# समाजीकरण के साधन या अभिकरण | Main Agencies of Socialization

समाजीकरण के प्रमुख साधन या अभिकरण

जन्म से न तो कोई व्यक्ति सामाजिक होता है न ही असामाजिक (Neither social nor antisocial) बल्कि वह एक जैविकीय प्राणी होता है। इस जैविकीय प्राणी में कुछ ऐसी विशेषताएँ, गुण तथा क्षमताएँ होती हैं जिनके सहयोग के फलस्वरूप वह एक सामाजिक प्राणी बनता है। समाजीकरण की प्रक्रिया में विभिन्न संस्थाएँ और समूह अपनी प्रमुख भूमिका निभाते हैं जिनके माध्यम से व्यक्ति एक जैविकीय प्राणी से सामाजिक प्राणी बनता है। व्यक्ति इन विभिन्न साधनों से अनुकूलन करके अनेक सामाजिक गुणों को प्राप्त करता है तथा समाजीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिलता है।

समाजीकरण के इन विभिन्न साधनों या संस्थाओं और समूहों में कुछ प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं

(1) परिवार (Family) – परिवार समाजीकरण का मूल साधन या अभिकरण होता है, क्योंकि परिवार में ही व्यक्ति का जन्म होता है और सर्वप्रथम वह परिवार का ही सदस्य होता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व में परिवार का प्रभाव प्राथमिक होने के साथ स्थायी और आन्तरिक होता है जिसकी छाप अमिट होती है। परिवार में समाजीकरण की प्रक्रिया बच्चे के जन्म लेने के कुछ क्षणों से प्रारम्भ होकर निरन्तर क्रियाशील रहता है। जन्म लेने के पश्चात बच्चे का सबसे घनिष्ठ सम्बन्ध ममतामयी माँ से होता है, क्योंकि माँ उसे दूध पिलाती है तथा प्यार देती है और हर प्रकार से उसकी रक्षा करती है। इस कार्य में पिता का भी योगदान होता है। इसके पश्चात बच्चे का सम्बन्ध परिवार के समस्त सदस्यों से होता है तथा परिवार के सदस्यों के बीच पाया जाने वाला सहयोग, स्नेह, प्यार आदि बच्चे को मानसिक शान्ति प्रदान करता है तथा वह भी अनुकरण की प्रवृत्ति के कारण इन गुणों को सीखता है और ये विशेषताएँ उसके व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती हैं।

बच्चा परिवार में ही पारिवारिक सदस्यों के मध्य बोलना, खाना, पीना, व्यवहार करना, पहनना तथा पारिवारिक परम्पराओं का अनुकरण करना आदि सीखता है। इस प्रकार यह अक्षरशः सत्य है कि ममतामयी माँ के त्याग और पिता के संरक्षण में बच्चा जो भी सीखता है, वह उसके जीवन की स्थायी निधि होती है। अतः स्पष्ट है कि परिवार समाजीकरण का एक प्रमुख तथा महत्वपूर्ण साधन है। श्री टरमन महोदय का यह निष्कर्ष है कि “मात्र वहीं बच्चे विवाह को आनन्दमय बना सकते हैं जिनके माता-पिता का पारिवारिक जीवन आनन्दमय था।”

(2) क्रीड़ा समूह (Play Groups) – परिवार के पश्चात बच्चे का सम्पर्क अपने खेल के विभिन्न साथियों से होता है जो भिन्न-भिन्न परिवार के बच्चे होते हैं जिनकी अभिरुचियाँ, आदतें, रहन-सहन के ढंग, बातचीत करने के तौर-तरीके तथा आदर्श और स्वभावों में भिन्नता पाई जाती है। इन विभिन्नताओं के होने के बावजूद भी बच्चे को उनके साथ अनुकूलन करना पड़ता है। फलतः बच्चे की समस्त आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पाती, जिसके फलस्वरूप इच्छाओं का दमन करना सीखते हैं। क्रीड़ा समूह में मुख्यतः बच्चे नेतृत्व, अनुसरण तथा अनुकूलन करना सीखते हैं जो उनके व्यक्तित्व के विकास में प्रमुख योगदान देते हैं।

(3) पड़ोसी समूह (Neighbouring Group) – व्यक्ति के समाजीकरण में पड़ोसी समूह का भी योगदान रहता है। पड़ोस के व्यक्ति साधारणतः सभी बच्चे से स्नेह रखते हैं और बच्चे उनके सम्पर्क में रहते हैं। अतः किस प्रकार का व्यवहार पड़ोस के व्यक्ति करते हैं बच्चे व्यवहार करना भी सीखते हैं तथा इन व्यवहारों पर हास्य, प्रशंसा, निन्दा आदि के द्वारा पड़ोसी नियन्त्रण भी रखता है। यदि कोई बच्चा अनुचित व्यवहार या गलत कार्य करता है तो पड़ोस के लोग उसकी निन्दा करने लगते हैं, व्यंग्य करते हैं, जिसके फलस्वरूप बच्चा गलत कार्यों को करने का साहस नहीं करता। पड़ोस के प्रभाववश ही गन्दी बस्ती के लोग गन्दे होते हैं तथा आज प्रत्येक व्यक्ति अच्छे पड़ोस की तलाश में रहता है ताकि बच्चों के व्यक्तित्व का उचित विकास हो सके।

(4) शिक्षण संस्थाएँ (Educational Institutions) – समाजीकरण की प्रक्रिया में शिक्षण संस्थाएँ अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। शैक्षणिक संस्थाओं में व्यक्ति का बौद्धिक विकास होता है तथा ज्ञान के द्वारा अज्ञानता दूर होती है। विभिन्न प्रकार के पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ शिक्षकों द्वारा उसे प्रगति के मार्ग पर चलने का व्यावहारिक ज्ञान भी शैक्षणिक संस्थाओं में प्राप्त होता है। बच्चों की आदतों का निर्माण भी यहीं होता है जो जीवन-पर्यन्त बनी रहती हैं। स्कूल और कॉलेज में बच्चों को भिन्न-भिन्न आयु लिंग के छात्र समूहों के साथ अनुकूलन तथा सामंजस्य करना पड़ता है। अतः अभियोजनशीलता की शक्ति का विकास होता है। शिक्षण संस्थाओं में ही व्यक्ति समाज और व्यक्ति के साथ व्यवहार करना, समाज और संस्कृति के अनुकूल कार्य करना, बड़ों का आदर, सम्मान करना तथा उचित-अनुचित और वास्तविक तथा सैद्धान्तिक तथ्यों के सम्बन्ध में विशेष ज्ञान प्राप्त करना है,जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को पूर्णतः प्रभावित करते हैं। शिक्षण संस्थाओं में विचारों और भावनाओं का आदान-प्रदान होता है, फलस्वरुप बच्चों में सामाजिक गुणों का विकास होता है। अतः शैक्षणिक संस्थाएँ समाजीकरण की प्रमुख साधन होती हैं।

(5) विवाह (Marriage) – विवाह एक ऐसी सामाजिक संस्था है जो दो पृथक-पृथक व्यक्तित्व के व्यक्तियों को आपस में इस प्रकार मिलाती है कि दोनों एकरूपता में समा जाते हैं। विवाह के पूर्व पति-पत्नी के विचार, रहन-सहन, मान्यता और मनोवृत्ति एक-दूसरे से बिल्कुल पृथक होते हैं, किन्तु विवाह के पश्चात दोनों आपस में इस प्रकार समायोजन और सामंजस्य करते हैं कि उनकी मनोवृत्तियों में एकरूपता आ जाती है। इस प्रकार विवाह के द्वारा व्यक्ति में उत्तरदायित्व की भावना, त्याग और कर्त्तव्यनिष्ठा उत्पन्न होती है, जो समाजीकरण में सहयोग देती है।

(6) आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक संस्थाएँ (Economic, Religious, Political and Cultural Institutions) – व्यक्ति के व्यक्तित्व को अनेक संस्थाएँ प्रभावित करती हैं जिनमें आर्थिक संस्थाएँ भी मानव-जीवन को अत्यधिक प्रभावित करती हैं, क्योंकि मानव की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति इन्हीं संस्थाओं के द्वारा होती है। ये व्यक्ति को विभिन्न व्यावसायिक संघों, व्यापारिक केन्द्रों तथा आर्थिक समूहों से सम्बन्धित करती हैं, जिनके माध्यम से व्यक्ति प्रतिस्पर्धा, व्यवस्था, सहकारिता और समायोजन आदि के सिद्धान्तों को सीखता है तथा समाज में सरलता से अनुकूलन करके अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इनका प्रभाव व्यक्ति के आचार-विचार और व्यवहार पर भी पड़ता है। अतः आर्थिक संस्थाओं का समाजीकरण की प्रक्रिया में विशेष महत्व होता है।

धार्मिक संस्थाएँ व्यक्ति के व्यवहारों को पूर्ण नियन्त्रित करती हैं, क्योंकि मानव-जीवन धर्म से ओत-प्रोत है। पवित्रता, शक्ति, सच्चरित्रता तथा नैतिकता आदि गुणों का विकास व्यक्तियों में इन्हीं धार्मिक संस्थाओं के द्वारा होता है। धर्म व्यक्ति को उचित कार्यों को करने का निर्देश देता है तथा अनुचित कार्यों पर पूर्ण अंकुश रखता है। अतः धर्म के भय से व्यक्ति सदैव उचित व्यवहार करता है। मानव धर्म से इतना भयभीत होता है जितना कि कानून से भी भय नहीं रखता। अतः व्यक्ति धर्म और धार्मिक संस्थाओं के निर्देशों और आदेशों का अक्षरशः पालन करता है फलस्वरूप उनके व्यक्तित्व का उचित विकास होता है। भारतीय समाज में धर्म जितना समाजीकरण की प्रक्रिया में सहयोग प्रदान करता है उतना विश्व के किसी भी समाज में धर्म का योगदान नहीं होता। इस सम्बन्ध में मैलिनोवस्की का कथन है कि “विश्व में मनुष्यों का कोई भी समूह धर्म के बिना नहीं रह सकता, चाहे वह कितना भी जंगली क्यों न हो।” इस प्रकार स्पष्ट है कि धार्मिक संस्थाओं का समाजीकरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान रहता है।

समाजीकरण की प्रक्रिया में सांस्कृतिक संस्थाओं के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि सांस्कृतिक संस्थाएँ ही सामाजिक जीवन प्रतिमान का निर्धारण करती हैं। तथा समाजीकरण के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करती हैं। प्रथाएँ, परम्पराएँ, खान-पान, वेश-भूषा, भाषा, धर्म, कला, आदर्श, विचार आदि संस्कृति के प्रमुख अंग हैं जिनके साथ अनुकूलन करके ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का उचित विकास करता है। अतः सांस्कृतिक संस्थाओं के अभाव में व्यक्ति का उचित समाजीकरण का होना असम्भव होता है। उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर अन्ततः हम कह सकते हैं कि समाजीकरण की प्रक्रिया में आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं आदि का प्रमुख योगदान होता है।

समाजीकरण के समस्त साधनों के साथ-साथ समाजीकरण की प्रक्रिया में अनुकरण का विशेष महत्व होता है, क्योंकि अनुकरण करके ही व्यक्ति सामाजिक गुणों को प्राप्त करता है तथा व्यवहार करना सीखता है। समाजीकरण की प्रक्रिया में अनुकरण के महत्व के आधार पर ही विद्वानों ने इस प्रक्रिया को अनुकरण द्वारा किये जाने वाला अनुकूलन कहा है समाजीकरण के विभिन्न साधनों के साथ-साथ समाजीकरण की प्रक्रिया में जैविकीय कारकों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है।

व्यक्ति के समाजीकरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारक तथा साधन

जननित संचरण – जैविक माध्यम –> 1. वाहकाणु (Genes) 2. पितृसूत्र (Chromosomes) 3. जैविक पुनरोत्पादन (Organic Reproduction).

सामाजिक संचरण – सामाजिक शरीर –> 1. परिवार 2. क्रीड़ा समूह 3. शिक्षण संस्थान 4. विवाह 5. विभिन्न संस्थाएं.

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि समाजीकरण की प्रक्रिया में जैविकीय विशेषताओं का भी महत्व होता है। इस सम्बन्ध में किंग्सले डेविस (Kingsley Davis) का कथन है कि “जैविकीय विशेषताओं में सहयोग से ही व्यक्ति सामाजिक और सांस्कृतिक गुणों से अनुकूलन करने की क्षमता प्राप्त करता है।”

इन विभिन्न जैविकीय कारणों के अतिरिक्त कुछ अन्य महत्वपूर्ण कारक भी समाजीकरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं; जैसे—पालन-पोषण (Rearing), सामाजिक प्रशिक्षण (Social Training), सहानुभूति (Sympathy), अनुकरण (Imitation) आदि कारक समाजीकरण की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

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