# न्यायिक पुनर्विलोकन (सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक प्रक्रिया) | Nyayik PunarVilokan

न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) :

संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रियानुसार संसद कानून बनाती है, लेकिन भारतीय संसद को ब्रिटेन की संसद के समान प्रभुसत्ता प्राप्त नहीं है। कठोर संविधान, संघात्मक व्यवस्था और मौलिक अधिकार संसद की कानून निर्माण की क्षमता पर संवैधानिक मर्यादाएँ हैं। संविधान सर्वोच्च है और संसद की निर्माण की शक्ति संविधान की सर्वोच्चता से सीमित है। संसद कोई भी ऐसा कानून नहीं बना सकती, जो संविधान की सीमाओं का अतिक्रमण करता है। संविधान की रक्षा करने या संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखने का भार सर्वोच्च न्यायालय पर है। अतः संसद द्वारा बनाए गए कानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। यदि संसद (संघीय विधानमण्डल) या राज्य विधानमण्डलों द्वारा संविधान का अतिक्रमण किया जाता है, संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के बाहर कानूनों का निर्माण किया जाता है, तो संसद या राज्य विधानमण्डलों द्वारा निर्मित ऐसी प्रत्येक विधि को सर्वोच्च न्यायालय अवैधानिक घोषित कर सकता है। यही संवैधानिक प्रक्रिया है और इस सांवैधानिक प्रक्रिया ने सर्वोच्च न्यायालय की जिस शक्ति को जन्म दिया है, उसे ‘न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति’ के नाम से जाना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक पुनर्विलोकन की इस शक्ति के आधार पर संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करता है।

न्यायिक पुनर्विलोकन / न्यायिक पुनरावलोकन का अर्थ | न्यायिक पुनर्विलोकन का महत्व | Nyayik PunarVilokan Arth, Paribhasha, Mahatva | Nyayik PunaraVlokan

न्यायिक पुनर्विलोकन या संविधान के संरक्षक के रूप में सर्वोच्च न्यायालय :

न्यायिक पुनर्विलोकन का तात्पर्य- न्यायिक पुनर्विलोकन का तात्पर्य सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संविधान तथा उसकी सर्वोच्चता की रक्षा करने की व्यवस्था से है। यदि संघीय या राज्य विधानमण्डलों द्वारा संविधान का अतिक्रमण किया जाता है, अपनी निश्चित सीमाओं के बाहर कानूनों का निर्माण किया जाता है या मूल अधिकारों के विरुद्ध कानूनों का निर्माण किया जाता है, तो संघीय संसद या राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्मित ऐसी प्रत्येक विधि अथवा संघीय या राज्य प्रशासन द्वारा किये गये प्रत्येक कार्य को सर्वोच्च न्यायालय अवैधानिक घोषित कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की इस शक्ति को ही न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति कहा जाता है। राज्यों के सम्बन्धों में इस शक्ति का प्रयोग सम्बन्धित उच्च न्यायालय के द्वारा किया जा सकता है। मर्यादित शासन की धारणा, संघात्मक व्यवस्था और मूल अधिकारों की व्यवस्था ने न्यायिक पुनर्विलोकन को जन्म दिया है।

भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन : प्रकृति और सीमाएँ

यद्यपि भारतीय संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति प्रदान की गयी है, फिर भी भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन का क्षेत्र उतना व्यापक नहीं है, जितना कि वह संयुक्त राज्य अमेरिका में है। वस्तुतः ऐसे कुछ कारण हैं, जिन्होंने भारत में न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था को संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना में सीमित कर दिया है। इस स्थिति के कारण हैं- प्रथम, भारतीय संविधान बहुत व्यापक है। द्वितीय, मूल अधिकार के साथ-साथ उसकी सीमाएँ संविधान में ही निश्चित कर दी गई हैं। इन दो बातों के कारण न्यायिक पुनर्विलोकन का क्षेत्र सीमित हो गया है, लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण अन्तर इन दोनों देशों की संवैधानिक व्यवस्थाओं में ही निहित है। अमेरिकी संविधान में ‘कानून की उचित प्रक्रिया‘ (Due Process of Law) शब्दावली को अपनाया गया है, लेकिन भारतीय संविधान में अमरीकी संविधान की शब्दावली के स्थान पर जापानी संविधान की शब्दावली ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया‘ (Procedure Established by Law) को अपनाया गया है।

संविधान में की गयी इस व्यवस्था के आधार पर अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय किसी भी कानून की वैधानिकता की जाँच दो बातों के आधार पर कर सकता है-

(i) संघ या राज्य, जिसके भी विधानमण्डल ने उस कानून को बनाया है, उसके द्वारा इसका निर्माण उसकी कानून निर्माण की क्षमता के अन्तर्गत था या नहीं,

(ii) वह ‘कानून की उचित प्रक्रिया’ (अर्थात् प्राकृतिक न्याय के कुछ सर्वमान्य सिद्धान्तों) की शर्तों को पूरा करता है अथवा नहीं। भारत में ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ की शब्दावली को अपनाया गया है जिसका आशय यह है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय केवल प्रथम आधार पर ही किसी कानून को अवैध घोषित कर सकता है।

अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय उसकी कानून की उचित प्रक्रिया वाली धारा के आधार पर लगभग एक ‘तीसरा सदन’ या ‘उच्च विधानमण्डल’ (Super Legisla-ture) बन गया है, लेकिन हमारे देश में सर्वोच्च न्यायालय को निश्चित रूप में ऐसी स्थिति प्राप्त नहीं है। अमेरिका में जहाँ न्यायिक सर्वोच्चता को अपनाया गया है, भारत में न्यायिक सर्वोच्चता और विधायी सर्वोच्चता के बीच समन्वय स्थापित किया गया है।

न्यायिक पुनर्विलोकन का महत्व :

न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था भारतीय लोकतन्त्रक लिए नितान्त आवश्यक और भारत की समस्त राज-व्यवस्था के लिए अत्यधिक हितकर है। संविधान द्वारा संघीय व राज्य सरकारों के बीच जो शक्ति-विभाजन किया गया है, न्यायिक पुनर्विलोकन के आधार पर ही उसकी रक्षा सम्भव है। शासन की शक्ति पर अंकुश रखने तथा नागरिक अधिकारों व स्वतन्त्रताओं की रक्षा करने का कार्य भी न्यायिक पुनर्विलोकन के आधार पर ही किया जा सकता है। न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था संविधान के सन्तुलन चक्र का कार्य करती है और न्यायिक पुनर्विलोकन के आधार पर ही सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय संविधान के अधिकारी व्याख्याता तथा रक्षक के रूप में कार्य कर सकते हैं।

इसके अतिरिक्त न्यायिक पुनर्विलोकन के सम्बन्ध में की गयी कुछ आलोचनाएँ नितान्त भ्रमपूर्ण हैं। तथ्यों से इस बात की पुष्टि नहीं होती कि न्यायिक पुनर्विलोकन के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुदारवादी या प्रगति विरोधी शक्ति के रूप में कार्य किया है। कुलदीप नैय्यर ने अपने एक लेख में नितान्त सही रूप में लिखा है कि “न्यायालय से न्यायिक पुनर्विलोकन का अधिकार छीना जाना लोकतन्त्र के हित में नहीं होगा।” न्यायिक पुनर्विलोकन शासन की शक्ति को मर्यादित रखने का एक प्रमुख साधन है। 1997 ई. में सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने सर्वसम्मत निर्णय में कहा है, “न्यायिक पुनर्विलोकन संविधान का एक मूलभूत लक्षण (संविधान के मूलभूत ढाँचे का एक अंग) है। संसद संवैधानिक संशोधन के आधार पर भी न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति को सीमित नहीं कर सकती।”

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बदलता स्वरूप :

गतिशीलता संविधान का एक अपरिहार्य तत्व है। संविधान लागू होने के बाद संविधान का निरन्तर विकास होता है और यह विकास केवल संवैधानिक संशोधनों के आधार पर ही नहीं, वरन् संविधान की नई व्याख्याओं और नवीन प्रवृत्तियों के आधार पर भी होता है। बिना किसी संवैधानिक संशोधन के ही संविधान द्वारा स्थापित संस्थाएँ अपने लिए कोई नवीन भूमिका, महत्वपूर्ण भूमिका प्राप्त कर लेती हैं। गत दो दशकों में भारतीय राज-व्यवस्था के एक अंग, न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय) ने समस्त राज-व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थिति और भूमिका प्राप्त कर ली है। यह ऐसी स्थिति है, जिसके सम्बन्ध में आज से दो दशक पूर्व सोचा भी नहीं गया था। आज न्यायपालिका राज-व्यवस्था के विभिन्न अंगों को आदेश-निर्देश देने लगी है और न्यायपालिका ने यह महत्वपूर्ण स्थिति एवं भूमिका न्यायिक पुनर्विलोकन एवं न्यायिक सक्रियतावाद के आधार पर प्राप्त की है।

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