# संस्कति से तात्पर्य, विशेषताएं, तत्व | Meaning, Characteristics, Elements of Culture

संस्कति से तात्पर्य :

संस्कृति शब्द एक लोकप्रिय एवं प्रचलित अवधारणा है जिसका साधारण अर्थ जितना सरल है उतना तकनीकी दृष्टिकोण से नहीं है। साधारण रूप में संस्कति शब्द से अभिप्राय संस्कार व सुलझे हुए व्यवहार से किया जाता है। इसके शब्दिक अर्थ पर अगर ध्यान डालें तो पता चलता है कि यह शब्द लैटिन के कोलियर (Colere) शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ खेती से है। मध्यकालीन युग में इसका अर्थ खेती के कार्य में जो परिवर्तन या बदलाव आया है उससे मिला गया और इस प्रकार यह शब्द खेती करने की कला से जुड़ गया। 18वीं तथा 19वीं सदी में इसका अर्थ लोगों के तौर-तरीके में बदलाव तथा सुधार से किया जाने लगा और मनुष्य के उच्च कोटी के व्यवहार को संस्कति (culture) की संज्ञा दी गयी जर्मन शब्द Kulture का अभिप्राय भी जीवन में सभ्य तरीके से काम करने की पद्धति से जुड़ा है।

परंतु समाजशास्त्रियों ने संस्कति की परिभाषा अलग से दी है। 1871 में ही एडवर्ड वी टाइलर ने इस शब्द की व्याख्या करते हुए कहा, संस्कृति वह जटिल संपूर्णता है जिसमें ज्ञान, विश्वास, रचनाएं, नैतिकता, विधि प्रथाएं और वे सभी योग्यताएं एक क्षमताएं सम्मिलित की जाती है जिन्हें समाज के एक सदस्य के रूप में मान अर्जित करता है। इसी संदर्भ में राल्फ लिंटन का कहना था “किसी समाज की संस्कति उस समाज के सदस्यों का जीवन है, उनके विचारों और आदतों का सम्मिलित स्वरूप है जिसे वह समाज में सीखता है, बांटता है और एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को हस्तांतरित करता है।” क्लाइड कलकहान ने संस्कति को मनुष्य के पूरे जीवन काल से जोड़कर वर्णन किया है। इस प्रकार संस्कृति का तकनीकि दृष्टिकोण से जो अर्थ निकाला जाता है वह प्रतिमानों के संदर्भ से जुड़ा है। संस्कृति मनुष्य के संस्थात्मक व्यवहार का प्रतीक है जिसमें व्यक्ति के व्यवहार जो वह समाज में रहकर निष्पादित करना है उसकी झलक मिलती है।

संस्कृति की विशेषताएं :

समाजशास्त्रियों की तरह ही सामाजिक मानवशास्त्र में भी संस्कति शब्द के विशेष अर्थ की व्याख्या विस्तार से की गयी है। ब्रिटिश तथा अमेरिकन मानवशास्त्रियों ने विशेषकर इस शब्द का विस्तार से वर्णन किया है। अमेरिकन मानव शास्त्रियों ने विशेषकर इस शब्द का विस्तार और उसके किये गये कार्यों से जोड़कर देखा है। मैलिनोस्की ने संस्कृति को मनुष्य द्वारा निर्मित संपदा बताया है और इसे मनुष्य के लक्षित उद्देश्य को प्राप्त करने का एक साधन बताया है। इस प्रकार हर्सकोबिट द्वारा दिये गये संस्कृति तथा अन्य विद्वानों ने परिभाषाओं को ध्यान में रखा जाये तो संस्कति ने निम्न तत्वों का उल्लेख किया जा सकता है :

1. संस्कृति को सीखा जाता है।

2. संस्कृति का अर्थ, जैविकीय, वातावरण, मनोवैज्ञानिक तथा ऐतिहासिक तथ्यों से जोड़कर देखा जाता है।

3. संस्कृति का निर्माण संगठित विचार, मनोदशा तथा व्यवहार से होता है।

4. संस्कृति के विभिन्न पहलू होते हैं।

5. संस्कति गतिशील होता है।

6. संस्कति परिवर्तनशील होता है।

7. संस्कति सतत् होता है जिसके निरंतरता को विज्ञान के विधि द्वारा विश्लेषित किया जा सकता है।

8. संस्कृति एक जटिल साधन है जिसके द्वारा व्यक्ति एक परिस्थिति से दूसरे परिस्थिति के अनुरूप अपने आपको ढाल लेता है।

9. संस्कति को समाज से अलग रखकर नहीं देखा जाता है।

10. प्रत्येक संस्कृति की एक सांस्कृतिक धरोहर होती है जिसे हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंप देते हैं और सभी पीढ़ी में इसके कुछ तत्व जुड़ते हैं तो वहीं कुछ तत्व छूट भी जाते हैं।

11. संस्कति के तत्व एक समाज से दूसरे समाज के लिए मिल ही जाते हैं बल्कि एक ऐतिहासिक अवस्था के दूसरे ऐतिहासिक अवस्था में ही इसमें परिवर्तन देखा जा सकता है।

संस्कृति के तत्व :

अंतः संबंध की प्रक्रिया में संस्कृति के कई तत्व परिलक्षित होते हैं। संस्कृति के अंतर्गत सभी भौतिक तथा अभौतिक तत्वों का समावेश होता है। भौतिक तत्वों का मूर्त रूप होता है जिसे देखा, परखा व आंका जा सकता है। इसके विपरित अभौतिक चीजों में वो तत्व आते हैं जो अमूर्त होते है विचार, आदतें, प्रतिमान, विश्वास आदि ये सभी मनुष्य के ऐसे स्वरूप है जिसे देखा नहीं जा सकता है। रार्बट ब्रिस्टेड ने तीन तत्वों को संस्कृति का मुख्य तत्व माना है जो निम्न हैं :

(क) जनात्मक

समाज में रहने वाले व्यक्ति का सबसे पहला संपर्क उसे अपने भौतिक तथा सामाजिक वातावरण से होता है। जिससे वह प्रभावित होकर उसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करना चाहता है। यहाँ तक ही आदिवासी लोगों को जो दूर दराज जंगलों व गुफाओं में रहते थे उन्हें भी अपने सामाजिक परिवेश तथा वातावरण की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक हुआ करता था। अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए उन्हें यह जानना आवश्यक था कि भोजन के तलाश में उन्हें कहाँ जाना है, प्रकृति के प्रकोप से कैसे बचना चाहिए और भयानक जानवर, आँधी, तूफान, बाढ़ तथा दूसरे घातक चीजों से बचने का तरीका क्या है।

(ख) प्रतिमान से संबंधित पहलू

प्रतिमान को संस्कति का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है। प्रतिमान के अंतर्गत नियम, आकांक्षाओं तथा कार्यशैली स्थापित तरीके सभी इसके साथ जुड़े होते हैं। इन सभी परिस्थितियों में जिसमें लोगों की भागीदारी होती है ये सभी प्रतिमानों से जुड़े होते हैं। इन्ही प्रतिमानों के कारण मनुष्य के संबंधों में एक क्रमबद्धता तथा स्थायीत्व पाया जाता है। इसके फलस्वरूप मनुष्य के व्यवहार के बारे में कुछ हद तक निश्चित रूप से अनुमान लगाया जा सकता है। प्रतिमानों से जुड़े रीतिरिवाज, रूढ़ियां तथा परंपराएं आदि जुड़ी होती है जो व्यक्ति के व्यवहार को संचालित करते हैं।।

समाज के कौन-से प्रतिमान व मूल्य ज्यादा महत्व रखते हैं उसे समाज के प्रतिमानों से ही जाना जा सकता है अर्थात संस्कृति में एक प्रतिमानों के संरचनात्मक पहलू भी विद्यमान होते हैं जिसका आकलन किया जा सकता है। विलियम ने निम्न आधार पर प्रतिमानों में कौन-से प्रतिमान ज्यादा महत्वपूर्ण है इसका उल्लेख किया है।

1. मूल्यों की व्यापकताः कई प्रतिमान व मूल्य ऐसे होते हैं जो उस सामाजिक व्यवस्था के संपूर्ण जीवन को प्रभावित करतें है तो हम उसे ज्यादा महत्वपूर्ण मान सकते हैं।

2. स्थायीत्व: अगर कोई प्रतिमान व मूल्य ऐसा हो जो लम्बे अरसे तक उस समाज का हिस्सा रहे हों तो ऐसे मूल्य को भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

3. तीव्रता व कुछ प्रतिमान ऐसे होते हैं जिसकी तीव्रता को सभी लोग स्वीकार करते हैं तो उसे भी हम महत्वपूर्ण मान सकते हैं।

4. प्रतिमानों की प्रतिष्ठा व कुछ प्रतिमान व मूल्य ऐसे होते हैं जो उस समाज के प्रतिष्ठा व सम्मान का प्रतीक होते हैं और अगर उसकी अवमानना होती है तो पूरा समाज उससे विचलित हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में प्रतिष्ठा से जुड़े प्रतिमान व मूल्य को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

5. भौतिक: संस्कृति के कुछ भौतिक तत्व भी होते हैं जिनमें कार, टी०वी०, फ्रिज, औजार, हथियार कंप्युटर, टेलिफोन आदि। ये सभी भौतिक चीजें विज्ञान तथा तकनीकी में परिवर्तन के कारण आये हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समाज में संस्कति को एक खास स्थान प्राप्त है जिसे सभी लोग स्वीकार करते हैं। समाजशास्त्र में संस्कृति का अध्ययन समाज के प्रतिमानों के दायरे के अंतर्गत किया जाता है और इसकी चर्चा एक विशेष अवधारणा के रूप में कई अन्य अवधारणाओं के साथ जोड़कर भी की जाती है। इस प्रकार इसका व्यापक प्रयोग सामाजिक व्यवस्था को समझने के लिए किया गया है।

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