# विकासशील देशों की प्रमुख समस्याएं एवं निवारण के उपाय | Vikas-shil Deshon Ki Pramukh Samasya Aur Upay

विकासशील देशों की प्रमुख समस्याएं :

विकास का लक्ष्य रखकर अनेक देश अनेक प्रकार के प्रयास कर रहे हैं और इसलिए उन्हें विकासशील देश कहते हैं जिनमें से भारत एक है। विकासशील देशों के अन्तर्गत तृतीय विश्व के देश आते हैं। तृतीय विश्व के देशों की अलग-अलग राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, औद्योगिक एवं कृषि सम्बन्धी समस्याएँ हैं। विभिन्नताओं के बावजूद अधिकांश परिस्थितियों में एक बड़ी मात्रा तक इनकी समस्याओं में एकता एवं समानता पाई जाती है। सारतः तृतीय विश्व के देशों की मुख्य समस्याएँ अग्रानुसार हैं-

(1) राजनीतिक समस्याएँ

विकासशील देशों की राजनीतिक स्थिति अत्यन्त कमजोर होती है। इन देशों में अशिक्षा एवं निर्धनता के कारण राजनीतिक जागरूकता नहीं होती। अधिकांश देश परतन्त्रता के कारण शोषित होते रहते हैं। इन देशों की विदेश नीति का मुख्य आधार गुठ-निरपेक्षता है। जातीय भेदभाव, उपनिवेशवाद एवं रंगभेद की सभी समवेत स्वर में निन्दा करते हैं। सभी देश अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में समान हितों की रक्षा के लिए परामर्श करते हैं।

(2) आर्थिक समस्याएँ

विकासशील देशों में अशोषित या अर्द्धशोषित प्राकृतिक साधन विद्यमान रहते हैं। विकासशील देशों में पूँजी की कमी, आय की न्यूनता, बड़े पैमाने पर उद्योगों का अभाव, कृषि पर निर्भरता, धन एवं आय के वितरण की असमानता, बेरोजगारी एवं वित्तीय संस्थाओं को अभाव जैसी समस्याएँ मौजूद होती हैं। इन समस्याओं के चलते विकास की गति अत्यन्त धीमी होती है। इससे अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जैसे- कुपोषण की समस्या। प्रति व्यक्ति आय कम होने से वे पौष्टिक भोजन की सामग्री नहीं खरीद पाते, भारत में 48% जनता कुपोषण की शिकार है।

विकासशील देशों की प्रमुख समस्याएं एवं निवारण के उपाय | Vikas-shil Deshon Ki Pramukh Samasya Aur Upay

(3) जनसंख्या सम्बन्धी समस्याएँ

विकासशील देशों को जनसंख्या से उत्पन्न समस्याओं से जूझना पड़ता है। इन देशों में जनसंख्या वृद्धि एवं जनसंख्या का घनत्व अधिक है। जन्म एवं मृत्यु दर अत्यधिक हैं इन देशों में कार्यशील जनसंख्या की जगह आश्रित जनसंख्या अधिक है, यही कारण है कि लोगों का जीवन स्तर निम्न है। अस्वास्थ्यकर वातावरण ग्रामीण जनसंख्या या कृषि पर आधारित जनसंख्या की अधिकता एवं औसत उम्र अत्यन्त कम होती है। जनसंख्या अधिक होने से बेकारी एवं निर्धनता से ये देश संत्रस्त होते हैं।

(4) सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याएँ

विकासशील देशों में अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक कुरीतियाँ पायी जाती हैं। स्त्रियों का दर्जा पुरुष से नीचे होता है। पुरुष एवं स्त्रियाँ अशिक्षित होते हैं। सम्पूर्ण समाज उच्च, मध्य एवं निम्न वर्गों में बँटा होता है। बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, विधवा एवं छुआछूत जैसी अनेक सामाजिक रूढ़ियों के कारण वातावरण विषाक्त होता है।

(5) प्राविधिक समस्याएँ

विकासशील देशों के निवासियों में प्राविधिक ज्ञान का अभाव होता है। अशिक्षा तकनीकी विकास में बाधक होती है एवं तकनीकी विकास के लिए उचित वातावरण भी नहीं होता।

विकासशील देशों की प्रमुख समस्याओं के निवारण के उपाय :

(1) अन्धानुकरण रोकना

विकासशील देशों को विकसित देशों के अन्धानुकरण से बचना चाहिए। हमें अपने देश के अर्द्ध-विकसित साधनों, सम्भावनाओं एवं क्षमताओं को ध्यान में रखकर परियोजनाएं तैयार करनी चाहिए।

(2) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विस्तार

समाजवादी समाज की स्थापना के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की स्थापना को हतोत्साहित किया जाना आवश्यक है। उद्योगों का चयन आर्थिक आधार पर होना चाहिए एवं महत्वपूर्ण पदों की नियुक्तियों में पक्षपात नहीं होना चाहिए। अकुशल प्रबन्धन एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति का प्रयास भी आवश्यक है।

(3) निश्चित कार्यक्रम

सरकार के पास एक निश्चित कार्यक्रम होना चाहिये। वितरण सहित सार्वजनिक क्षेत्र में विनियोग की प्राथमिकताओं को निश्चित कर देना चाहिये। सार्वजनिक क्षेत्र में साधनों का वितरण बुद्धिमत्तापूर्वक एवं उचित तरीके से होना चाहिए।

(4) आत्म-निर्भरता

प्रत्येक देश में आत्म-निर्भरता की प्रवृत्ति को ठीक माना जाता है, किन्तु आत्म-निर्भरता न सम्भव है, न लाभप्रद। विकासशील देशों को आत्म-निर्भरता अन्तर्राष्ट्रीयकरण के मध्य का मार्ग अपनाना चाहिए।

(5) निजी क्षेत्र की उपेक्षा

विकासशील देशों में निजी क्षेत्रों की उपेक्षा की जाती है। दोषपूर्ण सरकारी नीतियों के कारण निजी क्षेत्र का आर्थिक विकास नहीं हो पाता। अत्यधिक संरक्षण एवं दोषपूर्ण लाइसेंस नीति से निजी क्षेत्र में अनार्थिक इकाइयों का विस्तार होता है। निजी क्षेत्र के लिए प्रशुल्क एवं लाइसेन्स नीति विकास के अनुकूल होनी चाहिए।

(6) अनार्थिक इकाइयाँ

विकासशील देशों में प्रायः अनार्थिक इकाइयों की स्थापना की जाती है जो देश के आर्थिक ढाँचे के अनुकूल नहीं होती। देश में ऐसे उद्योग स्थापित किये जाने चाहिए, जिससे देश के लिए साधन जुटाए जा सकें।

(7) तकनीक चयन

देश की परिस्थितियों के अनुसार उद्योगों एवं अन्य क्षेत्रों में उत्कृष्ट कोटि की तकनीक का प्रयोग होना चाहिए, जिससे कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके।

(8) जनसंख्या वृद्धि को रोकना

विकासशील देशों में अत्यधिक जनसंख्या ऊँची जन्म-दर एवं मृत्यु दर के कारण है। अतः स्वास्थ्य सुविधाओं एवं नियोजन के साधनों को बढ़ावा देकर जनसंख्या वृद्धि को रोकने का प्रयास करना चाहिए।

(9) सामाजिक रूढ़ियों में बदलाव

विकासशील देशों में अनेक सामाजिक रूढ़ियाँ होती हैं। जन-चेतना के माध्यम तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार से उन सामाजिक रूढ़ियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

(10) बेरोजगारी एवं निर्धनता

सरकार को रोजगार के अधिकाधिक अवसर उपलब्ध कराकर समाज में व्याप्त निर्धनता को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। उच्च, मध्य एवं निम्न वर्ग में बंटे समाज में आय के वितरण की असमानता को दूर करना चाहिए।

(11) जन-सहयोग

जनता को विश्वास दिलाना चाहिए कि उनके प्रयत्नों का प्रतिफल उन्हें ही प्राप्त होगा। जनता की अभिरुचि एवं परामर्श भी समय-समय पर लेना आवश्यक है। जनसहयोग प्राप्त करने के लिए योजना का निर्माण नीचे से नियोजन के सिद्धान्त पर किया जाना चाहिए।

(12) प्रशासन का शुद्धिकरण

योजनाओं का संचालन एवं क्रियान्वयन प्रशासन के हाथों होता है, अतः योजनाओं के लाभों को जनसाधारण तक पहुँचाने के लिए भ्रष्ट प्रशासन को मिटाना आवश्यक है।

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