# राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत | Directive Principles of State Policy

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत :

राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत केन्द्रीय एवं राज्य स्तर की सरकारों को दिए गए निर्देश है। यद्यपि ये सिद्धांत न्याययोग्य नहीं हैं, ये देश के प्रशासन में मूल भूमिका निभाते हैं। राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत का विचार आयरलैण्ड के संविधान से लिया गया है। आर्थिक न्याय की स्थापना एवं कुछ लोगों के हाथों में धन के संचय को रोकने के लिए इन्हें संविधान में शामिल किया गया है। इसलिए कोई सरकार इसकी अवहेलना नहीं कर सकती। दरअसल ये निर्देश भावी सरकारों को इस बात को ध्यान में रख कर दिए गए हैं कि विभिन्न निर्णयों एवं नीति-निर्धारण में इनका समावेश हो।

नीति निदेशक सिद्धांतों का वर्गीकरण :

नीति-निदेशक सिद्धान्तों को चार श्रेणियों में वर्गीवृफत किया गया है। वे हैं :-

  1. आर्थिक और सामाजिक सिद्धांत
  2. गाँधीवादी सिद्धांत
  3. अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से संबंधित सिद्धांत और
  4. विविध सिद्धांत

आर्थिक और सामाजिक सिद्धांत :

  1. स्त्री, पुरूष दोनों के लिए आजीविका का पर्याप्त साधन जुटाना
  2. संपत्ति का संकेन्द्रण रोकने के लिए आर्थिक व्यवस्था का पुनर्गठन
  3. स्त्री, पुरूष दोनों को समान कार्य के लिए समान पारिश्रमिक
  4. स्त्री, पुरूष और बच्चों के लिए योग्य रोजगार एवं कार्य का स्वच्छ वातावरण तैयार करना।
  5. बच्चों को शोषण और नैतिक अधोगति से बचाना।
  6. रोजगार एवं शिक्षा का अधिकार तथा बेराजगारी, बुढ़ापे, बीमारी एवं असमर्थता की स्थिति में सरकारी सहायता के उपाय करना।
  7. कार्य का न्यायोचित एवं मानवीय वातावरण तैयार करना एवं प्रसूति सेवा की व्यवस्था करना।
  8. सार्वजनिक उपक्रमों के प्रबंधन में मजदूरों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाना।
  9. कामगारों विशेषकर अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए शिक्षा प्रबंध एवं उनके आर्थिक हितों को बढ़ावा देना।
  10. सभी कामगारों के लिए उचित अवकाश एवं सांस्कृतिक मनोरंजन के अवसर उपलब्ध कराना।
  11. जीवन स्तर को ऊँचा करने एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुविधा प्रदान करना।
  12. छ: साल तक के सभी बच्चों को बाल्यकाल की सुविधाएँ एवं शिक्षा की व्यवस्था करना।

गांधीवादी सिद्धांत :

कुछ सिद्धांत ऐसे हैं जो महात्मा गांधी के आदशों के आधार पर बनाए गए हैं। ये निम्नलिखित हैं:

  1. गांव में पंचायतों का गठन करना।
  2. गांव में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना।
  3. नशीले पदार्थों और शराब, आदि पर प्रतिबंध लगाना जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
  4. गाय, भैंस आदि दुधारू पशुओं की नस्लों को सुधारना तथा उनके वध पर प्रतिबंध लगाना।

विश्व शांति एवं सुरक्षा संबंधी सिद्धांत :

विश्व शांति एवं सुरक्षा की दिशा में सहयोग का वातावरण तैयार करने के लिए भारत निम्नलिखित उपाय करेगा –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को बढ़ावा।
  2. राष्ट्रों के बीच न्यायोचित एवं सम्मानजनक संबंध स्थापित करना।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय कानून, संधि से उत्पन्न दायित्वों का सम्मान करना।
  4. अन्तर्राष्ट्रीय विवादों का पारस्परिक समझौते के द्वारा हल ढूंढना।

विविध नीति-निर्देशक सिद्धांत :

इस वर्ग के सिद्धांत राज्य को निर्देश देते हैं कि –

  1. सभी भारतीयों के लिए समान आचार संहिता बनाई जाए।
  2. ऐतिहासिक इमारतों का संरक्षण किया जाए।
  3. पर्यावरण प्रदूषण रोकना एवं वन्य जीवन का संरक्षण
  4. निःशुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था की जाए।

भारतीय संविधान का भाग-4, राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों जिन्हें संविधान के अनु० 36 से 51 तक उल्लिखित किया गया है, से सम्बन्धित है। के० एस० हेगड़े के शब्दों में- “मूल अधिकारों का प्रयोजन जहाँ एक समतापूर्ण समाज की सृष्टि करना, समस्त नागरिकों को समाज के प्रतिबन्धों और दबावों से मुक्त करना तथा उनके लिए स्वर्ण विहान लाना है, वहीं निदेशक तत्वों का प्रयोजन शांतिपूर्ण तरीके से सामाजिक क्रान्ति का पथ प्रशस्त कर सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करना है।”

संविधान की प्रस्तावना में निहित लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना तभी सम्भव है जब राज्य जनसाधारण के सुख और समृद्धि की अभिवृद्धि करे, इन्हीं को दृष्टिगत रखकर नीति निर्देशक सिद्धान्तों में सामाजिक और आर्थिक लक्ष्य निहित किया गया। राज्य का यह अभीष्ठ कर्तव्य है कि वह लोक कल्याणकारी राज्य के आदर्श हेतु इन सिद्धान्तों को लागू करे।

अम्बेडकर के शब्दों में – “ये तत्व संविधान के अनोख लक्षण है जिनकी जड़े शताब्दियों के इतिहास में हैं… वे भारत के भविष्य वर्तमान और भूत को एक दूसरे से सम्बन्धित करते हैं और इस महान प्राचीन देश में सामाजिक क्रान्ति की अलख जलाते हैंI”

संविधान में उल्लिखित निदेशक तत्व :

भारत के संविधान में राज्य के नीति निदेशक तत्व एक पृथक भाग में उल्लिखित है –

अनुच्छेद 36 : परिभाषा – इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, “राज्य” का वही अर्थ है जो भाग 3 में है।

अनुच्छेद 37 : इस भाग में अंतर्विष्ट तत्वों का लागू होना – इस भाग में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होगें किंतु फिर भी इनमें अधिकथित तत्व देश के शासन में मूलभूत है और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।

अनुच्छेद 38 : राज्य लोक कल्याण की अभिवृिद्ध के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा

  • राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा।
  • राज्य, विशिष्टतया आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यष्टियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोग और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोगों के समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 39 : राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्व – राज्य अपनी नीति का विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से –

  • पुरूष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो,
  • समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो।
  • आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन – साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण न हो,
  • पुरूषों और स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिए समान वेतन हो,
  • पुरूष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरूपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हो,
  • बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएं दी जाएं और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।

अनुच्छेद 39 क : समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता – राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह विशिष्टतया यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी अन्यनिर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए, उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा या किसी अन्य रीति से निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा।

अनुच्छेद 40 : ग्राम पंचायतों का संगठन – राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिये कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिये आवश्यक हो।

अनुच्छेद 41 : कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार – राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर काम पाने के, शिक्षा पाने के और बेकारी, बुढापा, बीमारी और निःशक्तता तथा अन्य अनर्ह अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।

अनुच्छेद 42 : काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध – राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिये और प्रसूति सहायता के लिये उपबंध करेगा।

अनुच्छेद 43 : कर्मकारों के लिये निर्वाह मजदूरी आदि – राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि के, उद्योग के या अन्य प्रकार के सभी कर्मकारों के काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवनस्तर और अवकाश का संपूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएं तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा और विशिष्टता ग्रामों में कुटीर उद्योगों को वैयक्तिक या सहकारी आधार पर बढ़ाने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 43 क : उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना – राज्य किसी उद्योग में लगे हुए उपक्रमों, स्थापनों या अन्य संगठनों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त विधान द्वारा या किसी अन्य रीति से कदम उठाएगा।

अनुच्छेद 44 : नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता – राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 45 : बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध – राज्य इस संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए उपबंध करने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 46 : अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि – राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षा करेगा।

अनुच्छेद 47 : पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का कर्तव्य – राज्य, अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा और राज्य, विशिष्टतया मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक औषधियों के औषधीय प्रयोजनों से भिन्न उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 48 : कृषि और पशुपालन का संगठन – राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा।

अनुच्छेद 48 क : पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा – राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 49 : राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण – संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन राष्ट्रीय महत्व वाले घोषित किए गए कलात्मक या ऐतिहासिक अभिरूचि वाले प्रत्येक संस्मारक या स्थान या वस्तु का यथास्थिति, लुंठन, विरूपण, विनाश, अपसारण, व्ययन या निर्यात से संरक्षण करना राज्य की बाध्यता होगी।

अनुच्छेद 50 : कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण – राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिए राज्य कदम उठाएगा।

अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि – राज्य –

  • अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का,
  • राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का,
  • संगठित लोगों के एक दूसरे से व्यवहारों में अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और
  • अंतरराष्ट्रीय विवादों के माध्यस्थम् द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा।

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