# कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त | Karl Marx’s Theory of Surplus Value

कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त :

कार्ल मार्क्स के सामान्य दर्शन पर उसके विचारों को चार वर्गों में विभक्त किया जा सकता है- द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद, इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या, वर्ग-संघर्ष का सिद्धान्त और अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त

अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की अवधारणा मार्क्स के प्रसिद्ध पुस्तक ‘दास कैपिटल‘ में प्रमुख रूप से पायी जाती है। अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त के आधार पर पूँजीवादी समाज की स्थापना होती है। इसी सिद्धान्त के आधार पर पूँजीपतियों ने श्रमिकों का अत्यधिक शोषण करके अपनी पूँजी का अत्यन्त विकास किया है। अतः ‘अतिरिक्त मूल्य’ को पूँजीवाद का प्रधान स्रोत माना जाता है।

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त ‘मूल्य के श्रम सिद्धान्त‘ पर आधारित है। मूल्य के श्रम सिद्धान्त में वस्तु का विनिमय मूल्य उसके उत्पादन में लगाए गए श्रम की मात्रा पर निर्भर करता है। अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त लाभ का एक स्वरूप है क्योंकि श्रमिक जब किसी वस्तु का उत्पादन करता है तो उसकी मजदूरी की अपेक्षा उस वस्तु को बहुत अधिक मूल्य में बेचा जाता है जिसका लाभ पूँजीपतियों को मिलता है। इस सिद्धान्त के आधार पर ही पूँजीपतियों की पूँजी में अत्यधिक वृद्धि होती है और श्रमिकों का आर्थिक शोषण होता है।

मूल्य के श्रम सिद्धान्त का इतिहास :

सत्रहवीं शताब्दी में मार्क्स के बहुत पहले अनुदार एवं उग्र सुधारवादी सिद्धान्तों में श्रम मूल्य सिद्धान्त की रूपरेखा मिलती है। इस सिद्धान्त का सर्वप्रथम प्रतिपादन सर विलियम पेटी ने किया था। इसके बाद अनेक अर्थशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जिसमें एडम स्मिथ एवं डेविड रिकार्डो प्रमुख हैं। एडम स्मिथ ने वस्तु के प्राकृतिक एवं कृत्रिम मूल्यों के भेदों पर अत्यधिक बल दिया। प्राकृतिक मूल्यों से उनका तात्पर्य वस्तु के आन्तरिक मूल्यों से था और कृत्रिम मूल्यों से तात्पर्य उसके विनिमय मूल्य या क्रय शक्ति से था जो मुख्यतः उसके उत्पादन में खर्च हुए श्रम से निर्धारित होता है।

एडम स्थिम के अनुसार किसी वस्तु का सामान्य मूल्य उसके उत्पादन में लगे श्रम को मालूम करके निर्धारित करना चाहिए। इसी प्रकार डेविड रिकार्डो के अनुसार अधिकांश वस्तुओं का सामान्य विनिमय मूल्य उत्पादन में लगाए गए श्रम की मात्रा से निर्धारित होना चाहिए।

उन्नीसवी शताब्दी में अनेक अर्थशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए तर्क दिया कि श्रमजीवी लोग समस्त सम्पत्ति का उत्पादन करते हैं अतः श्रमजीवियों को श्रम के समस्त उत्पादन का अधिकार है अर्थात् श्रम से ही वस्तुओं का मूल्य निर्धारित होना चाहिए। श्रम मूल्य सिद्धान्त के आधार पर ही कार्ल मार्क्स ने अपने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त को निर्धारित किया है।

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त :

मार्क्स ने पूँजीपतियों द्वारा श्रमिकों के शोषण के आधार पर अपने ‘अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त‘ को प्रतिपादित किया। अठारहवीं शताब्दी में भी कुछ अर्थशास्त्रियों ने कृषि उत्पादन के आधार पर इस सिद्धान्त की मूल प्रवृत्तियों को व्यक्त किया था कि कृषि में इतना उत्पादन होता है, कि भूमि के उपयोग की कीमत और कृषि श्रमिकों की मजदूरी निकाल देने के बाद भी बहुत बचत होती है जिसका उपभोग कृषि मालिक करता है। रिकार्डो ने भी उद्योगों के बारे में कहा है कि इससे इतना अधिक लाभ तो मजदूरों को दिये वेतन के अतिरिक्त होता है।

मार्क्स के यह कहने के पश्चात् कि श्रम ही किसी वस्तु मूल्य को पैदा करता है अपने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त पर आती है, जो कि उसके विचार प्रणाली में इसलिए महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है कि इसके द्वारा उसने यह सिद्ध किया है कि पूँजीपति श्रमिकों का शोषण किस प्रकार करते हैं।

मार्क्स के अनुसार जब पूँजीपति वर्ग श्रमिकों के श्रम का अत्यधिक भाग हड़प लेता है और उसे श्रम के बदले जीवनयापन के लिए थोड़ा साधन वेतन के रूप में देता है तो वहाँ अतिरिक्त मूल्य पैदा होता है। श्रमिकों के श्रम से पैदा हुए मूल्य और उस श्रम के बदले श्रमिकों को मिलने वाले मूल्य के बीच का अन्तर ही अतिरिक्त मूल्य है अर्थात् श्रमिक जब अपने श्रम से जितना मूल्य पैदा करता है पूँजीपति उसके बदले में श्रमिक को अल्प वेतन या मूल्य प्रदान करता है जो श्रम किये गये मूल्य से अत्यन्त कम होता है। श्रमिक द्वारा उत्पन्न किये गये मूल्य का अधिकतर भाग पूँजीपति अपने पास रख लेता है। इसी को अतिरिक्त मूल्य कहते हैं। पूँजीपति अपने लाभ के लिए श्रमिकों का शोषण करके अतिरिक्त मूल्य को अपने पास रखता है। जैसे एक श्रमिक एक कारखाने में दस घण्टे कठिन परिश्रम के बाद ₹ 100 के मूल्य की वस्तु बनाता है। परन्तु पूँजीपति उसे ₹ पन्द्रह वेतन या श्रम के बदले देता है। इस प्रकार उसके श्रम का अधिकांश भाग पूँजीपति अपने पास रख लेता है।

अतिरिक्त मूल्य की मुख्य बात यह है कि मानव श्रम जितना विनिमय मूल्य उत्पन्न करता है, श्रमिक उसके अनुपात में कम पारिश्रमिक प्राप्त करता है। इस प्रकार का विचार मार्क्स का ही नहीं था। उससे पहले अर्थशास्त्री रिकार्डो और वॉन यूरेन आदि इस बात पर पहले से ही जोर देते आये थे कि, “श्रमजीवी जिस मूल्य का उत्पादन करता है, उसे उससे कम मजदूरी के रूप में मिल पाता है।” कुछ विचारकों ने यहाँ तक कहा है कि पूँजीपति लाभ, ब्याज, आदि के रूप में जो कुछ भी प्राप्त करते हैं, वह सब वही अतिरिक्त मूल्य होता है, जिसको श्रमिकों द्वारा उत्पन्न किया जाता है।

मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त पर रिकार्डो का प्रभाव :

प्रो. वैपर ने कहा है कि, “मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त रिकार्डो के सिद्धान्त का ही व्यापक रूप है, जिसके अनुसार किसी भी वस्तु का मूल्य उसमें निहित श्रम की मात्रा के अनुपात में होता है, बशर्ते कि यह श्रम उत्पादन की क्षमता के वर्तमान स्टैण्डर्ड के तुल्य हो। अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की धारणा के विषय में मार्क्स रिकार्डो के विचार वस्तुतः से बहुत प्रभावित था।”

उपयोगिता मूल्य तथा विनिमय मूल्य :

मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की व्याख्या दो शब्दों की व्याख्या के पश्चात् ही की जा सकती है। ये शब्द हैं- उपयोगिता मूल्य तथा विनियम मूल्य। प्रयोग मूल्य वस्तु की उपयोगिता को कहा जा सकता है। इस प्रकार के मूल्य वाली वस्तुएँ उपयोगी तो होती हैं लेकिन उनका कोई मूल्य नहीं होता क्योंकि उनमें श्रम की कोई मात्रा नहीं लगती। उदाहरण के लिये, हवा और पानी अत्यन्त उपयोगी वस्तुएँ हैं लेकिन उनका विनियम मूल्य नहीं है। किसी वस्तु में विनिमय मूल्य उसी समय पैदा होता है, जबकि उनमें मानवीय श्रम की कुछ मात्रा लग जाती है।

Ex:-

अतिरिक्त मूल्य = विनिमय मूल्य – लागत मूल्य

यदि एक वस्तु का विनिमय मूल्य ₹ 15 और लागत ₹10 है तो अतिरिक्त मूल्य = 15-10 = ₹5 होगा, जो सीधा पूँजीपतियों की जेब में चला जाता है।

मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त कीमतों का सिद्धान्त नहीं है :

मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त पर विचार करने से पहले यह बात स्पष्ट रूप से समझ ली जानी चाहिए कि मार्क्स ने अपने इस सिद्धान्त में कीमतों के निर्धारण से सम्बन्ध रखने वाली कोई बात नहीं कही है, अर्थात् उसका सिद्धान्त हमको यह नहीं बताता कि विभिन्न वस्तुओं की कीमतों का किस तरह निर्धारण होता है और उनमें उतार-चढ़ाव क्यों होता है और अपने मूल्य के सिद्धांन्त द्वारा मार्क्स ने केवल यह दिखाने का ही प्रयत्न किया है कि पूँजीपति श्रमिक को यथायोग्य पारिश्रमिक नहीं देते। वे उनकी आय का अधिकांश भाग स्वयं निगल जाते हैं और इस प्रकार श्रमिक उनके शोषण का शिकार बने रहते हैं।

विनिमय मूल्य श्रम की मात्रा पर निर्भर है :

चूँकि विनिमय मूल्य की सृष्टि के लिये किसी वस्तु पर मानव का श्रम लगना आवश्यक है, अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि विनिमय मूल्य की दर आवश्यक श्रम की मात्रा पर निर्भर करती है। जिस वस्तु के उत्पादन में अधिक श्रम लगे, उसका विनिमय मूल्य भी अधिक ही होना चाहिए और जिसकी प्राप्ति में श्रम कम लगे, उसका मूल्य भी कम होना चाहिए। इस प्रकार मूल्य को निर्धारित करने वाला तत्त्व श्रम ही है।

मार्क्स ने लिखा है कि, “यदि हम वस्तुओं के प्रयोग मूल्य का विचार न करें, तो उनमें एक ही वस्तु सामान्य बचती है और वह है- उनके श्रम द्वारा उत्पत्ति। इस कारण उपयोगी वस्तु का मूल्य इसलिए ही है कि मानव श्रम का उपयोग उसमें हुआ है। तब इस मूल्य की मात्रा का माप कैसे किया जाये? स्पष्टतः मूल्य की सृष्टि करने वाले तत्त्व की मात्रा श्रम से है, जो वस्तु में निहित है। श्रम की मात्रा की माप उसकी अवधि से होती है और श्रम काल का मापदण्ड सप्ताहों, दिवसों एवं घण्टों में होता है। वह है, श्रम काल या श्रम की मात्रा जो उत्पादन के लिए सामाजिक दृष्टि से आवश्यक है। इस, सम्बन्ध में प्रत्येक वस्तु को उसकी अपनी श्रेणी का औसत नमूना चाहिए। दो वस्तुओं मूल्य का अनुपात उन पर खर्च किये हुए श्रम काल के अनुपात के अनुसार होता है।”

इस प्रकार मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त यह बताता है कि श्रम ही वस्तुओं के वास्तविक मूल्यों का निर्धारक तत्त्व है।

जीविका योग्य मजदूरी का सिद्धान्त :

मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त का जीविका योग्य मजदूरी के सिद्धान्त से घनिष्ठ सम्बन्ध है। जीविका योग्य मजूदरी के सिद्धान्त की व्याख्या प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने की थी। एडम स्मिथ, रिकार्डो आदि भी इस सिद्धान्त से परिचित थे। इस सिद्धान्त की मुख्य धारणा यह है कि श्रमिक को उतना ही पारिश्रमिक दिया जाता है जिससे कि वह अपने परिवार के पालन योग्य जीविका के साधन प्राप्त कर सके। इसका अर्थ यह है कि जीवित रहने के लिए जितनी मजदूरी की आवश्यकता होती है, मजदूर को केवल उतनी ही मजदूरी दी जाती है, उससे ज्यादा नहीं।

प्रो. कोकर ने मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त को इन शब्दों में प्रकट किया है- “मार्क्स ने बड़े विशद् रूप में अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की व्याख्या की। जिस प्रकार प्राचीनकाल में दास या कृषक दासत्व के कार्य करते थे, उसी प्रकार आज श्रमजीवी अपनी सेवाएँ अर्पित करते हैं, जिसके लिये उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता और जिसके द्वारा निर्मित मूल्यों को सम्पत्ति के स्वामी हजम कर जाते हैं। पूँजीपति उन मशीनों और यन्त्रों के स्वामी होते हैं, केवल जिन पर मजदूर ही काम कर सकते हैं। मजदूरों की अपनी चीज केवल अपना श्रम ही होती है, जिसे वे सम्पत्ति के स्वामी अथवा पूँजीपति को ऐसे दामों में बेचते हैं जो उन्हें तथा उनके परिवार वालों को केवल जीवित रखने योग्य होते हैं।”

मार्क्स के ग्रन्थों का शायद सबसे प्रभावशाली भाग वे हैं जिनमें उसने लाभ की अनिवार्य आवश्यकता से प्रभावित पूँजीपतियों के उन प्रयत्नों का वर्णन किया है जो वे अतिरिक्त मूल्य को बढ़ाने के लिये मजदूरों का अधिकतम शोषण करते हैं।

उसका अन्तिम निष्कर्ष यह है कि इन अवस्थाओं को समाप्त करने का एकमात्र उपाय है व्यक्तिगत भाड़े, ब्याज तथा लाभ के सभी सुयोगों का सर्वनाश और यह परिणाम केवल समाजवादी व्यवस्था के अन्तर्गत ही सम्भव है, जिसमें व्यक्तिगत पूँजी का स्थान सामूहिक पूँजी ले लेगी, न कोई पूँजीपति रहेगा और न मजदूर। सब व्यक्ति सहकारी उत्पादक बन जायेंगे।

अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की आलोचना :

अर्थशास्त्रियों ने मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की निम्नलिखित आलोचना की है-

1. वैज्ञानिकता का अभाव

विद्वानों का कथन है कि मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त यथार्थ एवं वास्तविक नहीं है। इसका उपयोग केवल दिखाने के लिए हो सकता है कि पूँजीवाद में श्रमिकों का शोषण होता है। यह सिद्धान्त किसी सुनिश्चित वैज्ञानिक आधार पर आधारित नहीं है। इसके अलावा इस सिद्धान्त की उपयोगिता भी नहीं है।

2. पूँजी की अवहेलना

मार्क्स का यह कथन है कि केवल श्रम ही मूल्य का उत्पादन है, गलत है। वास्तव में मूल्य का उत्पादन करने के लिए पूँजी की भी आवश्यकता पड़ती है, बिना पूँजी के श्रम का कोई भी मूल्य नहीं है।

3. श्रम शक्ति पर विशेष बल

मार्क्स श्रमिक की शक्ति पर विशेष बल देता है किन्तु वह इस को भूल जाता है कि श्रमिक की कितनी शक्ति कम हुई क्योंकि इसको नापा नहीं जा सकता। उसकी कीमत उसके उत्पादन व्यय से मापी या निर्धारित नहीं की जा सकती।

4. सिद्धान्त की सारहीनता

यह सिद्धान्त सारहीन है। इस सिद्धान्त को समझे बिना भी हम समझ सकते हैं कि पूँजीपति श्रमिक वर्ग का शोषण किस प्रकार करते है।

5. क्रान्ति पर विशेष बल

मार्क्स इस सिद्धान्त में क्रान्ति को ही श्रमिक वर्ग की समस्या का एकमात्र साधन बतलाता है, यह अमान्य है।

6. शोषण का सिद्धान्त

इस सिद्धान्त में केवल यह दिखलाया गया है कि पूँजीपति श्रमिकों का शोषण करते हैं। इसलिए कैरयू हण्ट ने लिखा है, “यह मूल्य का सिद्धान्त नहीं है, यह तो वास्तव में शोषण का सिद्धान्त है।”

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