# वैष्णव धर्म का उद्भव और विकास

वैष्णव धर्म का उद्भव और विकास

वैदिक काल में भारतीय धर्म का स्वरूप भिन्न भिन्न रूप में प्रस्तुत हुआ है। आर्यों ने देवत्व के दर्शन प्रकृति के विभिन्न रूपों में किये थे। जल, वायु, अग्नि, अंतरिक्ष, सरिता आदि सभी देवता के रूप में पूजे जाने लगे। इनमे वरूण जल देवता के रूप में उपासना के केन्द्र बने तथा इन्द्र अन्तरिक्ष के एवं अग्नि पृथ्वी के देवता हुए। सूर्य जगत की आत्मा बने गये।

ऋग्वेद के अध्ययन से ज्ञात होता है, कि अन्य देवताओं के साथ इस काल में यज्ञादि कार्यों के साथ अन्य देवताओं की आराधना एवं स्मरण वर्जित माना गया था। इस प्रकार आर्यों ने सर्वप्रथम आकाश व पृथ्वी की उपासना की और फिर सूर्य, सविता, अग्नि, सोम, इन्द्र, विष्णु, अदिति और देवताओं की उपासना की। वरूण के लिये ऋग्वेद का सातवां मण्डल भरा पड़ा है। इसमें उपासक की भक्ति भावना उन्मुक्त हो कर बह रही है। वस्तुतः कालान्तर के भक्ति मार्ग का बीज इन्हीं स्रोतों में भरा पड़ा है। भक्ति मूलक वैष्णव धर्म भागवत धर्म का प्राचीनतम आधार ऋग्वेद के वरूण स्रोतों में ही मिलेगा। ऋग्वेद में हमें विष्णु की चर्चा भी विष्णु सूक्त में प्राप्त होती है। जिसमें विष्णु को संसार का संरक्षक कहा गया है।

ऋग्वेद में कहा गया है, कि विष्णु उपासनों की अर्चना सुनकर सदैव आ जाते हैं। ऋग्वेद में विष्णु के तीन पदों का उल्लेख है, जिसमें वह समस्त ब्राह्माण्ड का अतिक्रमण करते हैं। मनुष्य उनके दो पदों को तो देख सकता है, परन्तु तृतीय पद उसकी दृष्टि से बाहर ही है। इस प्रकार वैदिक काल से ही आर्यों के उपासक, अनेक देवी देवताओं की सूची प्राप्त होती है, जिसमें विष्णु का भी नाम मिलता है। ऋग्वेद में तो विष्णु के नाम का उल्लेख कई बार हुआ है।

संस्कृत साहित्य में विष्णु शब्द का बहुत प्रचार देखा जाता है। वेद, उपनिषद, इतिहास, पुराण संहिता और काव्य सभी जगह विष्णु शब्द का विपुल व्यवहार दिखाई पड़ता है। कतिपय विद्वान विष्णु की तुलना वैदिक साहित्य में अनेकशः वर्णित इन्द्र और कुछ विद्वान आदित्य से करते हैं, क्योंकि वे तीन स्थानों में पद धारण करते हैं, जिसमें प्रथम पद पृथ्वी में द्वितीय अंतरिक्ष में एवं तृतीय ध्रुवलोक में है। पृथ्वी पर सभी पदार्थो में अग्नि रूप में अन्तरिक्ष में विद्युत रूप में एवं ध्रुवलोक में अवस्थान के समय रहते हैं। और्णावाभ आर्चाय कहते हैं कि उनका एक पद समारोहण (उदयगिरि) पर दूसरा विष्णु पद पर (मध्य गगन) एवं तीसरा गया सिर (अस्ताचल) पर पड़ा था। और्णावाभ आदि भाष्यकारों ने विष्णु को सूर्य कहा है। तथा कुछ विद्वानों ने सूर्य को ही दूसरे नाम से ऋग्वेद में विष्णु कहा गया है। वाजसनेय संहिता तथा अन्य संहिताओं के प्रकारान्तर से यही बात कही गई है। इस प्रकार आर्यों के काल में ही विष्णु के नाम का उल्लेख इन्द्र, वरूण, रूद्र, सोम और मरूत के साथ प्राप्त होता है।

ऋग्वेद काल के बाद उत्तर वैदिक काल में इन देवताओं का महत्व घटता बढ़ता दिखाई देता है। जिसमें विष्णु का महत्व प्रजापति और रूद्र के साथ दिखाई देता है। इस काल में इन्द्र, वरूण आदि का महत्व कम हो गया और विष्णु सभी देवताओं में अधिक सम्माननीय और श्रेष्ठ माने जाने लगे।

ऋग्वेद के बाद सामवेद व अन्य वेदों में विष्णु की स्तुति की गई। इसकी महत्ता इतनी बढ़ गई थी, कि प्रत्येक संस्कार में उसका नाम लिया जाने लगा था। और उसके बिना कोई भी प्रतिस्थापना नहीं होती थी। इन भावनाओं को महाकाव्यों और पुराणों में और भी विकसित किया गया। विष्णु उपासकों के इष्टदेव के रूप उभर कर सामने आए और लोगों ने इष्टदेव की भक्ति और उपासना में ही मुक्ति का मार्ग ढूढ़ा।

धर्म के नये रूप में वैष्णव धर्म का नाम ग्रहण कर लिया था। वैष्णव धर्म विष्णु ही जिसके आराध्य देव हों अर्थात जो विष्णु का भजन करते हैं, अतः वैष्णव धर्म के प्रधान देव विष्णु है जिनका वैयक्तिक विकास ही वैष्णव धर्म है। धीरे-धीरे विष्णु के व्यक्तित्व विकास में वासुदेव, नारायण गोपाल कृष्ण समाहित हो गये तब वैदिक विष्णु तीन नामों को आत्मसात् करते हुये उत्तर भारत के प्रमुख देवता बन गयें है।

उत्तर वैदिक काल में वासुदेव का उल्लेख प्राप्त होता है तथा इस काल में उसके सम्प्रदाय का भी उदय हो चुका था। वासुदेव के परम मित्र अर्जुन को देवत्व मिला एवं वासुदेव सम्प्रदाय के अन्तर्गत उसकी भी उपासना होने लगी थी। जिससे वासुदेव के उपासक वासुदेवक तथा अर्जुन के उपासक अर्जुनक कहलाये। इस प्रकार वासुदेव की उपासना प्रारम्भ हो गई जो वैदिक देवता नहीं थे। महाकाव्य काल में ब्रह्मा सृष्टि का सृजन करता और विष्णु सृष्टि का पालन करता तथा इस प्रकार विष्णु जो वैदिक काल में एक गौण देवता थे, उत्तर दैविक काल में उसकी महत्ता इतनी बढ़ गई कि भारतीय आर्यो के वह एक प्रमुख देवता बन गये। इतना प्रमुख देवता कि किसी भी याज्ञिक अथवा वैवाहिक संस्कारों के समय में विष्णु की प्रतिमा अथवा प्रतीक रखना आवश्यक माना जाने लगा।

गुप्तकालीन अनेक ग्रन्थों में वैष्णव धर्म की ही प्रधानता के लक्षण मिलते हैं। विद्वानों ने बहुत से पुराणों को गुप्तकालीन माना है। सर्वविदित है कि पुराणों (समस्त) में वैष्णव पुराणों की अधिकता एवं प्रधानता है। इन सब बातों से स्पष्ट है, कि गुप्त काल में विष्णु तथा उनसे सम्बन्धित वैष्णव धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुका था।

वैष्णव धर्म : राज्याश्रय प्राप्ति

गुप्त काल में वैष्णव धर्म का पुनरुद्धार हुआ और गुप्तों के संरक्षण में वैष्णव धर्म का खूब प्रचार हुआ। वैष्णव धर्म की प्रबलता हुई, जिसके कारण गुप्तों ने उसी पर ध्यान केन्द्रित किया गुप्त काल में आते-आते वैष्णव धर्म की महत्ता अधिक बढ़ गई थी और महत्ता बढ़ जाने के कारण गुप्त नरेशों ने वैष्णव धर्म को स्वीकार किया। गुप्त नरेशों के व्यक्तिगत धर्म के रूप में ग्रहण करने के कारण जिस प्रकार अशोक ने बौद्ध धर्म को राज्याश्रय प्रदान किया है। उसी प्रकार गुप्त नरेशों ने भी वैष्णव धर्म को राज्याश्रय प्रदान करने का मूल कारण उसका अपना स्वरूप था, जिसमें सभी प्रकार के लोक विश्वासों का एकीकरण था, उसमें तर्क और बुद्धि की अपेक्षा विश्वास का प्राबल्य था, जो लोगों को अपनी और आकृष्ट करता था। इसमें सभी वर्ग के लोगों की धार्मिक आवश्यकता की पूर्ति होती थी। संक्षेप में वैष्णव भक्ति तत्कालीन सामाजिक दृष्टिकोण के अनुरूप थी। इसी प्रकार वैष्णव धर्म गुप्तकाल का सर्वप्रमुख धर्म था और भागवत धर्म के नाम से प्रख्यात हुआ। गुप्त वंश के अधिकांश राजा इसी धर्म के अनुयायी थे और उन लोगों ने अपने सिक्कों तथा अभिलेखों में परम भागवत की उपाधि धारण की। जिसका अर्थ ‘विष्णु का परम् भक्त है।

वैष्णव धर्म में विष्णु को गुप्तों ने अपने आराध्य देव के रूप में स्वीकार किया अतः उनके वाहन गरूड़ को भी समान स्थान दिया। गरूड़ विष्णु के वाहन के रूप में महाकाव्य काल के पूर्व नहीं था। महाकाव्य काल में ही वह विष्णु का वाहन माना गया।

गरूड़ को विष्णु का वाहन होने की चर्चा महाभारत में प्राप्त होती है। जिसमें विष्णु ने गरूड़ को वरदान दिया। विष्णु ने गरूड़ को अपना वाहन चुनना चाहा तथा अपने ध्वज के ऊपर स्थित रहने की मांग की। इस प्रकार महाभारत में विष्णु के वाहन होने का प्रमाण प्राप्त होता है। कहीं-कहीं वैष्णव प्रतिमाओं के अभाव में विष्णु का ज्ञान उनके वाहन, प्रतीक आदि से भी होता है। गुप्त अभिलेखों में विष्णु के वाहन के रूप गरूड़ का उल्लेख तथा गरूड़ की चर्चा भी मिलती है। गुप्त नरेशों ने गरूड़ प्रकार की मुद्राओं का भी प्रचलन किया था। गुप्त नरेशों का राजधर्म वैष्णव था और गरूड़ विष्णु का वाहन है। इसीलिये गरूड़ के चिन्ह को ही गुप्तों के राजचिन्ह के रूप में स्वीकार किया गया जिसका अंकन उनके राजाज्ञापत्र में प्राप्त होता है (समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है, कि उनके अधीनस्थ नरेशों ने गरुत्मदंक से अंकित राजाज्ञापत्र की मांग की थी। इससे ज्ञात होता है, कि गरूड़ चिन्ह राज्य चिन्ह था और राजाज्ञा पत्र केन्द्रीय शासन से संबंधित था।

वैष्णव धर्म के विभिन्न सम्प्रदाय

सम्यक् प्रदीयत इति सम्प्रदाय:- गुरुपरम्परा सम्यक् रूप से चली आ रही है और जिसमें गुरु शिष्य को सम्यक रूप से मंत्र आराध्य, आराधना तथा आचार पति प्रदान करता है उसका नाम सम्प्रदाय है। धर्म का पथ विशेष सम्प्रदाय कहलाता है। वैष्णव धर्म इसका अपवाद नहीं है। वैष्णव धर्म का सर्वेक्षण करने पर ज्ञात होता है।

  • नारायण सम्प्रदाय
  • वासुदेव सम्प्रदाय
  • वैखानस सम्प्रदाय
  • भागवत सम्प्रदाय

अभिलेखों का मूल उद्देश्य किसी धर्म या सम्प्रदाय की चर्चा करना होता अतः अभिलेखों में भी वैष्णव धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है परन्तु विष्णु के नामों के उल्लेख से गुप्त काल में प्रचलित विभिन्न वैष्णव सम्प्रदाय का अनुमान कर सकते हैं, इन सम्प्रदायों से संबंधित प्रमुख आराध्यदेव का उल्लेख गुप्त अभिलेखों में कहीं-कहीं स्पष्ट एवं कहीं-कहीं पर्यायवाची नाम के रूप में हुआ है इन नामों से उन सम्प्रदायों का ज्ञान भली भांति किया जा सकता है। गुप्त नरेशों के अभिलेखों में नारायण या नारायण सम्प्रदाय का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त नहीं होता, परन्तु विष्णु शब्द की कल्पना नारायण शब्द से की जा सकती है।

परिभाषित अर्थ के आधार पर विष्णु को भी हम नारायण मान सकते हैं। ऐसे विष्णु (नारायण) की चर्चा गुप्त नरेशों के अभिलेख में कई स्थानों में प्राप्त होती है।

ब्राह्मण धर्म के प्रतिपादक ग्रन्थों (पुराणों, स्मृतियों एवं उपनिषदों) में नारायण की विशेष चर्चा मिलती है। पुराणों एवं पुराणों से पुरानी उपनिषदों का सर्वेक्षण करने पर यह ज्ञात होता है, कि वासुदेव से भी प्राचीनतर सत्ता नारायण की है। ऋग्वेद में नारायण का उल्लेख मिलता है। श्रीमद्भागवत् में नारायण का उल्लेख आधार पर किया गया है, तथा महाभारत में प्रत्येक पर्व के आरम्भ में नर एवं नारायण की स्तुति की गई है। नारायण नाम से ही नारायणोपनिशद की भी रचना प्राप्त होती है। ये सारे तथ्य इस बात के प्रतीक हैं, कि नारायण पर आश्रित वैष्णव सम्प्रदाय बहुत पुराना है।

गुप्त नरेशों ने वैष्णव धर्म को स्वीकार किया था और यही कारण है, कि वे अपने अभिलेखों तथा मुद्राओं में अपने को परमभागवत् कहते हुए पाये जाते है। क्योंकि गुप्त नरेश वैष्णव धर्मावलम्बी थे। इसलिए वैष्णव प्रतिमाओं का निर्माण इनके काल में प्रचुर मात्रा में हुआ। गुप्त काल से ही इन देवी देवताओं की प्रतिमा के लिये देवालय और मन्दिरों का निर्माण प्रारम्भ हुआ। कतिपय विद्धानों का मत है कि विष्णु से संबंधित कुछ पुराणों की रचना भी गुप्त काल में हुई थी। गुप्त काल के आस पास व उसके कुछ पूर्व नारायण, विष्णु, वासुदेव से समन्वित धर्म में एक नये तथ्य अवतारवाद का प्रवेश हुआ और विष्णु के विभिन्न अवतारों की कल्पना की गई।

गुप्त कालीन अभिलेखों व पुरातात्विक साक्ष्यों से ज्ञात होता है, कि गुप्त काल में भी जिसमें मत्स्यवतार, कूर्मावतार, वाराहवतार, नृसिंहावतार, वामनावतार, परशुरामवतार, रामावतार, कृष्णावतार, बौद्धावतार की दस अवतारों से संबंधित प्रतिमाओं का निर्माण होता था और उपासना भी प्रचलित थी। इसमें कुछ अवतारों की चर्चा गुप्त नरेशों के अभिलेखों में भी प्राप्त होती है, जिससे दस अवतारों की कल्पना की जा सकती है।

नालन्दा विश्वविद्यालय गुप्त काल में कुमारगुप्त ने बनवाया था। वामन, मत्स्य, कूर्म, वराह एवं नृसिंह आदि विष्णु के अवतारों की प्रतिमा भरतपुर राज्य के कमन नामक स्थान से प्राप्त हुई है। इसमें वराह अवतार की प्रतिमा अन्य स्थानों से भी प्राप्त हुई है। उदयगिरि नामक स्थान में वराह अवतार की विष्णु प्रतिमा का चित्रण गुफा नं. 15 में हुआ है, तथा सागर के एरण नामक स्थान में पशु रूप में वराह की एक विशाल मूर्ति प्राप्त हुई है। उसके सारे शरीर में देवी देवता, ऋषि मुनि आदि का अंकन है। यह प्रतिमा गुप्त काल की हैं। यहां से एक विशाल गरूड़ ध्वज भी प्राप्त हुआ है, जो विष्णु मन्दिर के सामने निर्मित किया गया था। अभिलेखों से भी ज्ञात होता है, कि गुप्तकाल में वराह की पूजा व प्रतिमा का निर्माण होता था। कुमार गुप्त के दामोदर ताम्रपत्र2 में वराह के लिये दान की चर्चा प्राप्त होती है। इन सभी से अनुमान किया जा सकता है कि वराह अवतार से संबंधित मूर्तियों तथा मंदिरों का निर्माण गुप्त काल में होता था। विष्णु के राम अवतार की चर्चा भी गुप्त काल के अभिलेखों से प्राप्त होती है।

राम का उल्लेख गढ़वा के अभिलेख3 में चित्रकूट स्वामिन् के रूप में प्राप्त होता है, जो राम के लिये ही संबोधित किया जाता है। अतः उससे राम अवतार की कल्पना की जा सकती है। इस अभिलेख में विष्णु प्रतिमा का उल्लेख है, जो तिथि 148 में उत्कीर्ण किया गया था और यह समय स्कंद गुप्त राम से सम्बन्धित अनेक प्रतिमाओं का चित्रण गुप्त काल के देवगढ़ के दशावतार मन्दिर व नचना नामक स्थान के मन्दिर में प्राप्त होता है। स्कन्दगुप्त के बिहार अभिलेख विष्णु को इन्द्र का अनुज कहा गया है, जो वामन अवतार का द्योतक है। इसी प्रकार विष्णु के नृसिंह अवतार से सम्बन्धित विष्णु प्रतिमा उदयगिरि नामक स्थान की गुफा नं. 12 से प्राप्त हुई है जो गुप्त कालीन है एरण में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने विष्णु मन्दिर का निर्माण करवाया था जिसमें एक और नृसिंह एवं दूसरी ओर वराह के मन्दिर का निर्माण हुआ है। इस प्रकार पुरातात्विक एवं अभिलेखिक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि गुप्तकाल में विष्णु के दस अवतारों सम्बन्धित मूर्तियों का निर्माण हुआ जो वैष्णव धर्म से सम्बन्धित थी। इसके अतिरिक्त विष्णु की अनेक प्रतिमाओं का भी निर्माण गुप्त काल में हुआ। उदयगिरि की गुफा नं. 3,6 और 19 में निर्मित हुई है। इसी स्थान में विष्णु की 12 फुट लम्बी शेषशायी विष्णु प्रतिमा गुफा नं. 13 में अंकित है। मध्य प्रदेश के कई प्राचीन नगरों पद्यावती (पावापुर ) लुम्बवन (तुमैन), उच्चकल्प (सतना) श्रीपुर (सिरपुर) का शेषशायी विष्णु भी उल्लेखनीय है। राजिम में भी विष्णु की अनेक प्रतिमाओं का निर्माण नरेशों के काल में हुआ था। इन सब में तुमैन एवं पवाया से प्राप्त विष्णु की प्रतिमा मूर्ति शास्त्र के क्रमिक विकास के अध्ययन की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है। विष्णु की मूर्तियाँ इस काल में द्विभुजी, चतुर्भुजी, अष्टभुजी भी बनायी गई है। गदा और चक्रधर विष्णु द्विभुजी है। इस प्रकार की मूर्ति रूपवास (भरतपुर) से प्राप्त हुई है। चतुर्भुजी विष्णु की प्रतिमा उदयगिरि, सिरपुर आदि स्थानों से प्राप्त हुई है, तथा अष्टभुजी विष्णु की प्रतिमा मथुरा क्षेत्र से प्राप्त हुई है। अष्टभुजी विष्णु की खण्डित प्रतिमाएं कदाचित गुप्तकालीन है।

गुप्त काल में चतुर्व्यूह से संबंधित विष्णु प्रतिमा का भी निर्माण हुआ। ये प्रतिमाएं वासुदेव कृष्ण, संकर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरूद्ध इन चार रूपों में प्राप्त होती है। वासुदेव की प्रतिमा चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय की उदयगिरि गुफा से प्राप्त हुई है।

गुप्त काल में विष्णु के वाहन गरूड़ का मानसी रूप में स्वतन्त्र सूर्तन भी मिलती है। एरण में ध्वज स्तम्भ के शीर्ष के रूप में गरूड़ का मानवी रूप में अंकन हुआ है। वहां वे दोनों हाथों से सर्प को पकड़े हुए है एवं सिर के पीछे वक्राकार प्रभामण्डल है। पुरातात्विक एवं आभिलेखिक साक्ष्यों से ज्ञात होता है, कि गुप्त काल में वैष्णव धर्म से संबंधित अनेक मूर्तियों का निर्माण हुआ था।

गुप्त नरेशों के अभिलेखों के अनुशीलन से यह ज्ञात होता है, कि गुप्त काल में वैष्णव धर्म से सम्बन्धित अनेक मन्दिरों व प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। स्कन्द गुप्त के शासन काल में विष्णु की प्रतिमा का निर्माण किया गया। जिसकी चर्चा भीतरी अभिलेख में है, तथा गढ़वा अभिलेख में विष्णु के एक मन्दिर के निर्माण का उल्लेख प्राप्त होता है। अध्येय अभिलेखों में हमें विष्णु के विभिन्न नाम भी प्राप्त होते हैं जिनमें चक्रभृत, आत्मभू, चित्रकूट, स्वामिन्, गोविन्द, मधुसूदन, गदाधर, जनार्दन, शाडपाणि आदि उल्लेखनीय है। इस प्रकार वैष्णव धर्मावलम्बी गुप्तों के काल में वैष्णव धर्म का प्रचुर मात्रा में प्रचार एवं विकास हुआ तथा अनेक प्रकार की विष्णु प्रतिमाओं का भी निर्माण अनेक क्षेत्रों में हुआ।

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