# अधिकारों का अर्थ, आवश्यकताएं एवं अवधारणाएं

अधिकारों का अर्थ, आवश्यकताएं एवं अवधारणाएं :

वर्तमान युग मानव अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं का युग है। अधिकार, स्वतन्त्रता, न्याय, प्रजातन्त्र आदि के लिए समय-समय पर युद्ध हुए है एवं समानता के लिए संघर्ष और क्रान्तियां हुई है, अर्थात् प्रत्येक राजनैतिक प्रश्न अधिकार और स्वतन्त्रता से ही जुड़ा हुआ है।

अधिकार मानव के व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, मानसिक तथा नैतिक विकास की आवश्यक शर्त है। ये वे माँगे अथवा दावे हैं जिनसे व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास करता है अधिकारों द्वारा ऐसे वातावरण का विकास होता है जिसमें व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास करते हुए सामाजिक विकास में सहायक होता है।

लॉस्की के शब्दों में- “अधिकार सामाजिक जीवन की ये परिस्थितियाँ हैं, जिनके बिना साधारणतया कोई मनुष्य अपना पूर्ण विकास नहीं कर सकता …।”

अधिकार सामान्य हित से भी जुड़े होते हैं तथा सार्वजनिक रूप से लागू हो सकते हैं। अर्थात् प्रेरक शक्ति विवेक सम्मत चिन्तन होती है। जैसा ग्रीन का मत है – “जो इच्छा दावे के साथ प्रस्तुत होती है वो अपने भले के साथ-साथ दूसरों के सन्दर्भ में भी भले की कामना करती है… अधिकार वह शक्ति है जिसकी लोक कल्याण के लिए मांग की जाती है तथा इसी के लिए मान्यता दी जाती है।”

# अधिकारों का अर्थ, आवश्यकताएं एवं अवधारणाएं

पुनः व्यक्ति के इन अधिकारों के लिए सामाजिक मान्यता भी आवश्यक है। परिणामतः मान्यता प्राप्त दावे अधिकार का रूप ले लेते हैं और ‘विचार’, ‘अभिव्यक्ति’, ‘जीवन’, ‘सम्पत्ति’ … आदि के अधिकार बन जाते हैं।

बार्कर के शब्दों में- “अधिकारों के दो पहलू हैं, प्रथमतः अधिकार व्यक्ति का दावा है जो आत्म चेतना की प्रकृति से उत्पन्न होकर अपनी निजी आदर्श वस्तुओं की इच्छा की अनुमति चाहता है, दूसरे, यह उस दावे की समाज द्वारा मान्यता तथा उसमें और उसके द्वारा इन वस्तुओं को पाने के प्रयास में नयी शक्ति का योग है…”

साथ ही अधिकार जब तक राज्य द्वारा व्यवस्थित या संरक्षित नहीं होते तब तक अधिकार नैतिक घोषणाओं के सामन है, राज्य और उसके कानून इन अधिकारों और स्वतन्त्रताओं को न केवल व्यवस्थित करते हैं, बल्कि इनकी रक्षा भी करते हैं। स्वाभाविक रूप से इन अधिकारों के प्रयोग को सुनिश्चित बनाने के लिए दमनकारी सत्ता अनिवार्य है। नैतिक अधिकारों के सामाजिक रूप में मान्यता प्राप्त दावों को राज्य, कानून की शब्दावली में परिणित कर विधिक मान्यता प्रदान कर देता है। राजनीतिक सिद्धान्त में अधिकार के लिए राजनीतिक मान्यता अति महत्वपूर्ण है। यह राजनीतिक मान्यता ही निःस्वार्थ दावों को राज्य की प्रभुसत्ता के साथ जोड़ देता है। गिलक्राइस्ट के शब्दों में- “अधिकार समाज के सदस्यों के रूप में व्यक्तियों में से तथा इस मान्यता से उत्पन्न होते है कि इसके पीछे सामाजिक कल्याण है…।”

इस प्रकार अधिकार मानव के समग्र विकास की आवश्यक शर्त है। इसी दृष्टि से अधिकार के दो पहलू हैं-

  1. व्यक्तिगत
  2. सामाजिक

व्यक्तिगत पहलू में समाज द्वारा व्यक्ति की कुछ स्वतन्त्रताएं या दावे अधिकार के रूप में स्वीकार कर लिए जाते हैं यथा ‘विचारों’ या ‘अभिव्यक्ति’, ‘व्यवसाय’, ‘आवास’ या ‘संगठन बनाने के अधिकार’। जबकि सामाजिक पहलू के अन्तर्गत इन स्वतन्त्रताओं को सामाजिक स्वीकृति दी जाती है कारण कि सामाजिक कल्याण या हित के लिए आवश्यक हैं। परन्तु सामाजिक हित में बाधक बनने की स्थिति में प्रतिबन्ध भी लगाये जा सकते है। तात्पर्य, अधिकार सामाजिक हित द्वारा मर्यादित होते है और समाज विरोधी नहीं हो सकते।

अधिकारों की धारणा के विकास के हाल के वर्षों में “दावे की स्थिति” ने “कर्तव्य पक्ष” आच्छादित कर दिया है जिस कारण “स्वतन्त्रता के रूप में अधिकारों” तथा “दावे के रूप में अधिकारों” के बीच अन्तर स्पष्टतः महत्वपूर्ण हो जाता है। दावा रूपी अधिकार धारक को दूसरे व्यक्ति की स्वतन्त्रता को सीमित करने का अवसर दे देता है, सम्भवतः इसीलिए व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर आरोपित प्रतिबन्ध को न्याय संगत ठहराने के लिए विशेष अधिकार की आवश्कता होती है जिसके न होने पर व्यक्ति का अधिकार हो जाता है कि दूसरा भी उसके अधिकारों का दमन न करें।

अधिकारों के उत्पत्ति स्वरूप या प्रकृति के विषय में अनेक सिद्धान्तों का प्रर्वतन हुआ है। प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त के अनुसार अधिकार मानव की प्रकृति के विवेक संगत ढंग से नियमित होने के कारण समय, स्थान या पर्यावरण के भेदों के बावजूद सर्वत्र लागू होते हैं। प्रकृति ऐसे अधिकारों की निर्माता है वे सार्वभौम, विवेकसंगत, विश्वव्यापी एवं स्वयं सिद्ध सत्य हैं।

आधुनिक युग में इन प्राकृतिक अधिकारों को – “अमेरिका की स्वतन्त्रता की घोषणा ( 1776 ) तथा फ्राँस की क्रान्ति ( 1789) की घोषणाओं में स्थान दिया गया, 1948 की संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा पारित सार्वजनिक घोषणा में भी इनका उल्लेख किया गया।”

ये प्राकृतिक अधिकार इस बात की स्वीकारोक्ति करते है कि सभी मानव जन्म से स्वतंत्र तथा अन्य सभी मानव के समान है। इन अधिकारों का निहितार्थ है कि मानव का अस्तित्व समाज से पूर्व हुआ है, समाज का गठन अधिकारों के संरक्षण के लिए है वे समाज द्वारा उत्पन्न नहीं किये जाते परन्तु व्यक्ति द्वारा समाज में लाये जाते है।

प्राकृतिक अधिकारों का सिद्धान्त राजनीतिक पूर्व स्थिति में अधिकारों की उपस्थिति मानता है, साथ ही मनुष्य को अकेला तथा असामाजिक मानने के कारण नकारात्मक तथ्यों पर बल देता है। परिणामतः सकारात्मक विचारों के साथ अधिकारों के वैधानिक सिद्धान्तों का जन्म हुआ।

इस अधिकारों की कानूनी अवधारणा (वैधानिक सिद्धान्त) को बेन्थम, मिल, लॉस्की जैसे विद्वानों ने पुष्ट किया। उनके अनुसार, अधिकार कानून की उपज है यदि कानून नहीं तो अधिकार भी नहीं। ऑस्टिन के ही शब्दों में – “अधिकार तभी सार्थक एवं अस्तित्व में हैं जब तक प्रभावी बनाने वाले कानून के पीछे बल या दमनकारी सत्ता है….।”

तात्पर्य, अधिकारों का वैधानिक सिद्धान्त अधिकारों के लिए कानून की मान्यता तथा राज्य के संरक्षण को आवश्यक मानता है। राज्य द्वारा ही अधिकारों को निश्चित किया जाता है, क्षेत्र सीमाबद्ध किया जाता है तथा मार्ग में आने वाली बाधाओं को हटाया जाता।

निश्चित रूप से अधिकारों का यह वैधानिक सिद्धान्त कानूनों को अति महत्व देता है और सामाजिक जीवन के महत्व को अस्वीकार करता है। पुनः यह सिद्धान्त इस पर बल नहीं देता कि अधिकार राज्य द्वारा उत्पन्न किये जाते है बल्कि राज्य द्वारा मान्यता एवं संरक्षण की आवश्यकता पर बल देता है। जैसा ग्रीन ने कहा था – “….अधिकार राज्य की मांग करते हैं…।”

अधिकारों का “आदर्शवादी सिद्धान्त” मानव के नैतिक विकास के लिए बाह्य परिस्थितियों पर बल देता है अर्थात् ‘‘अधिकारों के बिना कोई भी व्यक्ति अपना श्रेष्ठतम् रूप धारण नहीं कर सकता जो वह होने की क्षमता रखता है… प्रत्येक मानव का यह अधिकार है कि वह अपनी क्षमताओं का मुक्त रूप से विकास करें….।”

अधिकारों का यह आदर्शवादी सिद्धान्त मानव की विवेक संगत इच्छा के तत्व पर आधारित है। जो आग्रहों के रूप में प्रकट होती है और जब ऐसे आग्रहों की नैतिक मान्यता को वैधानिक मान्यता में परिवर्तित कर दिया जाता है तो अधिकारों की व्यवस्था का जन्म होता है। इस स्वरूप की व्याख्या रूसों, काण्ट तथा अंग्रेज दार्शनिक ग्रीन के विचारों में मिलती है। रूसों ने अधिकारों को ‘सामान्य इच्छा’ के अधीन कर काण्ट ने ‘नैतिक स्वतन्त्रता के आधार पर तथा ग्रीन ने अधिकारों की व्याख्या सामाजिक चेतना के आधार पर की। बार्कर के शब्दों में- “मानव चेतना स्वतन्त्रता को अभिग्रहण करती है, स्वतन्त्रता में अधिकारों का वास होता है, अधिकार राज्य की मांग करते हैं….।”

अधिकारों का ऐतिहासिक या रीतिबद्ध सिद्धान्त अधिकारों की उत्पत्ति के लम्बे समय तक पालने के तत्व पर बल देता है। मैकाइवर जैसे समाजशास्त्री अधिकारों के पीछे अनिवार्य शक्ति लम्बे समय तक पालन या प्रथा देखते है। जबकि आलोचकों की दृष्टि में लम्बे समय का कोई तार्किक आधार नहीं है।

अधिकारों के लोक कल्याणकारी सिद्धान्त या सामाजिक उपयोगिता के सिद्धान्त के अन्तर्गत सामाजिक कल्याण अनिवार्य शर्त है। बेन्थम जैसे उपयोगितावादी दार्शनिक “अधिकतम लोगों के अधिकतम कल्याण’’ की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। जिसका सरल अर्थ है अधिकारों की व्यवस्था व्यक्ति व समाज दोनों के लिए लाभकारी है। लॉस्की ने भी इसी सामाजिक कल्याण की अवधारणा को सामाजिक रूप से संबल दिया। उनके ही शब्दों में – “राज्य के सभी सदस्यों के लिए अधिकारों की उपयोगिता उसका मूल्य है…।”

अन्ततः अधिकारों के सम्बन्ध में “मार्क्सवादी” अवधारणा को ले सकते हैं जिसके अनुसार, अधिकार समाज में विद्यमान आर्थिक व्यवस्था से जुड़े हैं। मार्क्स, अधिकार, स्वतन्त्रता, समानता तथा न्याय सभी को वर्ग संघर्ष से जोड़कर देखते है। प्रभुत्व सम्पन्न वर्ग उत्पादन एवं वितरण के साधनों पर स्वामित्व रखता है और स्वयं को सत्ता में बनाये रखने के लिए व्यवस्था उत्पन्न करता है। सार रूप में सम्पन्न वर्ग अपने अधीन दूसरे वर्ग के शोषण और दमन का अधिकार प्राप्त करता है। मजदूर वर्ग को इस यथार्थ स्थिति में तब तक अधिकार नहीं मिल सकते जब तक पूँजीवादी व्यवस्था के स्थान पर समाजवादी व्यवस्था स्थापित नहीं होती, अर्थात् “अधिकारों की स्थिति सामाजिक वास्तविकता से जुड़ी है, अधिकार वर्ग चरित्र रखते है…. समाजवादी व्यवस्था लागू होते ही बुर्जुआ समाज में प्रचलित अधिकारों का त्याग हो सकेगा…।”

अधिकारों के स्वरूप एवं इस विश्लेषण से उसकी प्रमुख अवधारणाएं स्पष्ट होती है –

  • अधिकार अभिन्न रूप से व्यक्ति से जुड़े तथा व्यवहार के नियमों का निर्धारण करते हैं,
  • अधिकार व्यक्ति की चेतना शक्ति में अन्तर्निहित है, समाज कानूनी मान्यता पर बल देता है ताकि उन नैतिक दावों को संरक्षण मिल सकें।
  • अधिकारों का राजनीतिक पूर्व स्वरूप है वे राज्य से पूर्व हो सकते हैं। समाज से पूर्व नहीं। सामाजिक मान्यता पहले आती है और कालान्तर में इन रीति रिवाजों को राज्य कानून के रूप में लागू कर देता है।
  • अधिकार केवल अमूर्त सत्ताएं नहीं है उनका उपयोग किया जाता है और यह उपयोग इस भाँति हो कि दूसरे के अधिकारों को कोई हानि न पहुँचें इनका सामाजिक दृष्टि से व्यक्ति और समाज दोनो के लिये महत्व है।
  • राज्य के कार्यों से भी अधिकारों का सम्बन्ध है, व्यावहारिक रूप से ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सरकार के कार्य व्यक्तियों के अधिकारों की दशायें है, दूसरी ओर व्यक्तियों के अधिकार सरकार के कार्यो की शर्त हैं।
  • इस प्रकार अधिकार वे दावे है जो व्यक्ति की निःस्वार्थ इच्छा पर आधारित है। जिससे पहले उन्हें नैतिक मान्यता और बाद में राज्य की कानूनी मान्यता प्राप्त हो जाती है। ये व्यक्ति और समाज दोनों के लिए आवश्यक है।
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