# राज्य की उत्पत्ति का ऐतिहासिक (विकासवादी) सिद्धान्त | Evolutionary Theory of Origin of the State

राज्य की उत्पत्ति का ऐतिहासिक या विकासवादी सिद्धान्त

राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में किसी भी सिद्धान्त को स्वीकार नहीं किया जा सकता। आधुनिक समय में इस बात को स्वीकार किया जाने लगा है कि राज्य का निर्माण नहीं किया गया, यह तो सतत विकास का परिणाम है। डाॅ. गार्नर ने कहा है कि राज्य न तो ईश्वर की सृष्टि है न वह उच्चकोटि के शारीरिक बल का परिणाम है। न किसी समझौते की कृति है, न ही परिवार का विस्तृत रुप है। यह तो क्रमिक विकास से उदित ऐतिहासिक संस्था है।

राज्य की उत्पत्ति की सही व्याख्या विकासवादी सिद्धान्त द्वारा की गयी है। इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य का विकास आदिकाल से चला आ रहा है। इस क्रमिक विकास ने ही राष्ट्रीय राज्य का स्वरुप प्राप्त किया है। बर्गेस के अनुसार राज्य मानव समाज का निरन्तर विकास है जिसका आरम्भ अत्यन्त अधूरे और विकृत रुप से हुआ। लीकाॅक के अनुसार राज्य की उत्पत्ति एक क्रमिक विकास के आधार पर हुई। राज्य के इस क्रमिक विकास में अनेक तत्वों ने सहयोग दिया है वे इस प्रकार है –

  • मूल सामाजिक प्रवृत्ति
  • राजनैतिक चेतना
  • रक्त सम्बन्ध
  • धर्म, शक्ति
  • आर्थिक आवश्यकताएँ।
राज्य की उत्पत्ति का ऐतिहासिक सिद्धान्त | Evolutionary Theory of Origin of the State | राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धान्त | Rajya Ki Utpatti Ka Atihasik Siddhant | Rajya Ke Vikasvadi Siddhant

1. मूल सामाजिक प्रवृत्ति

राजनीति विज्ञान के प्रसिद्ध लेखक अरस्तु ने कहा है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज के बिना जीवित नहीं रह सकता। मानव की इस मूल सामाजिक प्रवृत्ति ने राज्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अरस्तु कहते है कि ‘‘जो व्यक्ति समाज में नहीं रहते वे या तो देवता होते है या जंगली जानवर।’’ समाज में मनुष्यों के साथ रहने से अनेक सामाजिक और राजनैतिक कठिनाइयां लोगों के सामने आयी। इन समस्याओं का स्वाभाविक रुप से समाधान के रुप में, राज्य का उदय हुआ। मानव की जटिलता के साथ साथ राज्य की जटिलता बढ़ती गयी।

2. रक्त सम्बन्ध

हेनरी मेन ने लिखा है कि समाज के प्राचीनतम इतिहास के आधुनिक शोध इस बात की ओर संकेत करते हैं कि मनुष्य को एकता सूत्र में बांँधने वाला तत्व रक्त सम्बन्ध ही था। कुछ विचारक हेनरी मेन की बात से सहमत नहीं है उनका कहना है कि रक्त सम्बन्ध की अभिव्यक्ति का साधन क्या था। परिवार, कुल या जाति परन्तु यह सर्वमान्य तथ्य है कि रक्त सम्बन्ध एकता का द्रढ़तम बन्धन है। यह कहावत भी है कि खून पानी से गाढ़ा होता है। रक्त सम्बन्ध से समाज बनता है और समाज से राज्य का निर्माण होता है। प्राचीन समय से रक्त सम्बन्ध माता और पिता से जाना जाता था। खेती का विकास हो जाने के पश्चात यह जाति से, फिर कुटुम्ब, फिर समाज और फिर राज्य के नाम से जाना जाने लगा। मेकाइवर के अनुसार रक्त सम्बन्ध समाज को जन्म देता है और समाज राज्य को जन्म देता है।

3. धर्म

रक्त सम्बन्ध के समान धर्म ने भी राज्य के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रक्त सम्बन्ध और राज्य एक सिक्के के दो पहलू हैं। रक्त सम्बन्ध ने आदिम युग में राज्य को एकता सूत्र में बांँधा। एक रक्त सम्बन्ध के देवता, रीति रिवाज और परम्पराएँं भी एक समान होती है। जो उसे एक सूत्र में बांँधती है। विल्सन के अनुसार प्रारंम्भिक समाज में धर्म और रक्त सम्बन्ध उनकी एकता की अभिव्यक्ति थी। गेटल के अनुसार रक्त सम्बन्ध और धर्म एक सिक्के के दो पहलू है। धर्म ने आदिम युग में मनुष्य में पाशविकता की जगह आदर, आज्ञा पालन और नैतिकता का भाव जगाया।

प्राचीन समय से ही व्यक्ति अपने परिवार के मरे हुए व्यक्तियों की पितृ पूजा और धर्म के अनुसार समाज में न्याय देने का कार्य करता रहा है। आदिम युग में धर्म का एक अन्य रुप शक्ति की पूजा थी। व्यक्ति जिन विषयों को समझा नहीं पाता, उसकी पूजा करने लगता, जो उसे एकता के सूत्र में बांँधती थी। उस समय पर तान्त्रिकों और जादूगरों का जनता पर गहरा प्रभाव था। गिल क्राइस्ट कहता है कि प्रमुख जादूगर से राजा बनने का चरण आसान है। राज्य और धर्म का सम्बन्ध आदिम समय से ही नहीं था, यह आज भी है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, भारत, सउदी अरब, अफगानिस्तान आदि में धर्म और राजनीति में गहरा सम्बन्ध देखा जाता है।

4. शक्ति

राज्य के विकास में शक्ति का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। युद्ध शक्ति को व्यवहारिक रुप प्रदान करने वाला साधन था। युद्ध ने राजा को जन्म दिया। जैक्स ने कहा है कि जन समाज का राजनैतिक समाज में परिवर्तन शान्तिपूर्ण उपायों से नहीं युद्धों से हुआ है। मनुष्य की एक मूल प्रवृत्ति है कि वह दूसरों पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता है। राज्य के विकास में जब खेती, निवास स्थान और सम्पत्ति का विकास हुआ तब इनकी रक्षा के लिये युद्ध होने लगे। जनता शक्तिशाली व्यक्ति का नेतृत्व स्वीकार करने लगी। शक्ति से शासक के प्रति भक्ति के भाव जगे और भक्ति ने शासक को मजबूत बनाया और राज्य का विकास हुआ।

5. आर्थिक आवश्यकताएंँ

राज्य की उत्पत्ति और विकास में आर्थिक विकास भी महत्वपूर्ण तत्व रहा है। गेटल के अनुसार आर्थिक गतिविधियाँं जिनके द्वारा मनुष्य ने भोजन, निवास आदि की पूर्ति की और बाद में सम्पत्ति तथा धन का संचय किया, राज्य के निर्माण में महत्वपूर्ण तत्व रही है- सम्पत्ति के उदय ने राज्य को अनिवार्य बना दिया। प्लेटो, हाॅब्स, लाॅक, रुसो आदि ने भी इसका समर्थन किया है। आदिम काल में मानव ने शिकार कर जीवनयापन किया। फिर पशुपालन और भ्रमणशील जीवन, इसके पश्चात कृषि का उदय हुआ सम्पत्ति संग्रह शुरु हुआ, स्थाई निवास बने। समाज में दास व राजा जैसे वर्ग बने, फिर औद्योगिक विकास हुआ, जिसमे जेल, पुलिस, न्यायालय, कानून, अमीर, गरीब आदि बने और राज्य विकास करता चला गया। इसमें राज्य के विकास पर आर्थिक प्रभाव को स्पष्ट देखा जा सकता है।

6. राजनैतिक चेतना

राजनैतिक चेतना का तात्पर्य, राज्य की उत्पत्ति के उद्देश्यों को प्राप्त करने के प्रति जागरुकता है। गिलक्राइस्ट के अनुसार राज्य के निर्माण की तह में, जिसमें रक्त सम्बन्ध और धर्म भी है, ये राजनीतिक चेतना ही है। ब्लंश्ली के अनुसार सामाजिक जीवन की इच्छा और आवश्यकता ही राज्य के निर्माण का कारण बनती है। मानव समाज का जैसे जैसे विकास हुआ। उसकी आवश्यकताएं और जटिलताएं बढ़ती चली गयी। इन सभी का समाधान राजनैतिक चेतना के माध्यम से ही हुआ। वर्तमान समय में भी राजनैतिक चेतना राज्य के विकास का कारण है। राजनैतिक चेतना के कारण ही कानून, न्याय आदि व्यवस्था का विकास हुआ।

निष्कर्ष

राज्य की उत्पत्ति का विकासवादी सिद्धान्त ही वर्तमान में मान्य है। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि राज्य किसी समय विशेष की नहीं अपितु अनेक तत्वों के क्रमिक विकास का परिणाम है। यह अतीत से आज तक चला आ रहा है। यह सिद्धान्त मनौवैज्ञानिक ऐतिहासिक और समाज शास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है इसके अनुसार राज्य न तो कृत्रिम संस्था है और न ही दैवीय उत्पत्ति है। यह सामाजिक जीवन का धीरे-धीरे किया गया विकास है। इसके अनुसार राज्य के विकास में कई तत्वों रक्तसम्बन्ध, धर्म, शक्ति, राजनैतिक-चेतना, आर्थिक आधार का योगदान है। अतः राज्य सबके हित साधक के रुप में विकसित हुआ।

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