# सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य वाद

सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य वाद :

सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य वाद में संविधान संशोधन व मूल अधिकारों की स्थिति का प्रश्न विचारार्थ आया। यह वाद, मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में, इस दृष्टि कोण से भी महत्वपूर्ण है कि इसके द्वारा “शंकरी प्रसाद वाद” में निर्णीत स्थिति को पुनः विचारार्थ रखने का प्रयास किया गया। सज्जन सिंह वाद में मूलतः संविधान के 17वें संशोधन अधिनियम 1964 की वैधता को निम्न आधारों पर चुनौती दी गई थी-

  1. प्रथम, 17वें संशोधन द्वारा उन अनुच्छेदों में संशोधन/परिवर्धन किया गया है जिसके अन्तर्गत अनु० 368 में विहित विशिष्ट प्रक्रिया एवं अनुमोदन आवश्यक था, (जिसका पालन नहीं किया गया) अतः संशोधन अवैध है।
  2. शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ के वाद में निर्णीत स्थिति में पुनर्विचार आवश्यक है।
  3. 17वां संशोधन अधि० भूमि से सम्बन्धित विधायी मामला है जिस पर संसद विधि बनाने के लिए अधिकृत नहीं है। अतः संशोधन अधिनियम अवैध है।
  4. उक्त अधिनियम सक्षम न्यायालय के निर्णय को पृथक करता है अतः असंवैधानिक है।
  5. अंततः संशोधन अधि० भाग-3 में उल्लिखित मौलिक अधिकारों को अतिक्रमित करता है इस दृष्टि से अनु० 13 (2) के अन्तर्गत अवैधानिक है।

इस याचिका पर, संविधान पीठ ने, मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर की अध्यक्षता में सुनवाई की। पीठ ने बहुमत से याची की प्रार्थना अस्वीकार की। संविधान पीठ के सदस्य भाग- 3 में, संसद द्वारा संशोधन शक्ति के अन्तर्गत विधि के प्रमुख एवं सारवान प्रश्न पर एक मत नहीं थे। न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला एवं न्यायमूर्ति मुधोलकर ने बहुमत से भिन्न पक्ष व्यक्त किया किन्तु बहुमत के पक्ष को, मुख्य न्यायाधीश गजेन्द्र गडकर ने रखते हुए कहा था –

“संविधान के भाग-3 में उल्लिखित मौलिक अधिकार लोकतान्त्रिक जीवन के आधार हैं, ये नहीं कहा जा सकता कि नागरिकों को प्रदत्त ये मौलिक अधिकार शाश्वत और अनुलंघनीय हैं… कि उन्हें संविधान संशोधन द्वारा भी बदला नहीं जा सकता है।”

न्यायालय का स्पष्ट मत था, कि संविधान के अनु० 19 में की गयी व्यवस्थाएं स्पष्टतः संविधान निर्माताओं के अभिमत को स्पष्ट करती हैं। अनु० 19 (1) की धारा (a ) से (g), इसी अनुच्छेद की धारा (3) से (6) द्वारा विनियमित की जा सकती है। दूसरे, संविधान निर्माताओं ने अवश्य सोचा होगा कि सामाजिक आर्थिक समस्याओं का विधायिका सामना कर सकती है अतः संसद को समस्याओं का जनहित के विकास का सामना करने के लिए, संविधान में तदनुरूप संशोधन की भी शक्ति होनी चाहिए। अतः सैद्धान्तिक रूप में भी यह निष्कर्ष तार्किक नहीं होगा कि भाग-3 में उल्लिखित मौलिक अधिकार सदैव के लिये अन्तिम हैं और भविष्य के संशोधनों से परे हैं…। न्यायालय ने संविधान के प्रथम संशोधन द्वारा संशोधित अनुच्छेदों 15, 19 एवं 31 का हवाला देते हुये स्पष्टतः अभिनिर्धारित किया कि – “संसद संविधान में संशोधन के लिए सक्षम अधिकार रखती है।”

पुनश्च, अनुच्छेद 368 के विषय में भी न्यायालय ने इस वाद में स्पष्ट किया कि यह यह तर्क देना कि अनु० 368 मात्र संशोधन प्रक्रिया विहित किए हुए है, अनुचित है। संशोधन का अर्थ – परिवर्धन, परिवर्तन, निरसन या संशोधन कुछ भी हो सकता है जिसके अत्यन्त व्यापक अर्थ हैं। 17वें संशोधन की वैधता के प्रश्न पर न्यायाधीशों ने इस वाद में अनु० 368 के क्षेत्र और प्रभाव का विस्तार से विवेचन किया एवं अभिनिर्धारित किया कि यदि संविधान निर्माता मौलिक अधिकारों को संशोधन शक्ति से परे रखना चाहते थे तो उन्होनें इस अनुरूप संविधान में स्पष्ट उपबंध किये होते, ‘संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है एवं इस पर आधे राज्यों की स्वीकृति अनुमोदन आवश्यक नही।’

पुनः जहां तक संविधान में प्रत्याभूत मौलिक अधिकारों को न्यून करने या अतिक्रमण का प्रश्न है एवं अनु० 13 (2) के अन्तर्गत अवैधानिक ठहराए जाने को प्रश्नगत किया गया है, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनु० 13 (2) को संविधान शक्ति से पृथक विधि के रूप में देखा जाना चाहिए, इसी कारण ही संविधान निर्माताओं ने अनु० 13, को मौलिक अधिकारों के अन्तर्गत रखा किन्तु संविधान संशोधन हेतु पृथक भाग एवं अनुच्छेद दिये।

यह भी उल्लेखनीय है कि प्रश्नगत संशोधन अधिनियम भाग-3 में उल्लिखित अधिकारों को प्रभावित करता है, एवं इस दृष्टि में 13 (2) के दायरे में है, इस ‘सज्जन सिंह वाद‘ में यह प्रश्नगत ही नहीं किया गया था। न्यायाधीश मुधोलकर ने अपने निणय में इस तथ्य को स्वीकार किया, न्यायालय के अनुसार, सम्बन्धित दोनों पक्षों ने इस समय शंकरी प्रसाद वाद में दिए गये निर्णय को उचित माना था, अतः उक्त वाद ‘शंकरी प्रसाद वाद’ के पुनर्समीक्षा का प्रश्न ही नहीं।

शंकरी प्रसाद वाद‘ में अभिनिर्धारित किया गया था कि – “यद्यपि विधि में साधारणतः संवैधानिक विधि समाहित होती है परंतु सामान्य कानून (विधायी शक्ति के अन्तर्गत निर्मित) एवं संवैधानिक कानून (संवैधानिक शक्ति के अन्तर्गत विनिर्मित) के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा है।”

अनुच्छेद 13 की उपधारा (2) में ‘कानून‘ शब्द में अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत संसद द्वारा बनाया कानून नहीं आता। अनुच्छेद 13 में उल्लिखित कानून शब्द का अर्थ विधायी शक्ति के अन्तर्गत बनाये गये नियम या विनियम हैं जिसमें संवैधानिक शक्ति के अन्तर्गत विनिर्मित संशोधन नहीं आते अनुच्छेद 13 (2), अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत संशोधन को प्रभावित नहीं करता।

सज्जन सिंह‘ के इस वाद में मौलिक अधिकारों की प्रकृति एवं राज्य के नीति निदेशक तत्वों के सम्बन्धों का भी सन्दर्भ लिया गया। न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला ने संविधान के अनु० 19 की उपधारा (2) से (6) तक प्रतिबन्धों का संदर्भ लेते हुए कहा कि भाग-3 में व्यक्त मौलिक अधिकार जनहित में प्रतिबन्धित करने की व्यवस्था करते हैं परन्तु साथ ही व्यक्तिगत अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए परिवर्तन और प्रकृति के द्योतक भी हैं उनके ही शब्दों में- “व्यक्तिगत स्वतन्त्रताओं को प्रत्याभूत करते हुए भी ऐसा कोई सुधार नहीं जिसे उचित रूप से लाया न जा सके…।”

भाग तीन और भाग चार में उल्लिखित अधिकारों और निदेशक तत्वों के बीच कोई संघर्ष नहीं है, समाज के अधिकार, व्यक्ति के अधिकारों से सदैव श्रेष्ठ एवं महत्वपूर्ण है… परन्तु व्यक्तिगत अधिकारों के हटाने के वे पक्षधर नहीं थे। मौलिक अधिकारों को न्यायाधीशों के अनुसार अनु० 19 के उपधारा (2) से (6) के अन्तर्गत प्रतिबन्धित करना एक बात है एवं उन्हें संशोधन के द्वारा पूर्णतः हटा देना दूसरी बात है।

साराशंतः सज्जन सिंह बनाम राजस्थान वाद में न्यायिक दृष्टिकोण पूर्णतः भिन्न था। इस वाद में व्यक्तिगत अधिकारों को महत्वपूर्ण मानते हुए समाज के अधिकारों को श्रेष्ठता दी गयी, साथ ही पुनः निर्णीत किया गया कि अधिकारों के भाग को संविधान संशोधन के दायरे में न रखना भारतीय समाज के विकास और गत्यात्मकता के लिए ही नुकसानदेह होगा। न्यायाधीश मुधोलकर ने स्पष्टतः कहा था कि-

“यदि मौलिक अधिकारों को अपरिवर्तनीय मान भी लिया जाय, फिर भी आवश्यक गत्यात्मकता निदेशक तत्वों के आलोक में अधिकारों की समुचित व्याख्या द्वारा ही सम्भव है….

पुनश्च,

“निदेशक सिद्धान्त देश के शासन में आधारभूत है एवं भाग-3 के अधिकारों को इन सिद्धान्तों के साथ ही देखा जाना चाहिए।”

न्यायिक दृष्टिकोण में स्पष्ट अन्तर इस बात में भी देखा जा सकता है कि इस वाद में न्यायाधीशों ने व्यक्तिगत अधिकारों और सामाजिक न्याय के बीच सन्तुलन देखा, साथ ही निदेशक सिद्धान्तों की आधारभूत प्रकृति को महत्व दिया और स्पष्ट किया कि निदेशक तत्व भी देश के शासन के आधारभूत सिद्धान्त हैं, संविधान के भाग तीन के उपबंध इन सिद्धान्तों के साथ ही समझे जाने चाहिए।

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