# राज्य की परिभाषा व आवश्यक तत्व | राज्य के प्रमुख तत्व | Definition and essential elements of state

“राज्य एक भूमिगत समाज है जो शासक और शासितों में बँटा होता है और अपनी सीमाओं के क्षेत्र में आने वाली अन्य संस्थाओं पर सर्वोच्चता का दावा करता है।” — लास्की

राज्य क्या है यह राजनीति शास्त्र का एक जटिल प्रश्न है। प्रत्येक व्यक्ति राज्य का सदस्य होता है और राज्य शब्द का प्रयोग प्रतिदिन अनेक बार किया जाता है किन्तु राज्य क्या है यह बहुत कम लोग समझते हैं। विभिन्न राजनीतिशास्त्रियों ने राज्य को भिन्न भिन्न रुपों मे समझा है।

कार्ल मार्क्स के अनुसार राज्य एक वर्गीय संस्था (Class Structure) है। कुछ विचारक मानते हैं कि राज्य ऐसी वस्तु है जो सम्पूर्ण समाज की होने के साथ-साथ सम्पूर्ण समाज के लिए है। कुछ इसे शक्ति की व्यवस्था मानते हैं तो कुछ इसे लोककल्याण की व्यवस्था मानते हैं।

राज्य शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर ‘State‘ लैटिन भा़षा के स्टैटस (Status) से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ किसी व्यक्ति के सामाजिक स्तर से होता है परन्तु धीरे-धीरे इसका अर्थ बदला और बाद में इसका अर्थ सारे समाज के स्तर से हो गया।

राज्य की परिभाषा व आवश्यक तत्व | राज्य के प्रमुख तत्व | Definition and essential elements of state | Rajya Ki Paribhasha, Pramukh Tatv | Rajy Ke Tatv

राज्य की परिभाषाएं

राजनीति विज्ञान के विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से राज्य की परिभाषायें प्रस्तुत की है। प्राचीन तथा आधुनिक विचारकों ने अलग-अलग ढंग से राज्य की परिभाषायें दी हैं। यहाँ हमें दोनों प्रकार की परिभाषाओं का अध्ययन करना होगा।

प्राचीन विचारक :

राजनीति विज्ञान के जनक अरस्तू ने राज्य की उत्पत्ति के पूर्व अनेक समुदायों के संगठनों की कल्पना की थी। उसके अनुसार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसमें सामाजिक जीवन से ही सद्गुणों का विकास होता है। मनुष्य परिवारों में रहता था, परिवारों से कुलों तथा कुलों से ग्रामों का विकास हुआ। अन्ततः ग्रामों का संगठन राज्य के रूप में प्रकट हुआ। इस प्रकार राज्य एक सर्वोच्च समुदाय माना गया जिसमें परिवार कुल एवं ग्राम समाहित है।

अतएव अरस्तू ने राज्य की परिभाषा इस प्रकार दी है “राज्य परिवारों तथा ग्रामों का एक ऐसा समुदाय है जिसका लक्ष्य पूर्ण सम्पन्न जीवन की प्राप्ति है।” प्रसिद्ध रोमन विचारक सिसरों के अनुसार “राज्य एक ऐसा बहुसंख्यक समुदाय है जिसका संगठन सामान्य अधिकारों तथा पारस्परिक लाभों की प्राप्ति के लिए किया जाता है।” ग्रोशियस राज्य को एक ऐसा स्वतंत्र मुनष्यों का पूर्ण समुदाय मानता है जो अधिकारों की सामान्य भावना तथा लाभों में पारस्परिक सहयोग द्वारा जुड़ा होता है।

प्राचीन विचारकों की परिभाषाओं से निष्कर्ष स्वरूप राज्य की दो विशेषतायें सामने आती हैं-

  1. राज्य सभी समुदायों से उच्चतर समुदाय है।
  2. सभी मनुष्य सम्मिलित रूप में उन लाभों को प्राप्त करते हैं जो केवल राज्य द्वारा प्राप्त होते हैं।

आधुनिक विचारक :

आधुनिक विचारकों ने राज्य की परिभाषा नये प्रकार से की है। उसमें राज्य को एक समुदाय की अपेक्षा संगठनात्मक इकाई के रुप में स्वीकार किया गया है जो निम्न परिभाषाओं में स्वतः स्पष्ट हो जायेगा।

बर्गेस के अनुसार “राज्य एक संगठित इकाई के रुप में मानव जाति का विशिष्ट भाग है।”

बलंशली के मतानुसार– “किसी निश्चित भू-भाग पर बसा हुआ राजनीतिक रूप में संगठित समाज राज्य कहलाता है।”

हालैंड के अनुसार– “राज्य एक ऐसा विशाल जनसमुदाय है जो एक निश्चित भू-खण्ड में निवास करता है तथा जिसमें बहुमत की अथवा एक बड़े वर्ग की इच्छा, उसकी शक्ति के कारण, उसके विरोधियों को भी मान्य हो।”

हाल के अनुसार– “एक स्वतंत्र राज्य के ये लक्षण हैं कि उस राज्य की जनता अपने राजनीतिक आदर्शों के लिए स्थायी रूप से संगठित हो, उसके अधिकारों में निश्चित भू-खण्ड हो तथा वह बाह्य नियंत्रण से मुक्त हो।”

फिलीमोर के शब्दों में– “मनुष्यों का ऐसा समुदाय राज्य कहलाता है जो किसी निश्चित भू-खण्ड पर स्थायी रुप से निवास करता हो तथा जो सामन्य कानूनों, अदालतो व रीति रिवाजों द्वारा एक व्यवस्थित समुदाय में संगठित हो तथा जो सुसंगठित सरकार द्वारा उस भू-भाग की सीमा में निवास करने वाले मनुष्य व अन्य सभी पदार्थों पर पूर्व नियन्त्रण, अधिकार व प्रभुत्व रखता हो तथा जो विश्व के किसी भी अन्य समाज से युद्ध करने, शान्ति करने तथा सब प्रकार के अन्य अन्तर्राष्ट्रीय सम्बनधों को बनाने का अधिकार रखता है।”

राज्य के लिए आवश्यक तत्त्व (Elements of State)

उपर्युक्त परिभाषाओं से यही निष्कर्ष निकलता है कि राज्य एक संगठित राजनीतिक इकाई है जिसके चार प्रमुख तत्व होते हैं-

  1. जनसंख्या
  2. निश्चित भू-भाग
  3. शासन
  4. प्रभुसत्ता।

1. जनसंख्या

राज्य के बनने के लिए जनसंख्या आवश्यक है। बिना जनसंख्या के राज्य नहीं बन सकता। किसी निर्जन प्रदेश को राज्य नहीं कहा जा सकता। जनसंख्या की सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। परन्तु राज्य में आबादी उसके साधनों के अनुपात में हो तो अच्छा है।

2. निश्चित प्रदेश या भूमि

राज्य का दूसरा आवश्यक अंग निश्चित भूमि है। जनसंख्या की भांति यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि आदर्श राज्य के लिए कितना क्षेत्रफल आवश्यक है। कुछ समय पहले लेखकों का मत था कि आदर्श राज्य में काफी खाद्य सामग्री उत्पन्न करने वाली भूमि होनी चाहिए जिससे नागरिकों को दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़े। परन्तु आजकल यह धारणा गलत हो गई है। इंग्लैण्ड में इतनी ही खाद्य सामग्री उत्पन्न होती है जो कि वर्ष भर पूरी न पड़े लेकिन वहां के लोग उद्योग धन्धों से इतना धन उत्पन्न कर लेते हैं कि वे खाद्य वस्तुऐं दूसरे देशो से आसानी से खरीद सकें। यदि किसी राज्य के पास अधिक भूमि हो तो वह उसके लिए शक्तिदायक सिद्ध होती है।

अमेरिका का क्षेत्रफल 30,26,789 वर्गमील है, भारत का क्षेत्रफल 12,61,323 वर्गमील है। कई राज्य ऐसे है जिनका क्षेत्रफल बहुत थोड़ा है। अतः राज्य के लिए क्षेत्रफल निश्चित नहीं किया जा सकता फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि छोटे राज्यों की अपेक्षा बड़े राज्य अधिक उपयोगी रहते हैं क्योंकि वे अधिक शक्तिशाली होते है और उनमें विभिन्न जातियों के मिश्रण के कारण उदार भावना बनी रहती है।

3. सरकार

सरकार राज्य का तीसरा महत्वपूर्ण अंग है। सरकार वह एजेन्सी है जिसके द्वारा राज्य की इच्छा प्रकट होती है और क्रियान्वित होती है। सरकार के द्वारा ही समाज में संगठन उत्पन्न होता है और शांति की स्थापना होती है। सरकार के बिना मनुष्यों के समूह अव्यवस्थित रहेंगे और उनमें अशांति बनी रहेगी। सरकार के तीन अंग होते है- कार्यपालिका, विधानमण्डल और न्यायपालिका।

कार्यपालिका देश का शासन चलाती है और कानून को लागू करती है, विधानमण्डल कानून को बनाता है और न्यायपालिका कानूनों की व्याख्या करती है। जो व्यक्ति सरकार के नियम और कानूनों का पालन नहीं करते सरकार उन्हें दण्डित करती है। राज्य में सरकार किस प्रकार की हो उसके कोई निश्चित नियम नहीं हैं। जहाँं भारत, इंग्लैण्ड, अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैण्ड, फ्रांस, इटली आदि में लोकतन्त्र है वहीं चीन, फिनलैण्ड, चैकोस्लोवाकिया, हंगरी और पौलेण्ड आदि देशाें मेें कम्युनिस्ट पार्टी लम्बे समय से सत्तारुढ़ है। कई देशाें में संसदीय सरकार है तो कई देशों में अध्यक्षात्मक सरकार है। इससे सिद्ध होता है कि राज्य बनाने के लिए सरकार का रुप् निश्चित नहीं है।

4. प्रभुसत्ता

राजसत्ता राज्य का प्राण है। इसके बिना राज्य नहीं बन सकता। राजसत्ता का अर्थ है राज्य की सर्वाेच्च शक्ति। राजसत्ता दो प्रकार की होती है – बाहरी और अंदरूनी। बाहरी सत्ता का अर्थ है कि देश किसी बाहरी शक्ति के अधिन ना हो। उदाहरण के लिए 1947 से पूर्व भारत अंग्रेजों के अधीन था, अतः भारत राज्य नहीं था वरन् ग्रेट बिटेन ही राज्य था जिसका भारत पर स्वामित्व था। अन्दरुनी राज्यसत्ता का अर्थ है कि राज्य अपनी सब संस्थाओं और व्यक्तियों के ऊपर सर्वोच्च सत्ता रखता हो। किसी भी राज्य को किसी अन्य राज्य के व्यक्तियों और संस्थाओं पर नियन्त्रण रखने की आज्ञा नहीं दी जा सकती है।

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