# राजनीति विज्ञान की अध्ययन पद्धतियां | Study Methods of Political Science

राजनीति विज्ञान की अध्ययन पद्धतियां :

किसी भी विषय के व्यवस्थित ज्ञान के लिए आवश्यक है कि उसके अध्ययन की एक उचित पद्धति हो । राजनीति के समुचित अध्ययन के लिए भी कोई पूर्ण पद्धति होना जरूरी है, किन्तु प्रकृति विज्ञानों की घटनाओं के समान राजनीति विज्ञान की घटनाओं का क्रम निश्चित नहीं है। अतः प्राकृतिक विज्ञानों की तरह विद्वान इसकी अध्ययन पद्धति के बारे में एकमत नहीं है। इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान के नियमों एवं सिद्धान्तों के परीक्षण आदि के लिए प्रयोगशाला का अभाव तथा मनुष्य की क्रियाओं का विषय-क्षेत्र होना भी किसी एक सर्वमान्य पद्धति के अभाव के कारण है।

राजनीति विज्ञान के अध्ययन की पद्धतियों को दो भागों में बाँटा गया है – प्रथम श्रेणी में वे पद्धतियां रखी गयी हैं, जिनके आधार पर राजनीति विज्ञान का अध्ययन प्राचीन समय से होता आ रहा है। इनको परम्परागत अध्ययन पद्धतियां कहते हैं। दूसरी श्रेणी में वे पद्धतियां रखी गयी हैं, जिनका प्रयोग आधुनिक समय में कुछ नवीन प्रवृत्तियों के उदय के कारण हुआ है। इनको आधुनिक अध्ययन पद्धतियां कहते हैं।

A. परम्परागत अध्ययन पद्धतियां :

इस पद्धति को निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है –

1. प्रयोगात्मक अध्ययन प्रणाली

गार्नर के कथनानुसार, ‘प्रत्येक नये कानून का निर्माण, प्रत्येक नई संस्था की स्थापना तथा प्रत्येक नई नीति का निर्माण एक प्रकार से प्रयोग ही होता है, क्योंकि उस समय तक केवल अस्थाई अथवा प्रस्ताव रूप में ही समझा जाता है, जब तक परिणाम उसकी स्थायी होने की योग्यता को सिद्ध न कर दें। कॉम्टे के शब्दों में, “राज्य में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन एक राजनैतिक प्रयोग होता है।” यह सत्य है कि राजनीति विज्ञान के विद्वानों ने कई महत्वपूर्ण विषयों के सार को एकत्रित कर लिया है, किन्तु राजनीति विज्ञान में न तो प्राकृतिक विज्ञानों के प्रयोग की वस्तु पदार्थ (Matter) है, जबकि राजनीति विज्ञान के अध्ययन की प्रयोगात्मक विधि मानव (Human being) है। भौतिक विज्ञान की भाँति राजनीति विज्ञान में नहीं की जा सकती है और न ही पुनरावृत्ति की जा सकती है। अतः राजनीति विज्ञान में प्रयोग प्रणाली का प्रयोग भौतिक विज्ञानों की भाँति और उतनी मात्रा में शुद्धतापूर्वक नहीं किया जा सकता है। परन्तु राज्य के क्षेत्र में सम्पूर्ण राजनैतिक परिवर्तन ही राजनीति विज्ञान के पाठक के लिए प्रयोग है।

2. तुलनात्मक अध्ययन प्रणाली

इस सम्बन्ध में यूनान के प्रसिद्ध वैज्ञानिक अरस्तू के विचार उल्लेखनीय हैं। शक्ति पृथक्करण सिद्धान्त के जनक मॉन्टेस्क्यू और हेनरीमैन ने भी इस प्रणाली का प्रयोग किया है। इसमें पाठक राज्यों के संगठन के का तुलनात्मक अध्ययन करता है और तुलना के माध्यम से कई राजनैतिक सिद्धान्तों की खोज करता है। इस प्रणाली के विषय में अध्ययन करने वाले के लिए आवश्यक है कि वह अपने अध्ययन के विषय ‘मनुष्य’ के स्वभाव का पूर्ण ध्यान रखे, क्योंकि परिवर्तनशील मनुष्य के द्वारा जिस मानव समाज का अध्ययन होता है वह देश-काल, जलवायु आदि के प्रभाव से अलग नहीं होता है। इस प्रणाली के उपयोग में भी सावधानी रखने की बहुत आवश्यकता है। कभी-कभी एकसमान राजनैतिक स्थितियों में अलग-अलग प्रकार की घटनाएँ घटती हैं।

3. निरीक्षणात्मक अध्ययन प्रणाली

लॉवेल के शब्दों में, “राजनीति अवलोकन का विज्ञान है, प्रयोग अथवा परीक्षण का नहीं। राजनैतिक संस्थाओं की वास्तविक प्रक्रिया की मुख्य प्रयोगशाला पुस्तकालय नहीं, अपितु राजनैतिक जीवन सम्बन्धी बाह्य जगत है।”

इसके अनुसार स्वयं अध्ययन करने वाला राज्य के संगठन, कार्यों तथा राजनैतिक घटनाओं का निरीक्षण करता है। व्यावहारिक दृष्टि से यह प्रणाली अत्यन्त श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें अध्ययनकर्ता स्वयं अनुभव प्राप्त करने के पश्चात् तर्क द्वारा निष्कर्ष निकालते हैं। इसकी भी सीमाएँ हैं, जो निम्नानुसार हैं-

(अ) स्वयं अध्ययनकर्ता को सभी राजनैतिक कार्यों में पर्यवेक्षण का अवसर प्राप्त‌ नहीं होता है।

(ब) पर्यवेक्षक को अवसर मिलने पर भी आवश्यक नहीं कि उसका निष्कर्ष पूर्ण शुद्ध हो। परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि इस पद्धति का उपयोग न हो।

लार्ड ब्राइस के शब्दों में, “अमेरिकी प्रजातन्त्र तथा आधुनिक प्रजातन्त्र नामक राज्यों को इतनी प्रसिद्धि इसकी उपयोगिता की परिचायक है, तथापि यह तो मानना पड़ेगा कि इसका प्रयोग बहुत समझ-बूझकर होना चाहिए।”

4. ऐतिहासिक अध्ययन प्रणाली

राजनीतिक विज्ञान में राज्य क्या है ? और क्या होना चाहिए ? इसके व्यापक विवरण के लिए हमें इतिहास का अध्ययन करना पड़ेगा। इतिहास के अध्ययन में हमें राज्य की प्राचीन स्थिति और स्वरूप का ज्ञान होता है, वर्तमान और भविष्य के स्वरूप के बारे में निष्कर्ष निकलता है।

इसमें इतिहास की सामान्य घटनाओं को अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। भूतकाल के आधार पर वर्तमान का स्वरूप और भविष्य के संकेत (Sign) विद्यमान हैं। यह एक सापेक्षिक तत्व है, लेकिन इसमें कोई शाश्वत सत्यता नहीं दिखाई देती है। इतिहास के अध्ययन में किसी पूर्व धारणा को लेकर नहीं चलना चाहिए इतिहास के अध्ययन से राजनीतिक निष्कर्ष असत्य भी निकाल सकते हैं। इतिहास के द्वारा हम राजनैतिक तथ्यों का एकत्रीकरण कर सकते हैं, लेकिन तर्क और बौद्धिक जाँच के द्वारा ही सही निर्णय निकल सकते हैं। प्रायः भूतकाल के अध्ययन से रूढ़िवादिता की आदत बन जाती है, जो कि सही राजनैतिक निष्कर्ष में रुकावट है। राजनीति विज्ञान के अध्ययन के लिए ऐतिहासिक प्रणाली भी उपयोगी एवं लाभदायक है।

5. दार्शनिक अध्ययन प्रणाली

दार्शनिक प्रणाली में सबसे पहले मानव की मूलभूत प्रवृत्ति के स्वरूप का निर्धारण किया जाता है तथा उसके आधार पर राज्य के स्वरूप और लक्ष्य की कल्पना की जाती है।

इसके पश्चात् नैतिक एवं आदर्शात्मक विचारों के द्वारा राजनैतिक समाज के व्यवहार का निर्धारण होता है। प्लेटो, रूसो, हाल्ज आदि चिन्तकों ने इस दार्शनिक पद्धति का बहुत ही अनुसरण किया था। दार्शनिक प्रणाली में भयंकर दोष यह है कि इस पर आधारित विचार व्यावहारिक राजनीतिक जीवन से अलग हो जाते हैं। विचार कल्पना गगन में उड़ान करते हुए व्यावहारिक यथार्थवादिता से एकदम पृथक् हो जाते हैं इसीलिए प्लेटो के आदर्श राज्य को यूरोपिया या गन्धर्व नगरी कहा गया है, परन्तु राजनीति विज्ञान में दार्शनिक प्रणाली उपयोगी ही सिद्ध हुई है। इन तथ्यों पर आधारित समाज को पतन के मार्ग से बचाया गया है।

6. मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रणाली

ग्राह्य वाल्मस, बेंजहार आदि विद्वानों का कहना है कि मनुष्य के राजनीतिक व्यवहारों का आकलन मनोविश्लेषण के आधार पर किया जाना चाहिए। मानव मस्तिष्क के विश्लेषण के बिना राजनीति का अध्ययन ठीक प्रकार से नहीं हो सकता, क्योंकि समस्त राजनैतिक गतिविधियाँ मानव मस्तिष्क की ही देन हैं।

7. समाजशास्त्रीय पद्धति

राजनीति विज्ञान को चूँकि समाजशास्त्र का ही एक अंग माना जाता है, अतः इससे अलग रहकर राजनीति विज्ञान का अध्ययन नहीं किया जा सकता है। इस पद्धति के अन्तर्गत सम्पूर्ण समाज के नियम ज्ञात कर लिये जाते हैं और उन्हीं के आधार पर राजनीति का अध्ययन किया जाता है।

B. आधुनिक/व्यवहारवादी अध्ययन पद्धतियां :

वर्तमान समय में जबकि प्रत्येक वस्तु के वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता हो गई है, राजनीति विज्ञान भी इससे अछूता नहीं रहा है। राज्य के कार्यों में अपार वृद्धि हुई है इसलिए राजनीतिशास्त्री भी अपने अध्ययन को पूर्ण व आधुनिक बनाने के लिए कुछ अन्य पद्धतियों का प्रयोग करने लगे हैं, जो अग्रलिखित है –

1. प्राणिशास्त्रीय विधि

यह पद्धति राज्य की मानव शरीर के अंगों के साथ समानता करने का प्रयत्न करती है और मानवीय शरीर-विच्छेद तथा शरीर विज्ञान की भाँति विकासवादी सिद्धान्त के अनुरूप राज्य की प्रगति हुई है, इस बात पर अधिक बल देती है। इसलिए उसकी समानताएँ बड़ी ही मनोरंजक होती है, परन्तु इसका प्रयोग बड़े ही सावधानी के साथ करना चाहिए, क्योंकि जीवित अंगों पर नियन्त्रण रखने वाले विकास और परिवर्तन के नियमों को राज्य पर लागू नहीं किया जा सकता।

2. वैधानिक विधि

यह विधि राज्य को एक वैध व्यक्ति अथवा संस्था मानती है। इसका अस्तित्व विधान के निर्माण तथा कार्यान्वयन के लिए ही हो इस दृष्टिकोण से राजनीतिक समाज वैधानिक अधिकारों एवं कर्तव्यों का समूह है। यह राज्य जनहित विधानों का पूरा विश्लेषण करती है, किन्तु बहुत-सी ऐसी बातों को यह ध्येय समझती है, जो कानून के बहिर्गत और सामाजिक शक्ति से सम्बद्ध है एवं जो राज्य के विधान एवं नियमों के आधार स्तम्भ के रूप में मौजूद रहती है और जिनका प्रभाव मानवीय सम्बन्धों पर भी पड़ता है।

3. मनोवैज्ञानिक विधि

यह विधि राजनीतिक वातावरण को मनोवैज्ञानिक नियमों के द्वारा समझने की कोशिश करती है। विशेषकर मानवीय क्रिया-कलापों, लक्ष्य, समूह और समुदायों में उसकी मानसिक प्रक्रियाओं तथा जनमत को प्रभावित करने वाली विधियों का राजनीतिक दल निर्भर है और जिससे अन्तर्राष्ट्रीय कलहों की उत्पत्ति होती है। इस विधि का वर्तमान समय में बड़ा महत्व है।

4. सांख्यिकीय विधि

यह विधि नापी तथा गिनी जा सकने वाली राजनीतिक सामग्रियों को इकट्ठा करती है, इनसे नतीजे निकालती है, प्रवृत्तियों की समीक्षा करती है और सरकारी नीति की आधारशिला का काम करती है। इसका महत्व मुख्य रूप से जनसंख्या की वृद्धि और गतिशीलता, मतदान और लोकमत, आर्थिक अवस्थाओं तथा श्रम, कृषि, औद्योगिक उत्पादन, वैदेशिक व्यापार व राजस्व के अध्ययन के सम्बन्ध में है। शासन व्यवस्था तथा राजनीतिक और सामाजिक सुधार के आवश्यक आधार के रूप में सांख्यिकीय पद्धति का विशेष महत्व है।

5. वैज्ञानिक अध्ययन पद्धति

आधुनिक युग में राजनीतिशास्त्र के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक तरीकों को भी अपनाया जा रहा है; जैसे-सर्वेक्षण प्रणाली, प्रश्नावली प्रणाली, साक्षात्कार प्रणाली, सोशियोमेट्रिक प्रणाली एवं जनमत-मतदान। इन साधनों के आधार पर सम्बन्धित विषय का अध्ययन तथा विश्लेषण किया जाता है और निष्कर्ष निकाले जाते हैं। वैज्ञानिक पद्धति द्वारा निकाले गये निष्कर्ष लगभग सही होते हैं।

कौन-सी पद्धति सबसे अच्छी ?

राजनीति विज्ञान के अध्ययन के लिए उपर्युक्त वर्णित पद्धतियों में से प्रत्येक के अपने गुण व अवगुण हैं उसके सम्बन्ध में यह नहीं कहा जा सकता है कि उनमें से एक पद्धति सर्वश्रेष्ठ है। परन्तु यह महत्वपूर्ण है कि सभी पद्धतियां एक-दूसरे की पूरक हैं, विरोधी नहीं। इन पद्धतियों का सफलतापूर्वक प्रयोग तभी किया जा सकता है, जबकि इनका प्रयोग आवश्यकतानुसार साथ-साथ किया जाये। वास्तव में राजनीति विज्ञान एक सामाजिक विज्ञान है। इसलिए इसके अध्ययन की न तो एक पद्धति को छोड़ सकते हैं और न ही स्वीकार कर सकते हैं। अवसर के अनुकूल प्रत्येक पद्धति का प्रयोग करना ही उचित रहेगा। अतः राजनीति विज्ञान के अध्ययन की सर्वश्रेष्ठ पद्धति कोई एक निश्चित पद्धति नहीं हो सकती।

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