# चम्पाकम दोराइराजन बनाम मद्रास राज्य वाद

चम्पाकम दोराइराजन बनाम मद्रास राज्य वाद :

चम्पाकम दोराई राजन बनाम मद्रास राज्य वाद संविधान में उल्लिखित समानता के अधिकार के अनु० -15 (4) जिसके द्वारा सामाजिक और शैक्षिणिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए विशेष उपबंध किये जाने की व्यवस्था करता है, से सम्बन्धित है।

भारतीय लोक तन्त्र की संवैधानिक व्यवस्था का आधारभूत तत्व समानता है। सामाजिक मूल्यों की आधुनिक व्यवस्था में समानता का शास्त्रीय महत्व भी है, अर्थात् एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना करना, जिसमें प्रत्येक मनुष्य को बगैर भेदभाव के समानता मिलनी चाहिए। इसी समानता के अधिकार के अन्तर्गत अनु० 15 – “धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध करता है।”

संविधान की ये व्यवस्थायें राज्य को धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग जन्म स्थान या इनमें से किसी आधार पर किसी नागरिक के विरूद्ध असमानता का व्यवहार करने से रोकती है, पुनः संविधान का अनु० 14 “विधि के समक्ष समानता” और “विधि का समान संरक्षण” का अधिकार जहाँ नागरिकों और गैर-नागरिकों को समान रूप से प्रदान करता है, वही अनु० 15 के अन्तर्गत उल्लिखित व्यवस्थाएँ मात्र नागरिकों को प्राप्त है।

इस अनुच्छेद 15 में विभेद का अर्थ है – “किसी व्यक्ति के साथ दूसरे की तुलना में प्रतिकूल व्यवहार करना…..।”

इसी अनुच्छेद का खण्ड- (2) उपबन्धित करता है कि कोई भी नागरिक धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर, सार्वजनिक स्थानों (दुकान, भोजनालयों) या सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग (कुआं, तालाब, सड़कें आदि) के सम्बन्ध में किसी शर्त या अयोग्यता से प्रभावित न होगा। इस अनुच्छेद का उद्देश्य हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त कर एक नये समाज की स्थापना करना है।

खण्ड (3) राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की शक्ति भी प्रदान करता है, खण्ड 4 जिसे 1951 में प्रथम संशोधन द्वारा जोड़ा गया था, राज्य को सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गो, अनुसूचित जातियों एवं आदवासियों के लिए विशेष उपबन्ध करने की शक्ति देता है।

सामाजिक ओर शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग के लिए विशेष उपबन्ध से सम्बन्धित व्यवस्था के इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय ‘मौलिक अधिकारों की श्रेष्ठता’ से जुड़ा है। इस मामले में मद्रास सरकार ने एक राजाज्ञा द्वारा राज्य के मेडिकल और इन्जीनियरिंग कालेजों में प्रवेश के लिए विभिन्न जातियों और समुदाय के विद्यार्थियों के लिए कुछ स्थानों का निश्चित प्रतिशत निर्धारित किया, इन स्थानों का आरक्षण धर्म-वर्ण और जाति पर आधारित था, परिणाम स्वरूप ब्राम्हणों के लिए कुछ ही स्थान थे एवं जिनके भर जाने पर योग्यतम, ब्राम्हण विद्यार्थी को भी प्रवेश नहीं मिल सकता था जबकि अन्य समुदाय के अपेक्षाकृत कम योग्यता रखने वाले विद्यार्थी इस आरक्षण व्यवस्था से प्रवेश पा सकते थे।

न्यायालय के समक्ष चम्पाकम दोरई राजन वाद आने पर मद्रास सरकार ने अपनी इस राजाज्ञा को न्यायोचित बताया एवं स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य जनता के सभी वर्गों (पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जाति एवं जनजाति) को सामाजिक न्याय दिलाना है दूसरे, ये राजाज्ञा इस आधार पर भी न्यायोचित है कि ये नीति निर्देशक तत्वों में उल्लिखित अनु० 46 की व्यवस्था के भी अनुरूप है। किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने चंपाकम दोराई राजन वाद में मद्रास राज्य की इस राजाज्ञा को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित किया कि इस राजाज्ञा द्वारा किया गया वर्गीकरण “धर्म, मूलवशं और जाति के आधार पर है, विद्यार्थियों की योग्यता के आधार पर नहीं।”

इस कारण राजाज्ञा संविधान के अनु० 29 (2) एवं 15 (1) के विरुद्ध है, एवं पूर्णतः असंवैधानिक है। दूसरे, मद्रास सरकार का इस तर्क पर कि राजाज्ञा नीति निर्देशक तत्वों को व्यवस्था के अनुरूप है,

न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि –

“राज्य के नीति निदेशक तत्व जिन्हें अनुच्छेद 37 द्वारा न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय बनाया गया है मूल अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकते, जबकि मौलिक अधिकार अन्य उपबन्धों के होते हुए भी रिट एवं आदेशों से प्रवर्तनीय हैं, मौलिक अधिकारों का अध्याय पवित्र है, और विधायिका या कार्यपालिका के किसी कानून द्वारा उनका उल्लघंन नहीं किया जा सकता, नीति निदेशक तत्व उनके अनुरूप होने चाहिए वे मौलिक अधिकारों पर प्रभावी नहीं हो सकते।”

स्पष्टतः, चंपाकम दोराइराजन सम्बन्धी इस वाद में न्यायालय का अभिनिर्धारण मौलिक अधिकारों की श्रेष्ठता प्रदर्शित करता है।

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