# लॉक के ‘मानव स्वभाव’ एवं ‘प्राकृतिक अवस्था’ सम्बन्धी प्रमुख विचार

मानव स्वभाव पर विचार :

लॉक ने मनुष्य को केवल अ-राजनीतिक (Pre-Political) माना है, अ-सामाजिक (Pre-Social) नहीं, जैसा कि हॉब्स कहता है। हॉब्स के विपरीत लॉक की धारणा है कि मनुष्य में विवेक, प्रेम, सहानुभूति, दया और सहयोग की भावनाएँ पायी जाती हैं। यही कारण है कि प्राकृतिक अवस्था में भी मनुष्य सदैव संघर्ष नहीं करते हैं। मनुष्य प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति के अधिकार का उपयोग करते हैं।

लॉक के प्राकृतिक अवस्था सम्बन्धी विचार :

लॉक ने प्राकृतिक अवस्था के सम्बन्ध में अच्छा वर्णन किया है, उसके अनुसार, “यद्यपि यह प्राकृतिक अवस्था स्वतन्त्रता की अवस्था है, फिर भी यह मनमानी करने की अवस्था नहीं है। यद्यपि इस अवस्था में मनुष्य को अपने व्यक्तित्व अथवा सम्पत्ति के प्रयोग की असीमित स्वतन्त्रता है, परन्तु उसे अपने को नष्ट करने की स्वतन्त्रता नहीं है जब तक कि ऐसा करने की आवश्यकता जीवन बनाये रखने के अलावा किसी दूसरे श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए न हो।”

लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में भी मनुष्यों में विवेक था और विवेक मनुष्यों को बताता था कि, “सभी मनुष्य समान और स्वतन्त्र हैं इसीलिए किसी के जीवन, स्वास्थ्य और सम्पत्ति को हानि मत पहुँचाओ।” मनुष्य के विवेक के गुण के आधार पर ही लॉक ने निष्कर्ष निकाला है कि, “प्राकृतिक अवस्था शान्ति, सद्भावना, पारस्परिक सहयोग और आत्म-रक्षा की अवस्था है।”

लॉक के 'मानव स्वभाव' एवं 'प्राकृतिक अवस्था' सम्बन्धी प्रमुख विचार

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि हॉब्स की तरह, लॉक को अ-सामाजिक प्राणी (Pre-Social) नहीं मानता, वह तो उसे केवल अ-राजनीतिक (Pre-political) ही मानता । डनिंग ने लिखा है कि, “लॉक द्वारा कल्पित प्राकृतिक अवस्था राज्य से पहले की थी, समाज से पहले की नहीं। यह अवस्था पाशविक परस्पर संघर्ष की अवस्था नहीं थी, इसमें शान्ति और विवेक का आधिपत्य था।”

हारमॉन (Harmon) ने लॉक की प्राकृतिक अवस्था की दो विशेषताओं का उल्लेख किया है-

  1. प्राकृतिक अवस्था पूर्ण स्वतन्त्रता की अवस्था है, जिसमें मनुष्य प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए अपना कार्य करते हैं। प्राकृतिक नियम का उद्देश्य किसी की स्वतन्त्रता को नष्ट करना नहीं, वरन् उसे सुरक्षित रखना और उसका विस्तार करना है। लॉक के अनुसार, “जहाँ नियम नहीं, वहाँ स्वतन्त्रता भी नहीं।”
  2. प्राकृतिक अवस्था में सभी मनुष्यों में समानता है। सभी ईश्वर की सन्तान हैं और उसने सबको विवेक दिया है, अतः उनका यह स्वाभाविक कर्तव्य है कि वे प्राकृतिक नियमों का पालन करें।

लॉक के प्राकृतिक नियम सम्बन्धी विचार :

लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में भी लोग प्राकृतिक नियमों का पालन करते हैं यही कारण है कि प्राकृतिक अवस्था में शान्ति और परस्पर सहयोग पाया जाता है। इस प्रकार लॉक का विचार है कि प्राकृतिक अवस्था में मानव के आचरण का नियन्त्रण प्राकृतिक नियम द्वारा होता था। मैरे ने लिखा है कि, “लॉक का राजनीतिक सिद्धान्त इस धारणा पर आधारित है कि प्राकृतिक नियम होते हैं और इन नियमों का विशिष्ट नैतिक स्वरूप होता है।” इन्हीं प्राकृतिक नियमों के कारण लॉक प्राकृतिक अवस्था को अ-सामाजिक नहीं मानता, केवल अ-राजनीतिक ही मानता है। प्राकृतिक अवस्था में प्राकृतिक नियम ही मनुष्यों का पथ-प्रदर्शन करते हैं।

लॉक ने प्राकृतिक नियमों की व्याख्या करते हुए कहा है कि, “प्राकृतिक अवस्था पर प्राकृतिक नियमों का शासन होता है। ये नियम प्रत्येक मनुष्य के लिए बन्धनकारी होते हैं। ये तर्क पर आधारित होते हैं और समस्त मानव जाति को यह बताते हैं कि. क्योंकि सभी मनुष्य समान और स्वतन्त्र हैं, इसलिए किसी मनुष्य को दूसरे के जीवन, स्वास्थ्य, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए। सभी मनुष्यों को एक-दूसरे के अधिकारों पर आक्रमण करने और शारीरिक क्षति पहुँचाने से रोका जाना चाहिए। प्राकृतिक अवस्था में, प्राकृतिक कानूनों या नियमों को लागू करने का कार्य प्रत्येक के हाथ में है, और प्रत्येक मनुष्य को इन नियमों का उल्लंघन करने वाले को उतनी मात्रा में दण्ड देने का अधिकार है जितनी मात्रा में कानून भंग को रोकने के लिए आवश्यक है।”

संक्षेप में गैटिल के शब्दों में, “प्राकृतिक नियमों के सम्बन्ध में लॉक ने ग्रोशियस का अनुसरण किया है और बताया है कि प्राकृतिक नियम ऐसे नियमों का संग्रह है जो विवेक द्वारा निश्चित किये जाते हैं और जिनसे प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य का पथ-प्रदर्शन होता है।”

लॉक और हॉब्स के मानव स्वभाव के दृष्टिकोण में अन्तर :

मानव स्वभाव के बारे में इन दोनों के दृष्टिकोण में अन्तर निम्न प्रकार है-

1. हॉब्स की दृष्टि में मानव कोरा पशु है जिसमें स्वार्थ की भावना प्रबल है, जबकि लॉक का मानव नैतिक व्यवस्था को स्वीकार करने वाला और नैतिक नियमों के अनुसार आचरण करने वाला जीव है। हाँ, लॉक यह मानता है कि मनुष्य को जैसा करना चाहिए, वैसा वह सदैव नहीं करता है। उदाहरण के लिए सदैव सच नहीं बोलता है, जबकि वह जानता है कि सच बोलना चाहिए। इसी प्रकार वह चोरी भी करता है, जबकि उसे चोरी नहीं करनी चाहिए। उसके इन तथ्यों को जानने वाले ज्ञान के कारण ही वह पशु से भिन्न है, भले ही उन पर कभी-कभी आचरण न करे।

2. हॉब्स का मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी और झगड़ालू है, परन्तु लॉक का मनुष्य परोपकारी और शान्तिप्रिय है।

3. हॉब्स के अनुसार मनुष्य के सभी कार्यों का एकमात्र उद्देश्य शारीरिक सुख की प्राप्ति है, परन्तु लॉक के अनुसार मनुष्य अपने आचरणों की ओर भी ध्यान देता और आचरण करता है।

4. हॉब्स के अनुसार मनुष्य दुर्गुणों से भरा पड़ा है, परन्तु लॉक के अनुसार सद्गुणों से।

संक्षेप में जोन्स के शब्दों में, “यह मानने की बजाय कि मनुष्य कोरा पशु है, लॉक यह मानता है कि मनुष्य नैतिक और सामाजिक प्राणी है।”

उपर्युक्त से स्पष्ट है कि लॉक की मानव-स्वभाव सम्बन्धी धारणा हॉब्स से भिन्न है। इसी कारण दोनों की राज्य सम्बन्धी धारणा में भी अन्तर है। यद्यपि दोनों राज्य का औचित्य सिद्ध करने के लिए उपयोगितावादी तर्क का सहारा लेते हैं। हॉब्स कहता कि राज्य के अभाव में मानव जीवन एकाकी, पाशविक, क्षणभंगुर है, अतः किसी भी प्रकार के राज्य (भले ही निरंकुश हो) का होना उसके न होने से अच्छा है। लॉक कहता है कि राज्य के अभाव में भी मानव-जीवन वैसा नहीं, जैसा हॉब्स बताता है फिर भी कुछ विशेष सुविधाएं व अधिकतर राज्य द्वारा ही मिल सकते हैं, और इनकी प्राप्ति के लिए राज्य में रहना चाहता है। परन्तु इस उपयोगिता के आधार पर हॉब्स निरंकुश राजतन्त्र का और लॉक सीमित राजतन्त्र का समर्थन करता है।

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