के लिए कार्य कर रहा है।

6. मैसूर (कर्नाटक) में आल इण्डिया इंस्टीट्यूट आफ स्पीच एण्ड हीयरिंग, मूक बधिर बालकों की शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा कार्य कर रहा है।

7. भारत सरकार के श्रम एवं कल्याण मन्त्रालय रोजगार एवं पुनर्वास विभाग ने भारत के विभिन्न 15 महानगरों में व्यावसायिक पुनर्वास केन्द्रों की स्थापना की है। जयपुर में भी ऐसा ही एक व्यावसायिक केन्द्र बनाया है।

8. नयी शिक्षा नीति में ग्रामीण प्रतिभाओं हेतु नवोदय विद्यालयों की स्थापना की – गयी है। इन नवोदय विद्यालयों के द्वारा ग्रामीण प्रतिभाओं को सब तरह की सुविधाएँ देकर उनका पूरा विकास करने का प्रयास किया जा रहा है।

9. यूनेस्को ने 1981 के वर्ष को विकलांगों का वर्ष घोषित करके इनके हित के लिए बहुत सारे कार्य किये हैं।

10. मानसिक रूप से पिछड़े अथवा मन्दित बालकों के लिए हमारे देश में अनेक संस्थाएँ स्थापित की गयी हैं। इन संस्थाओं के द्वारा इन बालकों को इस प्रकार तैयार किया जाता है जिससे कि वे भली-भाँति तैयार होकर अपना जीवनयापन कर सकें।

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