# निदेशक सिद्धान्तों का उद्भव, प्रकृति और स्वरूप | Origin, nature and nature of Directive Principles

निदेशक सिद्धान्तों का उद्भव, प्रकृति और स्वरूप :

“उन्नीसवीं शताब्दी तक व्यक्तिगत स्वतन्त्रताओं के संरक्षण हेतु मौलिक अधिकारों का विचार प्रमुख था… बीसवीं शताब्दी में नवीन विचारों का उदय हुआ जिनका प्रतिनिधित्व निदेशक सिद्धान्त करतें हैं….” – नेहरू.

लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के साथ ही राज्य का कर्तव्य समाज में शान्ति व्यवस्था बनाये रखना या स्वतंत्रता अथवा सम्पत्ति की रक्षा तक ही सीमित न रह कर जनसाधारण के सुख एवं समृद्धि की अभिवृद्धि करना भी बन गया, इसी उद्देश्य से निदेशक सिद्धान्तों द्वारा आर्थिक और सामाजिक लक्ष्य सुनिश्चित कर दिये जाते हैं जिनका पालन राज्य द्वारा किया जाना होता है दूसरे शब्दों में – “राज्य नीति निर्माण के समय निदेशक तत्वों से निर्देशन लेते हुए आर्थिक और सामाजिक लोकतन्त्र की स्थापना करें…”

निदेशक सिद्धान्तों अथवा तत्वों के द्वारा उन आदर्श लक्ष्यों को समाहित किया जाता है जिनसे किसी देश की सरकार विधि निर्माण में उनके अनुरूप नीति निर्माण कर कार्य करे। इन तत्वों में, आर्थिक सामाजिक और प्रशासनिक सिद्धान्त अन्तर्निहित होते हैं। ये तत्व संविधान पर एक पवित्र दायित्व आरोपित करते हैं कि राज्य विधि निर्माण के समय इन्हें महत्व देकर कार्यान्वित करें।

राजतंत्रात्मक प्रणालियों में राजा शासन का प्रमुख था और उसके आदेशों का पालन ही प्रजा का दायित्व था ये विधि का शासन न होकर व्यक्ति का शासन था। प्रजातन्त्र के उदय के साथ ही इस पूरी व्यवस्था में परिवर्तन आया, राज्य की शक्तियों को विनियमित किया गया और तत्पश्चात व्यक्ति के स्थान पर विधि का शासन स्थापित हुआ। विधि की सर्वोच्चता ने मौलिक अधिकार की घोषणाओं को जन्म दिया‌ एवं मूलभूत अधिकारों की संकल्पना को प्रबल किया।

लोकतान्त्रिक देशों के लिपिबद्ध संविधानों में किसी न किसी रूप में अधिकार पत्रों को स्थान मिला। इन अधिकारों में सामाजिक आर्थिक नीतियों (अधिकारों) की घोषणा भी मौलिक अधिकारों के साथ ही की गई। दूसरे शब्दों में व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की स्थापना हुयी…

आधुनिक लोकतान्त्रिक देशों की परम्परा में यदि मौलिक अधिकारों का उल्लेख आवश्यक था तब लोककल्याणकारी अवधारणा के साथ ही निदेशक सिद्धान्तों के उल्लेख का भी महत्व बढ़ा।

युद्धोत्तर वर्षों में यह भली भाँति स्थापित हो गया कि व्यक्ति के लिए राजनीतिक क्षेत्र में ही न्याय संरक्षित किया जाना आवश्यक नहीं है वरन् सामाजिक आर्थिक क्षेत्रों में भी न्याय स्थापित होना चाहिए, परिणामतः राज्य के कार्यों में वृद्धि हुई और उसका स्वरूप सकारात्मक हो गया। राज्य सुरक्षा और कानून व्यवस्था की स्थापना संबधी पुलिस राज्य को संकल्पना से कल्याणकारी राज्य की भूमिका में आ गया।

इस परिवर्तन से राज्य अपनी सकारात्मक भूमिका से एक ऐसी सामाजिक आर्थिक व्यवस्था को विकसित करना था, जिसका लक्ष्य व्यक्ति के हितों पर कुठाराघात किये बगैर सामाजिक सुख प्रदान करना था। राज्य के लिए यह कार्य इतना गुरूतर था कि कौन से अधिकारों को कोई भी देश सामाजिक आर्थिक अधिकारों के रूप में स्वीकार करें? व्यावहारिक रूप में, इसी कारण व्यवहार में सामाजिक आर्थिक अधिकारों की व्याख्या में समान व्यवहार परिलक्षित नहीं होता है। प्रत्येक देश द्वारा अपनी सामाजिक आर्थिक स्थिति के अनुरूप अधिकारों की व्यवस्था की गयी। परिणामतः –

“किसी देश में सामाजिक आर्थिक अधिकारों को मौलिक अधिकारों के ही अन्तर्गत एवं किन्ही देशों में पृथक भाग या पृथक अध्याय में रखा गया।”

“सार और शब्दावली भी सभी देशों में व्यवहार भिन्न भिन्न रहा”

विश्व के अनेक देशों के संवैधानिक उपबन्ध यथा- आस्ट्रिया के संविधान, अल्बानियाँ, जर्मनी, पोलैण्ड, स्पेन, ब्राजील, पनामा, बेनेजुएला, फिलीपीन्स आदि की व्यवस्थाएं इस तथ्य की साक्षी हैं।

# निदेशक सिद्धान्तों का उद्भव, प्रकृति और स्वरूप | Origin, nature and nature of Directive Principles

सामाजिक आर्थिक नीतियों की सर्वोच्च विधि में व्यवस्था आयरलैण्ड के संविधान जो 1937 में प्रभावी हुआ, में विशिष्ट रूप से देखने को मिलती है। इन अधिकारों में व्यक्तिगत अधिकारों से संबंधित तत्व मौलिक अधिकारों के अन्तर्गत एवं अन्य अधिकार यथा- परिवार, शिक्षा, व्यक्तिगत संपत्ति, धर्म आदि से संबन्धित तत्व राज्य के नीति निदेशक तत्व के शीर्षक के अन्तर्गत रखे गये। इन निदेशक सिद्धान्तों का महत्व एवं विशिष्टता इस बात से भी स्पष्ट होती है कि इन अधिकारों को एक पृथक शीर्षक के अन्तर्गत रखा गया तथा व्यावहारिक रूप से लागू करने में आने वाली कठिनाइयों के कारण अनु० 45 के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गयी कि- “ये तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नही होगे….।”

आयरलैण्ड के ये निदेशक तत्व जिनका उल्लेख अनु० 45 में किया गया है संसद हेतु सामान्य निर्देशों के रूप में है ताकि संसद विधि निर्माण के समय इनसे सामान्य निर्देश ले सके।

अनुच्छेद 45 के ही अनुसार इस अनुच्छेद में उल्लिखित सामाजिक नीति के निम्नलिखित सिद्धान्त संसद के सामान्य निर्देश के लिए है। विधि निर्माण के समय इन्हें देखना संसद का कर्तव्य है।

1. राज्य लोगों के कल्याण के लिए एवं उनके हितों के संरक्षण के लिए एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना प्रभावी ढंग से करेगा जिसमें न्याय और दया राष्ट्रीय जीवन की संस्थाओं को अनुप्राणित करें।

2. राज्य अपनी नीतियों को इस दिशा में लागू करने का प्रयास करेगा जिसमें-

  • सभी नागरिक (पुरूष और स्त्री समान रूप से जीवनयापन के पर्याप्त अधिकारों के साथ) अपनी घरेलू आवश्यकताएं अपने व्यवसाय के द्वारा पूरी कर सकें।
  • भौतिक स्रोतों का नियंत्रण और स्वामित्व इस तरह से व्यवस्थित होगा‌ कि सभी व्यक्ति एवं विभिन्न वर्ग सामान्य हित की पूर्ति कर सकें।‌ स्वतंत्र प्रतियोगिता इस तरह नहीं दी जाएगी कि कुछ वस्तुओं एवं पदार्थो का स्वामित्व एवं नियंत्रण कुछ लोगों के हाथों में सिमट जाए।
  • सभी नियंत्रण और साख का लक्ष्य सभी लोगों का समग्र रूप से कल्याण‌ है।
  • आर्थिक सुरक्षा के लिए भूमि का वितरण इस तरह से किया जाएगा जिससे व्यवहारिक रूप में अधिक से अधिक परिवार रह सकें।

3. राज्य उद्योग और वाणिज्य के क्षेत्र में निजी प्रयासों का समर्थन देगा और यदि आवश्यक हुआ तो सहयोग भी देगा। राज्य प्रयास करेगा कि निजी पहल के उत्पादन और वितरण से लोगों का अनुचित शोषण न हो सके।

4. राज्य समुदाय के निर्बल वर्गों के आर्थिक हितों को संरक्षण देगा और आवश्यकता के अनुरूप विधवाओं, अनाथ और वृद्ध लोगों को मदद देगा। राज्य यह भी सुनिश्चित करेगा कि कामकाजी पुरूषों और महिलाओं के स्वास्थ्य एवं बच्चों का शोषण न हो सके। किसी भी नागरिक का आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु (जो उनके लिंग आयु एवं शक्ति के विरूद्ध है) दबाया नहीं जाएगा।

आयरलैण्ड के ये संवैधानिक उपबंध विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा सामाजिक आर्थिक विषयों में विशिष्टता के द्योतक थे। अन्य विषयों की अपेक्षा इन निदेशों की एक प्रमुख विशेषता, न्यायिक और अन्यायिक अधिकारों की स्थापना थी जो संवैधानिक व्यवस्थाओं के लिए पूर्णतया नयी व्यवस्था थी। सारांशतः इस अध्याय के शीर्षक “निदेशक सिद्धान्त” एवं उनके अन्यायिक स्वरूप ने निदेशक तत्वों के क्षेत्र को सुनिश्चित कर दिया।

इस सन्दर्भ में संवैधानिक ढांचे में निदेशक सिद्धान्तों के उल्लेख के विषय में देखना आवश्यक होगा कि निदेशक तत्व कौन कौन से हों? उनका स्वरूप क्या हो? दूसरे जनता की आम सहमति जुड़ें हों। अन्यथा संविधान की उद्घोषणा ही अविश्वसनीयता के दायरे में आ जायेगी। साथ ही संविधान में सामान्य सहमति के आधार पर उल्लेख करना मात्र ही पर्याप्त नहीं है, वे लोक प्रिय संकल्पना के अनुरूप भी हों। तीसरे, निदेशक सिद्धान्त उग्र एवं विवादास्पद स्वरूप के न हों अन्यथा नीतियों का कार्यान्वयन समुचित रूप से नहीं हो सकेगा इस तरह, सार रूप में निदेशक तत्वों की सार्वजनिक घोषणा के तीन लक्ष्य हैं …

  1. जनता को प्रशिक्षित करना
  2. एकता के रूप में सूत्रबद्ध करना एवं
  3. नीतियों के सहज प्रवर्तन के अनुरूप रखना।

इस प्रकार राज्य को नीति निदेशक सिद्धान्तों के अन्तर्गत उन तत्वों को ही उल्लिखित करना चाहिए जो सामान्य जीवनयापन के लिए आवश्यक सामाजिक कार्यों के लिए पर्याप्त और पद एवं स्थिति के लिए आवश्यक हो। संवैधानिक उपबंध, सरल रूप में जनता के लिए ग्राह्य हो जिन पर नीतियां बनाई जा सकें।

भारत के संविधान से पूर्व आयरलैण्ड ही ऐसा देश था जिसके संविधान में इस तरह के सकारात्मक तत्वों (निदेशक सिद्धान्तों) का उल्लेख था। तत्पश्चात् नवस्वतन्त्र देशों में बर्मा, नेपाल, इण्डोनेशिया व थाइलैण्ड आदि देशों के संविधानों में भी निदेशक सिद्धान्तों को स्थान दिया गया।

आयरलैण्ड के संवैधानिक उपबन्ध अन्य संविधानों की अपेक्षा इस दृष्टि से विशिष्ट थे कि वे सामाजिक, आर्थिक तत्वों की घोषणा अधिकारों के न्यायिक एवं अन्यायिक के रूप में पृथक-पृथक करते है। इस प्रकार अन्यायिक अधिकारों (जिस अवधारणा का अभी जन्म भी नहीं हुआ था) को भी स्वरूप प्राप्त हुआ।

निदेशक सिद्धान्त” शीर्षक राज्य के कर्तव्यों के साथ-साथ इन सिद्धान्तों की प्रकृति भी स्पष्ट करता है। यथा-
“इन सिद्धान्तों में कुछ सामान्य हित के लक्ष्यों को निर्धारित किया जाता है। जिन्हें राज्य जन आकांक्षाओं के आधार पर ग्रहण कर सकते हैं एवं सर्वोच्च विधि में स्थान दे सकते हैं…”

जहाँ तक निदेशक सिद्धान्तों के स्वरूप का प्रश्न है या संविधान में विहित किये जाने का प्रश्न है, ऐसा कोई निदेशक तत्वों का मॉडल या प्रारूप विकसित नहीं किया जा सकता जो सभी देशों काल और‌ परिस्थितियों में सभी के लिए उपयुक्त हो अतः स्वरूप के विषय में इतना ही कहा जा सकता है कि वे‌ सामान्य सहमति के सिद्धान्त होने चाहिए या दूसरे शब्दों में, उस देश या समाज की जन आकाक्षाओं, आवश्यकताओं के अनुरूप होने चाहिए।

सामान्य सहमति के ये सिद्धान्त किसी हद तक विवादपूर्ण हो सकते हैं परन्तु सामान्यतया इन सिद्धान्तों पर लक्ष्यों की दृष्टि से सहमति ही अधिक होगी। उदाहरणार्थ-

  • प्रत्येक व्यक्ति को कार्य के अधिकतम अवसर
  • पर्याप्त वेतन एवं कार्य की उचित दशायें
  • खाना, कपड़ा, घर एवं बीमारी की दिशा में पर्याप्त देखभाल
  • सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्थाएं
  • औद्योगिक समाज की कुदशाओं से संरक्षण
  • जन स्वास्थ्य के प्रति पर्याप्त संरक्षण एवं सहायता
  • विश्राम एवं मनोरंजन के अवसर मिलें।
  • व्यवसाय चुनने की पूर्ण व्यवस्था एवं इस हेतु पर्याप्त प्रशिक्षण आदि दिया जाए।

दूसरी ओर, इन तत्वों से भी सभी सहमत होंगे कि प्रत्येक सामान्य व्यक्ति के लाभ के लिए निदेशक सिद्धान्तों का आधार हो-

  • बाल श्रम रोकने की व्यवस्थाएं
  • बंधुआ मजदूरी पर रोक
  • स्त्रियों को कार्य में सुरक्षा एवं उनके दायित्वों का पर्याप्त संरक्षण या
  • शोषणमुक्त समाज एवं समाज के सभी पिछड़े और कमजोर लोगो के हितों का संरक्षण आदि।

इसी प्रकार सामाजिक लक्ष्यों की दिशा में –

  • विविध शैक्षणिक सुविधाएं प्रदान करना (आर्थिक परिस्थितियाँ या विविध दृष्टिकोणों के होते हुए भी)
  • जन स्वास्थ्य में सुधार लाना
  • श्रमिकों को संगठन बनाने का अधिकार देना एवं आधुनिक परिप्रेक्ष्य में उनकी सहभागिता
  • प्राकृतिक संसाधनों का दोहन
  • कृषि, वन, मछली पालन या शिकार के लिए व्यवस्थाएं एवं
  • पोषाहार तथा लोगों के लिए अधिक से अधिक गृह निर्माण योजनाएं आदि –>

                          राज्य के दायित्व में ली जा सकती हैं निदेशक तत्व इन सब रूपों में जनता पर एक दायित्व आरोपित करते हैं कि वे पूरी सहभागिता से सामने आयें एवं राज्य बगैर भेदभाव के उनकी प्राप्ति के अवसर दें राज्य का दायित्व मात्र सामाजिक आर्थिक क्षेत्र में नहीं अन्य क्षेत्रों में भी है। इसी सन्दर्भ में इन तत्वों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता और कोई राज्य अपने दायित्व से विमुख भी नहीं हो सकता।

निदेशक तत्वों का यह स्वरूप पर्याप्त एवं सम्पूर्ण नहीं, मात्र कुछ क्षेत्रों की ओर इंगित करना है

जिन पर लोकतान्त्रिक देश लोक कल्याणकारी होने के कारण आगे बढ़ने का दावा कर सकते हैं। यद्यपि कुछ देश इसकी अव्यवहारिकता को देखते हुए आलोचना भी करते हैं और स्थितियों में परिवर्तन आने पर संवैधानिक संशोधन कर उपबन्धों में परिवर्तन भी कर देते है फिर भी निदशक तत्वों के महत्व, सामाजिक आर्थिक स्वरूप, राज्य के दायित्व और जन आकांक्षाओं की दृष्टि से उन्हें नकारा नहीं जा सकता। सम्भवतः इसीलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 37 में इन तत्वों को न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय न करते हुए भी –

“देश के शासन में मूलभूत बताया गया और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य सुनिश्चित किया गया।”

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