# राजनीति विज्ञान की स्वायत्तता | Autonomy of Political Science In Hindi

राजनीति विज्ञान की स्वायत्तता :

राजनीति के वैज्ञानिक अध्ययन को ही राजनीति विज्ञान कहा जाता है। एक अनुशासन के रूप में राजनीति विज्ञान की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। उसे उतना ही प्राचीन माना जा सकता है जितना कि प्राचीन यूनानी चिन्तक। राजनीति विज्ञान को स्वतंत्र विज्ञान के रूप में स्थापित करने के बहुत कम प्रयास हुए हैं। प्लेटो और अरस्तु दोनों में ही यह तथ्य समान रूप से मौजूद था कि बिना नीतिशास्त्र के राजनीति अर्थहीन है। अरस्तु ने अप्रत्यक्ष रूप से ही इस विषय की स्वायत्तता के बारे में कहा।

मैकियावेली और हॉब्स ने इसका अस्तित्व स्वीकार किया और इसे शक्ति की अवधारणा के चारों ओर विकसित करने का प्रयास किया। एक पृथक अनुशासन के रूप में इसका विकास पिछले सौ वर्षों की देन कहा जा सकता है। यूनेस्को के द्वारा 1948 में इस विषय के अन्तर्गत चार क्षेत्र माने गये:-

  • १. राजनीतिक सिद्धान्त
  • २. राजनीतिक संस्थाएँ
  • ३. दल समूह व जनमत
  • ४. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध

फ्रांस, जर्मनी आदि यूरोपीय देशों में अभी भी यह कानून के साथ पढ़ाया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में इसे धीरे-धीरे गौरवपूर्ण स्थिति प्राप्त हुई है। 1856 में पहली बार कोलम्बिया विश्वविद्यालय में इस विषय की प्रथम विभागीय पीठ स्थापित की गई। आज अमेरिका राजनीति विज्ञान के अध्ययन में संसार के सभी राष्ट्रों में आगे है और वहाँ 20,000 से भी अधिक संख्या में उच्चकोटि के राजवैज्ञानिक, शोधकर्ता और समीक्षक कार्य कर रहे है। अमेरिकन पॉलिटिकल साइन्स एशोसिएशन और सोशल साइन्स रिसर्च काउन्सिल आदि संस्थाओं को इस विषय को मजबूती देने में महत्वपूर्ण स्थान रहा है।

राजनीति विज्ञान का अर्थ, परिभाषा व विशेषताएं

इस विषय को ‘मानव का विज्ञान’ बनाने में व्यवहारवादियों का उल्लेखनीय योगदान है। द्वितीय महायुद्ध से पूर्व राजनीति विज्ञान का क्षेत्र सिर्फ राजनीतिक संस्थाओं तक ही सीमित था। द्वितीय महायुद्ध के आस-पास राजनीतिक विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ। अब यह समाज की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं तक व्यापक हो गया। राजनीतिक समाजशास्त्र तथा राजनीतिक अर्थशास्त्र जैसे विषय अस्तित्व में आए। अन्तरअनुशासनात्मक अध्ययन को बल मिला। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए कि राजनीति विज्ञान का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। राजनीति विज्ञान ने विभिन्न विषयों से प्रभावित होते हुए भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखा है। राजनीति विज्ञान को अलग-अलग युग में अलग-अलग तत्वों ने प्रभावित किया हैं।

प्राचीन एवं मध्यकाल में राजनीति विज्ञान को धर्म ने प्रभावित किया तो आधुनिक युग में राष्ट्रवाद ने प्रभावित किया। यही कारण है कि प्राचीन काल में राज्य का स्वरूप दैवीय था और छोटे राज्यों की धारणा थी। आधुनिक काल में राष्ट्र राज्य की धारणा अस्तित्व में आई है।

राजनीति विज्ञान का मूल क्षेत्र इस लोक की समस्याओं को मानवीय एवं सामुहिक प्रयासों से सुलझाना है। इसी दृष्टि से यह राज्य, कानून, संविधान आदि का विवेचन करता आया है। आधुनिक युग में राष्ट्रवाद, प्रजातंत्र और विज्ञान ने इसकी उपयोगिता को बढ़ाया है। अब यह जनता के समीप आ गया है। राज्योत्तर संस्थाओं जैसे दबाव गुट, राजनीतिक संस्तुति व समाजीकरण का अध्ययन कर यह अनुशासन संघर्षों का समाधान खोजने में लगा है।

आज राजनीति विज्ञान को सशक्त विज्ञान बनाने की आवश्यकता है। इसके अनुशासन की उपयोगिता यह है कि यह विज्ञान को विनाशकारी प्रयोग से दुनिया को बचा सकता है। निर्धन राष्ट्रों को विकसित राष्ट्रों की बराबरी में खड़ा कर सकता है। यह एक जनकल्याणकारी अनुशासन है जिसका उद्देश्य युद्ध के बजाय राष्ट्रों के बीच सौहार्दपूर्ण अस्तित्व को बढ़ाना है। इसकी इसी उपयोगिता के कारण राजनीति वैज्ञानिकों के नए दायित्व हो गए है। इसे एक मानवीय एवं सामाजिक विज्ञान बनाने की आवश्यकता है।

यह प्राकृतिक विज्ञानों की भाँति सिर्फ तथ्य पर आधारित नहीं है। मानवीय मूल्यों से इसका विज्ञानत्व व्यापक हितों और श्रेष्ठ जीवन की प्राप्ति के लिए लगाया जा सकता है। राजनीति विज्ञान के अनेक दिशाओं में विकसित होने की सम्भावना है। प्रथम वह मूल्यों की स्थापना करता है, वह अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान कराता है। मानवीय संघर्ष का मूल कारण व्यक्ति-व्यक्ति में उचित सम्बन्धों का अभाव है। राजनीति विज्ञान व्यक्तियों में परम्पर उचित सम्बन्ध स्थापित करके संघर्ष के स्थान पर सहयोग के सिद्धान्त को प्रतिष्ठित करने के लिए प्रयत्नशील है। दूसरा, वह राजनीतिकों, नागरिकों और प्रशासकों के लिए मंत्रणा-सेवाएं प्रदान करने का कार्य करता है। वह इस बात पर भी विचार करता है कि प्रशासन को किस प्रकार से जनता के प्रति अधिकाधिक उत्तरदायी बनाया जाये। तीसरा, राजनीति-वैज्ञानिक राजनीति घटनाओं के सम्बन्ध में चेतावनी के रूप में पूर्व कथन कर सकता है। चौथा, राजनीति विज्ञान अनुसंधान सेवाएं प्रदान करता है जिसे नेताओं को नीतियाँ बनाने में मार्गदर्शन मिलता है।

राजनीति वैज्ञानिक राजनीतिक अभियन्ता, सुधारक और परामर्शदाता तीनों ही है। उसे वैज्ञानिक अन्तदृष्टि के साथ कलात्मक तथा मानवीय मूल्यों की रक्षा भी करनी है। उसे “राज्य कैसा है” इस पर ही विचार नहीं करना है वरन् “कैसा होना चाहिए” इस पर भी विचार करना है। व्यवहारवादियों ने इस अनुशासन को वैज्ञानिकता प्रदान की है तो उत्तर-व्यवहारवाद ने इसे शुद्ध विज्ञान बनाने के बजाय मूल्य-युक्त मानवीय विज्ञान बनाया है। यह निश्चित भविष्यवाणी भले ही नहीं कर पाये, परन्तु उन सम्भावनाओं को तो खोज ही सकता है जो विश्व में राष्ट्रों की टकराहट को रोक सके।

फाइनर ने ठीक ही कहा है, “यदि हम निश्चित भविष्य के दृष्टा नहीं बन सकते हैं तो कम से कम सम्भावना के पैगम्बर तो बन ही सकते हैं।” किन्तु आज राजनीति विज्ञान सम्भावना तक पहुंचक र रूक नहीं जाता, वरन् उसने सम्भावनाओं को सम्भव बनाना अपना दायित्व समझ लिया है। प्रजातंत्र ने राजनीति विज्ञान के अध्ययन को महत्वपूर्ण बना दिया है। राजतंत्रात्मक समय में प्रजा अपने अधिकारों को नहीं समझती थी तथा राजकार्य में हस्तक्षेप नहीं होता था। भारत में नव प्रजातंत्र की जो स्थापना हुई है उसे देखते हुए भारतीय नागरिकों, विशेषतः भारतीय विद्यार्थियों के लिए राजनीति विज्ञान के अध्ययन का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है। प्रजातंत्र के लिए सबसे अधिक आवश्यकता प्रबुद्ध एवं जागरूक नागरिकों की है और नागरिकता की इस भावना को विकसित करने का कार्य भी राजनीति विज्ञान का ही हैं। इसी कारण वर्तमान युग में राजनीति विज्ञान का महत्व बड़ गया है।

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