# आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष (कर्नाटक का युद्ध) : अंग्रेजों की सफलता तथा फ्रांसीसियों की असफलता के प्रमुख कारण | Karnataka Yudh

दक्षिण भारत में आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष –

भारत में यूरोपीय जातियाँ मुख्यतः व्यापारिक उद्देश्यों से आई थी, परन्तु तत्कालीन राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों के कारण उनमें संघर्ष आरम्भ हो गये। उनकी दृष्टि में व्यापारिक हितों की तुलना में राजनीतिक उद्देश्य महत्वपूर्ण हो गये संघर्ष के कारण 18वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य भीषण संघर्ष आरम्भ हो गये। इस संघर्ष के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष के प्रमुख कारण :

1. मुगल साम्राज्य के पतन के पश्चात्, भारत में ऐसी कोई शक्ति नहीं बची जो अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के बढ़ते कदमों को रोक सके। इन परिस्थितियों में अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों ने एक-दूसरे से संघर्ष कर अपना प्रभुत्व बढ़ाने के प्रयत्न किये।

2. सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक अंग्रेज पुर्तगालियों और डचों की शक्ति को क्षीण कर अपनी प्रभुता की स्थापना करने में सफल हुए। इसके पश्चात् ही फ्रांस ने व्यापारिक एवं औपनिवेशिक क्षेत्र में पदार्पण किया। इन परिस्थितियों में आंग्ल-फ्रांसीसी संघर्ष अनिवार्य हो गया।

3. अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के मध्य व्यापार एकाधिकार को लेकर संघर्ष था। बंगाल तथा मद्रास दोनों स्थानों पर अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों की कोठियाँ पास-पास थी, दोनों ही शक्तियाँ अपना व्यापार बढ़ाना चाहती थी, इस प्रयास में संघर्ष अनिवार्य था।

4. अंग्रेज तथा फ्रांसीसी दोनों ही भारत में एक स्थान पर औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना करना चाहते थे। ऐसी स्थिति में एक शक्ति की विजय तथा दूसरे का विनाश अनिवार्य था।

5. अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों दोनों ने अपने व्यापारिक एवं राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए भारतीय नवाबों और राजाओं के आन्तरिक झगड़ों में हस्तक्षेप की नीति अपनायी। अनेक बार एक राज्य के आन्तरिक संघर्ष में अंग्रेज एक पक्ष में होते थे तो फ्रांसीसी दूसरे पक्ष में थे। ऐसी स्थिति में दोनों शक्तियाँ एक-दूसरे के सामने आ खड़ी होती थीं।

6. अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के मध्य यूरोप में चल रहे संघर्ष का प्रभाव भारत पर भी पड़ता था। यूरोप में युद्धरत होने की स्थिति में भारत में भी दोनों में संघर्ष आरम्भ हो जाता था। वाल्टेयर ने ठीक ही कहा था, “पहली तोप जो हमारी भूमि में दागी गई, उसने अमेरिका तथा एशिया के सभी तोपखानों में आग लगा दी। 1740 ई. में यूरोप में आस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध आरम्भ हुआ। इस युद्ध में फ्रांस ने प्रशा का साथ दिया और इंग्लैण्ड ने आस्ट्रिया का। इस युद्ध का प्रभाव भारत में चल रही उनकी प्रतिद्वन्द्विता पर भी पड़ा।

दक्षिण में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य तीन युद्ध हुए, ये युद्ध कर्नाटक की भूमि पर लड़े गये अतः इन युद्धों को कर्नाटक युद्ध के नाम से जाना जाता है।

भारत में अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के मध्य युद्ध :

जिस समय इन यूरोपीय देशों ने भारत में अपनी व्यापारिक कम्पनियाँ खोली तब उनका मुख्य उद्देश्य व्यापार करना था और मुगल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् केन्द्रीय शासन निर्बल हो गया। अतः चारों ओर अव्यवस्था फैल गयी। इससे इन व्यापारियों को अपने जान-माल की सुरक्षा का कार्य स्वयं करना पड़ा। इसी का बहाना लेकर उन्होंने अपनी-अपनी अलग सेनाएँ रखनी आरम्भ कर दी। साथ ही इन्होंने अपनी कोठियाँ तथा किले आदि भी बनवा लिये। इधर देशी राजा तथा नवाब सत्ता ग्रहण करने के लिए आपस में ही संघर्ष करने लगे। इसके लिए इन लोगों ने इन शक्तियों से सहायता माँगी। इस प्रकार हस्तक्षेप करके इन्होंने धन तथा भूमि लेना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार यहीं से साम्राज्य की नींव डाली गयी। अब से इन लोगों ने जबरदस्ती हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया ताकि वे अपने साम्राज्य को अधिक विस्तृत कर सकें अंग्रेज और फ्रांसीसी दोनों ही अपने साम्राज्य का विस्तार चाहते थे। अतः देशी नरेशों का पक्ष लेकर ये दोनों आपस में ही लड़ने लगे।

कर्नाटक का प्रथम युद्ध (1740 ई. से 1748 ई.)

सन् 1740 ई. में इंग्लैण्ड तथा फ्रांस के बीच यूरोप में आस्ट्रिया के उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर संघर्ष प्रारम्भ हो गया परिणामस्वरूप संसार में कहीं भी इन दोनों जातियों के लोग थे, वहीं दोनों के बीच युद्ध छिड़ गया। भारत इसका अपवाद नहीं था। अब तक दोनों में व्यापारिक स्पर्द्धा तो चल ही रही थी, अब दोनों में अन्तर्राष्ट्रीय आधार पर युद्ध भी आरम्भ हो गया। फ्रांस की सरकार के आदेशानुसार भारत स्थित सेनापति लॉ बूदोर्ने (Law Bourdonnais) ने अंग्रेजों के भारतीय व्यापारिक केन्द्रों तथा उपनिवेशों पर आक्रमण किया।

1746 ई. में उसने अंग्रेज सेनापति पेटन (Peyton) को पराजित करके पाण्डिचेरी तथा इसके पश्चात् मद्रास को जीतकर उस पर अधिकार जमा लिया, परन्तु इसी समय लॉ बूदोर्ने तथा डूप्ले में मतभेद हो गया। लॉ बूर्दोने चाहता था कि अंग्रेजों से 40 हजार पौण्ड लेकर मद्रास वापस कर दिया जाये, जबकि डूप्ले इसके विरुद्ध था। इसके पश्चात् फ्रांसीसियों ने सेण्ट डेविड के दुर्ग पर आक्रमण कर दिया, परन्तु अंग्रेज अफसर लारेन्स (Lawrence) की रण-कुशलता एवं योग्यता के कारण वह विफल हो गया। अब अंग्रेजों ने जवाबी आक्रमण करना आरम्भ किया। उन्होंने पाण्डिचेरी पर आक्रमण किया, परन्तु उसमें उन्हें विशेष सफलता नहीं मिल सकी। अभी दोनों देशों के मध्य युद्ध चल ही रहा था कि यूरोप में 1758 ई. में दोनों के मध्य एक्श ला शपल (Aix la Chapple) की सन्धि हो गयी।

इसके साथ ही संसार में जहाँ कहीं भी इन दोनों के बीच युद्ध चल रहा था, समाप्त हो गया। मद्रास अंग्रेजों को वापस कर दिया गया। इस युद्ध का परिणाम यह हुआ कि फ्रांसीसियों का प्रभाव बढ़ गया और डूप्ले को प्रोत्साहन मिला। वह अधिक-से-अधिक भारतीय राजनीति में भाग लेने लगा। अब दोनों शक्तियों को यह स्पष्ट रूप से ज्ञात हो गया कि भारतीय नरेशों की दुर्बलता से लाभ उठाया जा सकता है।

कर्नाटक का द्वितीय युद्ध (1748 ई. से 1756 ई.)

फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले एक कुशल एवं योग्य राजनीतिक था। उसने भली प्रकार यह समझ लिया था कि देशी नरेशों के आपसी संघर्षों में भाग लेकर भारत में फ्रांसीसी सत्ता की स्थापना सरलतापूर्वक की जा सकती है। वास्तव में उसने अब व्यापार की ओर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना कि राज्य विस्तार की ओर। पिछले युद्ध के पश्चात् दोनों देशों ने अपनी-अपनी सेनाओं का विस्तार करना तथा देशी नरेशों से मित्रता स्थापित करने का प्रयत्न करना आरम्भ कर दिया। इसी समय तंजौर के राज्याधिकार का झगड़ा छिड़ गया। अंग्रेजों ने सर्वप्रथम इसमें सक्रिय रूप से भाग लेकर डूप्ले का पथ-प्रदर्शन किया। वहाँ के राजा के भाई ने राजा को देश से बाहर निष्कासित कर दिया और स्वयं राजसिंहासन पर बैठ गया। राजा ने खोये हुए राज्य को प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों से सहायता की प्रार्थना की। अपनी प्रभुसत्ता की स्थापना के उद्देश्य से उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया।

अभी यह विचार चल ही रहा था कि हैदराबाद के निजाम आसफशाह की मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र नासिरजंग गद्दी पर बैठा, परन्तु स्वर्गीय निजाम के पौत्र मुजफ्फरजंग ने उसका विरोध करते हुए स्वयं सिंहासन प्राप्त करना चाहा। उधर कर्नाटक के नवाब की भी मृत्यु हो गयी। अब अनुबरुद्दीन तथा चाँदा साहब के बीच सिंहासन प्राप्त करने के लिए संघर्ष आरम्भ हो गया। चाँदा साहब ने मुजफ्फरजंग से सन्धि करके फ्रांसीसियों से सैनिक सहायता की याचना की। डूप्ले के लिए यह स्वर्णिम अवसर था, जिसे उसने तुरन्त स्वीकार कर लिया। इस पर अंग्रेजों ने दूसरे पक्ष की सहायता करने का निश्चय किया। इस प्रकार भारतीय नरेशों के संघर्ष को लेकर दोनों शक्तियों के बीच पुनः युद्ध आरम्भ हो गया। चाँदा साहब, मुजफ्फरजंग तथा डूप्ले की सम्मिलित सेनाओं ने अनबरुद्दीन पर आक्रमण कर 1749 ई. में अम्बर के युद्ध में उसे मार डाला। इस पर उसका बड़ा पुत्र मुहम्मद अली भागकर त्रिचनापल्ली जा पहुंचा। उसने अंग्रेजों से सहायता माँगी तथा उसे सहायता देने का अंग्रेजों ने वचन दिया।

फ्रांसीसियों की सहायता से चाँदा साहब ने कर्नाटक पर अपना अधिकार जमा लिया। इसके बदले में उसने फ्रांसीसियों को 80 गाँव दिये। डूप्ले ने त्रिचनापल्ली पर संगठित रूप से आक्रमण करना चाहा परन्तु उसे इस दिशा में तंजौर के राजा का तीव्र विरोध सहना पड़ा। इसी समय उसे सूचना मिली की नासिरजंग ने अंग्रेजी सेना की सहायता से कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया। इस पर चाँदा साहब तथा उसके सहायकों को विवश होकर तंजौर का घेरा उठाना पड़ा। उधर युद्ध में नासिरजंग मारा गया। इस पर डूप्ले ने मुजफ्फरजंग को दक्षिण का सूबेदार बना दिया। इससे फ्रांसीसियों की प्रतिष्ठा बहुत ही अधिक बढ़ गई। इस प्रसन्नता से उसने डूप्ले को दिरी तथा मछलीपट्टम के नगर तथा भारी धनराशि प्रदान की।

फ्रांसीसियों की इस सफलता से अंग्रेजों को बड़ी चिन्ता हुई। अनबरुद्दीन की मृत्यु हो जाने पर उन्होंने उसके पुत्र मुहम्मद अली का समर्थन करने का निश्चय किया। इधर चाँदा साहब ने त्रिचनापल्ली पर आक्रमण करके उसका घेरा डाल दिया। इसमें अंग्रेज सम्भवतः पराजित हो गये परन्तु उसी समय क्लाइव का उदय हुआ। उसने त्रिचनापल्ली को बचाने के लिए चाँदा साहब की राजधानी अकोट पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इस पर चाँदा साहब को तुरन्त घेरा उठाना पड़ा। उसने अपने पुत्र राजा साहब को क्लाइव का सामना करने के लिए भेजा। यहाँ पर क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेज तथा भारतीय सैनिकों ने अपूर्व साहस दिखाया और अन्त में विजयी भी हुए। यहाँ विजय प्राप्त करके अंग्रेजों ने मुहम्मद अली की रक्षा के लिए त्रिचनापल्ली पर आक्रमण किया। चाँदा साहब ने भागकर तंजौर के सेनापति के यहाँ शरण ली, परन्तु वहाँ उसके साथ विश्वासघात किया गया और उसे मार डाला गया। अब मुहम्मद अली कर्नाटक का नवाब बन गया तथा डूप्ले की सारी योजनाएँ विफल हो गयीं।

1752 ई. के अन्त तक जिन्जी तथा पाण्डिचेरी को छोड़कर अन्य सभी फ्रांसीसी क्षेत्रों पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया था। जब यह सूचना फ्रांस की सरकार को मिली तो उसने डूप्ले को वापस बुला लिया और उसके स्थान पर 1754 ई. में गोडह्यू (Godheu) को गवर्नर बनाकर भेजा। उसने आते ही सन्धि का प्रस्ताव रखा और 1755 ई. में दोनों शक्तियों के बीच पाण्डिचेरी की सन्धि की गयी। इस सन्धि के अनुसार दोनों देशों के बीच भारत में चलने वाला युद्ध समाप्त हो गया। नवाबों द्वारा प्रदत्त अपनी उपाधियाँ त्याग दी गयी तथा भारतीय राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वचन दोनों ने दिया।

कर्नाटक का तीसरा युद्ध (1756 ई. से 1763 ई.)

सन् 1756 ई. में यूरोप में सप्तवर्षीय आरम्भ हो गया। भारत में भी दोनों शक्तियों के बीच युद्ध आरम्भ हो गया। 1757 ई. में प्लासी के युद्ध के पश्चात् क्लाइव ने मीरजाफर को बंगाल का नवाब बनाकर वहाँ अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। साथ ही फ्रांसीसी उपनिवेश चन्द्रनगर पर भी उन्होंने अपना अधिकार जमा लिया। इसी समय फ्रांस की सरकार ने लेली (Laily) नामक एक अत्यन्त वीर सेनापति को भारत में युद्ध संचालन के लिए भेजा, परन्तु लेली अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका क्योंकि वह हठी एवं क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति था। वह अपने सहयोगियों के साथ उचित व्यवहार नहीं कर सका, उसने आते ही सेण्ट डेविड के दुर्ग पर अधिकार कर लिया, परन्तु मद्रास पर वह अपना अधिकार नहीं जमा सका। अपनी सहायता के लिए उसने बूसी को हैदराबाद से बुला लिया, परन्तु यह से उसकी एक बहुत बड़ी भूल थी।

लेली ने मद्रास पर अधिकार करने का पुनः प्रयत्न किया परन्तु फ्रांसीसी कोण्डोर (Condore) के युद्ध में पराजित हुए। 1759 ई. में अंग्रेजों का जहाजी बेड़ा आ गया, अतः निराश होकर फ्रांसीसियों ने मद्रास का घेरा उठा लिया। इधर अंग्रेजों ने मछलीपट्टम पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इसी समय फ्रांसीसी अफसरों में मतभेद उत्पन्न हो गया तथा फ्रांस की सरकार से भी उन्हें किसी प्रकार की सैनिक सहायता नहीं मिल सकी। 1760 ई. में अंग्रेज सेनापति आयरकूट ने फ्रांसीसियों को वांडीवाश के युद्ध-क्षेत्र में बुरी तरह पराजित कर दिया। लेली तथा बूसी दोनों को ही बन्दी बना लिया गया। सन् 1763 ई. में दोनों के बीच यूरोप में पेरिस की सन्धि की गयी। इस सन्धि के अनुसार फ्रांसीसियों को पाण्डिचेरी, माही, कारीकल तथा चन्द्रनगर वापस कर दिया गया परन्तु अब वे कोई दुर्ग आदि नहीं बना सकते थे। बंगाल तथा दक्षिणी भारत पर अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। फ्रांसीसियों की शक्ति समाप्त हो गयी। अतः साम्राज्य स्थापित करने का जो वह स्वप्न देख रहे थे वह सदैव के लिए चकनाचूर हो गया। उधर निजाम भी फ्रांसीसियों के प्रभाव से मुक्त होकर अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया। इस प्रकार अंग्रेजों की शक्ति भारत में बहुत अधिक बढ़ गयी।

अंग्रेजों की सफलता तथा फ्रांसीसियों की असफलता के कारण :

फ्रांसीसियों की असफलता तथा अंग्रेजों की सफलता के अनेक कारण थे जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित थे-

1. व्यापारिक श्रेष्ठता तथा सन्तोषजनक आर्थिक स्थिति

अंग्रेजों की सफलता का सबसे प्रमुख कारण यह था कि फ्रांसीसी कम्पनी की अपेक्षा अंग्रेज कम्पनी की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी। युद्ध काल में भी अंग्रेजों ने अपने व्यापार की ओर पूरा ध्यान दिया और इस प्रकार वे अपने युद्धों पर व्यय करने के लिए धन कमाते रहे तथा वे दूसरों पर निर्भर नहीं रहें। साथ ही कम्पनी ने इंग्लैण्ड की सरकार को विशाल धनराशि ऋण के रूप में दी तथा जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। एक अनुमान के अनुसार सन् 1736 ई. से 1756 ई. के बीच 21 वर्षों में अंग्रेज कम्पनी ने फ्रांसीसी कम्पनियों की अपेक्षा 3.5 गुना अधिक व्यापार किया। फ्रांसीसी अधिकारियों ने इस तथ्य की अवहेलना कर दी। परिणामस्वरूप फ्रांसीसी कम्पनी की आर्थिक स्थिति निरन्तर खराब होती चली गयी। धन के अभाव के कारण सैनिकों को वेतन नहीं दिया जा सका और इसी धन के कारण डूप्ले तथा लाली को व्यर्थ की अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने अनेक आवश्यक योजनाओं का परित्याग धनाभाव के कारण किया। इस प्रकार धनाभाव के कारण फ्रांसीसियों के मार्ग में अनेक बाधाएँ उत्पन्न हो गयीं।

2. अंग्रेजी कम्पनी का स्वरूप

अंग्रेजी कम्पनी एक प्राइवेट कम्पनी थी, इसी कारण इसके सदस्यों में इसके कल्याण के लिए सदैव विशेष रुचि और उत्साह रहता था। इसके कर्मचारी भी अत्यन्त उत्साह और लगन से कार्य करते थे, क्योंकि उनकी स्वयं की नौकरी कम्पनी की समृद्धि पर निर्भर करती थी। इसके विपरीत, फ्रांसीसी एक सरकारी संस्था थी जिससे इसके कर्मचारी उतनी लगन एवं निष्ठा से कार्य नहीं करते थे जितनी कि अंग्रेजी कर्मचारी करते थे। इसके अतिरिक्त फ्रांसीसी कम्पनी को ब्याज एक निश्चित दर पर ही मिलता था, इस कारण वे भी कम्पनी के कार्यों में कोई रुचि नहीं लेते थे। इसके साथ-साथ अंग्रेजी कम्पनी पर उसकी सरकार की नीति-परिवर्तनों को कोई प्रभाव नहीं पड़ता था।

3. अंग्रेजी कम्पनी को सरकारी सहायता

यद्यपि अंग्रेजी कम्पनी एक निजी कम्पनी थी परन्तु वह आवश्यकता के समय जनता तथा सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त कर लेती थी। कम्पनी ने इंग्लैण्ड की सरकार को ऋण दे रखा था जिससे इंग्लैण्ड की सरकार कम्पनी की ऋणी थी। इसके अतिरिक्त, इसके अनेक संचालक तथा हिस्सेदार संसद सदस्य थे तथा अनेक उच्च पदों पर आसीन थे। इसके विपरीत, फ्रांसीसी कम्पनी में ऐसे कोई उच्च पदों पर आसीन सदस्य नहीं थे तथा फ्रांसीसी कम्पनी को किसी प्रकार की सहायता नहीं दी।

4. बंगाल विजय

अंग्रेजों की बंगाल विजय उनकी सफलता का एक बड़ा कारण था। न केवल इससे अंग्रेजों की प्रतिष्ठा बढ़ी अपितु इससे बंगाल का अपार धन एवं जनशक्ति भी उन्हें मिल गयी। फ्रांसीसियों के पास इस प्रकार का कोई प्रदेश नहीं था। उन्होंने दक्षिण में ही अपना एक केन्द्र बनाया जो कि उनकी भूल थी।

5. डूप्ले को वापस बुलाना

फ्रांसीसी सरकार की एक भयंकर भूल यह थी कि उसने 1754 ई. को फ्रांस वापस बुला लिया। यथार्थ में कर्नाटक में फ्रांसीसियों की पराजय का उत्तरदायित्व डूप्ले पर नहीं था। वह एक योग्य एवं निःस्वार्थ व्यक्ति था, जिसने भारत की स्थिति का भली प्रकार अध्ययन कर लिया था। यदि उसे भारत में कुछ समय और रहने दिया जाता तो सम्भवतः फ्रांसीसियों की स्थिति को सुधार देता। ऐसे योग्य व्यक्ति की अनुपस्थिति में फ्रांसीसियों के लिए सफलता प्राप्त करना असम्भव हो गया।

6. अंग्रेज अधिकारियों का पूर्ण सहयोग

अंग्रेज अधिकारियों में तथा सेनापतियों में योग्यता के अतिरिक्त एकता भी थी। उन्होंने अपनी योग्यता और एकता के बल पर ही सफलता प्राप्त की। इधर फ्रांसीसी अधिकारियों में पारस्परिक एकता का सर्वथा अभाव था। उनके जल सेना और थल सेना के अधिकारियों ने सम्भवतः कभी भी सहयोग से कार्य नहीं किया।

7. लाली का उत्तरदायित्व

फ्रांसीसियों के पतन के लिए सेनापति लाली भी बहुत कुछ सीमा तक उत्तरदायी था। वह क्रोधी स्वभाव का तथा कटुभाषी व्यक्ति था, इसके कारण चारों ओर उसके शत्रु-ही-शत्रु हो गए। कोई भी फ्रांसीसी अधिकारी उसके बाद सहयोग से कार्य नहीं कर सकता था।

8. श्रेष्ठ अंग्रेजी जल सेना

इस समय अंग्रेजों की जल-शक्ति अजेय थी और यह उनकी सफलता का मुख्य कारण था। इसका सभी जल मार्गों पर अधिकार था और वे भी फ्रांसीसियों की अपेक्षा कहीं अधिक शीघ्रता से भारत को सहायता भेज सकते थे। फ्रांसीसियों की अनेक स्थलीय सफलताएँ जल सेना के अभाव में निरर्थक हो गयी।

9. यूरोपीय राजनीति

जिस समय भारत में फ्रांसीसी तथा अंग्रेज युद्ध चल रहा था उस समय फ्रांस अनेक देशों के साथ युद्ध में उलझा हुआ था इसी कारण वह भारत की ओर विशेष ध्यान न दे सका। इंग्लैण्ड एक पृथक् द्वीप होने के कारण यूरोपीय युद्धों के बचा रहा इसी कारण अंग्रेज अपने जन तथा धन की रक्षा कर सके जिससे वे भारत की ओर अधिक ध्यान दे सके।

10. विलियम पिट की नीति

इंग्लैण्ड के युद्ध मन्त्री विलियम पिट ने अंग्रेजों की सफलता के लिए उत्तरदायी था, उसने अपनी नीति से फ्रांस को यूरोप में इस प्रकार व्यस्त रखा कि वह भारत की ओर ध्यान ही न दे सका। 1758 ई. में युद्ध मन्त्री का दायित्व संभालते ही पिट ने इस प्रकार के क्रान्तिकारी परिवर्तन किए कि फ्रांस यूरोपीय मामलों में उलझ कर रह गया।

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