# औद्योगिक क्रांति के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनितिक प्रभाव | Audyogik Kranti Ke Prabhav | Effects of the Industrial Revolution

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औद्योगिक क्रांति के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनितिक प्रभाव :

औद्योगिक क्रान्ति से विश्व के अधिकतर देशों में तीव्रता के साथ सामाजिक, आर्थिक एवं राजनितिक परिवर्तन हुआ। इस क्रान्ति से एक नये युग का सूत्रपात हुआ जिसके कारण नये वर्गों, नई नीतियों एवं नये विचारों का उद्भव हुआ जिससे प्राचीन परम्पराओं, रहन-सहन, खान-पान में परिवर्तन हुआ। यह क्रान्ति बौद्धिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित थी जिसके कारण समाज के सभी क्षेत्रों में वैज्ञानिक विचारधारा का उद्भव हुआ। औद्योगिक क्रान्ति के प्रभावों को अग्रांकित दृष्टि से देखा जा सकता है।

1. सामाजिक प्रभाव

औद्योगिक क्रान्ति के कारण सामाजिक परिवर्तन अत्यन्त तीव्रता के साथ हुआ है। इस क्रान्ति का प्रभाव समाज के सभी क्षेत्रों में रहा है। विश्व के अधिकतर देशों ने अपनी प्राचीन संस्कृति एवं सभ्यता को धीरे-धीरे त्याग दिया और नवीन वैज्ञानिक विचारधारा को स्वीकार कर लिया। औद्योगिक क्रान्ति के सामाजिक प्रभावों को अग्रलिखित स्वरूपों में अनुभव किया जा सकता है-

1. पूँजीवाद का उदय

औद्योगिक क्रान्ति के कारण जब बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना हुई और उसमें कम व्यय पर अधिक उत्पादन होने लगा तो पूँजीपतियों को अतिरिक्त मूल्य से अतुल सम्पत्ति की प्राप्ति हुई। धीरे-धीरे पूँजीपति वर्ग ने धन-सम्पदा के बल पर अपने लाभ के लिए राजनीतिक दबाव भी बनाना शुरू कर दिया। इस प्रकार इस क्रान्ति से पूँजीपतियों एवं उद्योगपतियों का वर्चस्व स्थापित होने लगा।

2. उपनिवेशवाद की स्थापना एवं साम्राज्यवाद का प्रसार

औद्योगिक क्रान्ति के कारण यूरोप में उत्पादित माल की खपत के लिए नये-नये बाजारों की आवश्यकता थी। इसके अलावा कच्चे मालों की आपूर्ति एवं कम मजदूरी वाले मजदूरों की आवश्यकता थी। अतः उन्होंने विश्व के अन्य देशों को अपना उपनिवेश बनाना प्रारम्भ कर दिया जिससे उनके साम्राज्य का विस्तार भी हो गया। उपनिवेशवाद की स्थापना एवं साम्राज्यवाद के विस्तार में इंग्लैण्ड, फ्रान्स, स्पेन, हालैण्ड, जर्मनी और इटली प्रमुख देश थे जिसमें इंग्लैण्ड का साम्राज्य अत्यन्त विकसित था जिसके बारे में उस समय कहा जाता था कि सूर्य अंग्रेजी साम्राज्य में कभी-भी अस्त नहीं होता था अर्थात् विश्व के अधिकतर देशों में अंग्रेजों का प्रभाव था। यूरोप के ये देश अपने उपनिवेश देश का आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक शोषण किया करते थे। वहाँ से कच्चा माल प्राप्त करके अपने देश के उद्योगों का विकास किया करते थे और उत्पादित वस्तुओं को अत्यधिक लाभ के साथ इन उपनिवेशों में विक्रय किया करते थे जिससे विश्व की धन सम्पदा यूरोप में आती रही और यूरोप शताब्दियों तक विश्व का संचालन करता रहा।

औद्योगिक क्रांति के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनितिक प्रभाव | Audyogik Kranti Ke Prabhav | Effects of the Industrial Revolution | परिणाम, Parinam

3. परम्पराओं में परिवर्तन

औद्योगिक क्रान्ति के कारण विश्व की प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति का क्षय हो गया और सामाजिक परिवर्तन में तीव्रता के कारण समाज का कायाकल्प हो गया। प्राचीन परम्परा, रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान, धार्मिक विश्वास, कला, साहित्य एवं विचार में परिवर्तन हो गया जिसके कारण समाज के एक नये स्वरूप का उद्भव हुआ जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित था। नया समाज उपभोक्तावादी एवं भौतिकवादी संस्कृति का पोषक हुआ जो आज को देखता है कल को नहीं देखता है।

4. आवश्यकता में वृद्धि

औद्योगिक क्रान्ति के कारण समाज में जिस संस्कृति का उद्भव हुआ उससे मनुष्यों की आकांक्षाओं में विकास हुआ। प्राचीन समय में मनुष्यों की मूल आवश्यकता वस्त्र एवं भोजन रहा है लेकिन इस क्रान्ति ने उत्पादन के नये-नये उपभोग की वस्तुएँ प्रदान की जिससे मनुष्यों की प्रवृत्तियों, भोग-विलास, चमक-दमक एवं ऐशो-आराम की हो गई। इस समाज में मनुष्यों की आकांक्षाएँ सब कुछ प्राप्त करने की थी यद्यपि इसके लिए वह कठिन श्रम भी करता था। इस क्रान्ति के बाद सामान्य व्यक्ति भी अपनी बुद्धि एवं कौशल के बल पर सम्पन्न, प्रतिष्ठित एवं प्रभावशाली व्यक्ति के श्रेणी में जा सकता था।

5. मध्यम वर्ग का विकास एवं वर्ग का उदय

औद्योगिक क्रान्ति के कारण मध्यम वर्ग का तीव्र गति से विकास हुआ क्योंकि औद्योगिक विकास के लिए सम्पत्ति एवं विवेक की आवश्यकता थी। सामन्तों के पास धन सम्पदा होने के बाद भी विवेक का अभाव था। मध्यम वर्ग पूँजी और बुद्धि दोनों में सम्पन्न थे अतः उन्होंने अपनी सम्पत्ति का प्रयोग उद्योगों की स्थापना में किया। इस वर्ग ने अपने बुद्धि-विवेक से व्यापार एवं उद्योग में अत्यधिक विकास किया। माध्यम वर्ग ने जहाँ पर शहरी समाज का नेतृत्व किया वहाँ पर अपनी आर्थिक स्थिति अत्यन्त मजबूत बना ली थी।

औद्योगिक क्रान्ति में सबसे बड़ा योगदान श्रमिक वर्ग का था लेकिन इनका अत्यधिक शोषण किया गया था। यह वर्ग समाज में सबसे बड़ा था। इन्हीं के कारण ही समाज के उच्च वर्गों की प्रतिष्ठा स्थापित हुई थी लेकिन इन वर्गों के लोगों को अपनी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं हो पाती थी। अतः इस वर्ग ने अपने अधिकार एवं रक्षा के लिए श्रमिक संगठन की स्थापना की जो पूँजीवाद का विरोधी वर्ग सिद्ध हुआ। बाद में कार्ल मार्क्स ने विश्व के श्रमिकों को एक होने का आह्वान किया जिससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यह संगठन सक्रिय हुआ।

6. नगरीकरण

औद्योगिक क्रान्ति के कारण जब बड़े-बड़े कल-कारखानों की स्थापना हुई तो कारखाना के मालिकों ने मजदूरों के आवास, बच्चों के विद्यालय एवं पार्कों की स्थापना की। इनके मनोरंजन के लिए सिनेमाघरों और वस्तुओं के लिए दुकानों एवं बाजारों की स्थापना हुई जिसने धीरे धीरे छोटे एवं बड़े नगरों का स्वरूप धारण कर लिया। नगरों में जनसंख्या की वृद्धि से गन्दी बस्तियाँ भी अस्तित्व में आई जिसमें मजदूर, भिखारी, शराबी एवं अपराधी की मात्रा अधिक थी। नगरीकरण से वैयक्तिकता, बुद्धिवाद एवं आर्थिक विषमता का भी विकास हुआ। नगर के लोगों का जीवन-स्तर ग्रामीण अंचल से सम्पन्न था अतः इस वर्ग ने राजनीतिक प्रभाव भी डालना प्रारम्भ कर दिया।

7. जीवन-स्तर में सुधार और नैतिकता का ह्रास

औद्योगिक क्रान्ति से जनसाधारण के जीवन-स्तर में सुधार आया। इस क्रान्ति से आवश्यकता वस्तुओं के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई और ये वस्तुएँ सस्ती होने के कारण आसानी से उपलब्ध हो जाती थीं। औद्योगिक क्रान्ति से जब उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास हुआ तो प्राचीन परम्पराओं एवं नैतिकता का ह्रास हुआ। इसी परिप्रेक्ष्य में संयुक्त परिवार के स्थान पर छोटे-छोटे परिवारों का जन्म हुआ जिसमें व्यक्तियों का झुकाव स्वयं, अपनी पत्नी एवं परपुरुष का विकास हुआ। शराब, जुआ, वेश्यावृत्ति, चोरी, झूठ, धोखा एवं अपराध भाव का विकास भी औद्योगिक क्रान्ति से हुआ। औद्योगिक क्रान्ति के विकास से व्यक्ति, समाज एवं देश पूर्णतया स्वार्थी होता गया। वह दूसरे के लिए काम तब तक नहीं करना चाहता है जब तक उसमें उसका स्वार्थ निहित न हो।

2. आर्थिक प्रभाव

औद्योगिक क्रान्ति के कारण आर्थिक सिद्धान्तों एवं नीतियों में परिवर्तन हुआ। इस क्रान्ति से पूँजीपति वर्ग का उदय हुआ और व्यापार एवं वाणिज्य में स्वतन्त्र नीति का समर्थन हुआ। इस नीति के अन्तर्गत सभी व्यक्तियों का व्यापार में अपना मार्ग स्वयं निर्धारित करने का अधिकार मिला जिससे व्यापार एवं वाणिज्य में व्यापक विस्तार हुआ। इनका विस्तार करने में बैंकिंग एवं बीमा कम्पनियाँ अत्यन्त सहयोगी रही। औद्योगिक क्रान्ति से कभी क्षेत्र के उद्योगों, कृषि एवं संदेशवाहनों में नयी-नयी प्रौद्योगिकी का विकास हुआ जिसने व्यक्तियों के आर्थिक जीवन को प्रभावित किया। इस क्रान्ति से प्राचीन परम्परागत आर्थिक प्रभाव का स्थान नवीन आर्थिक व्यवस्थाओं ने ले लिया। इस क्रान्ति से निम्नलिखित आर्थिक प्रथाव हुआ।

1. गृह उद्योगों का ह्रास एवं मशीनों का प्रभाव

औद्योगिक क्रान्ति से उद्योगों का मशीनीकरण हो गया था जिससे कारखानों में बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन कम व्यय पर होने लगा और जनसाधारण को भी वस्तुएँ कम मूल्यों पर मिलने लगीं। इससे पूँजीपतियों की धन सम्पदा में विकास होने लगा, परन्तु गृह उद्योगों पर इसका प्रभाव विनाशकारी हुआ क्योंकि परम्परागत हाथों से बने उद्योग मशीनों से बने उद्योग की तुलना में काफी महँगे होते थे। अतः धीरे-धीरे घरेलू उद्योगें की माँग बहुत कम हो गई जिससे कुशल कारीगरों तक ने बेरोजगार होकर कारखानों में कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार औद्योगिक क्रान्ति से गृह उद्योगों का ह्रास हुआ और मशीनीकरण का विकास हुआ। मशीनीकरण में श्रम विभाजन, बड़े पैमाने पर उत्पादन, उद्योगों के स्वामित्व प्रबन्ध, प्रमाणीकरण, शिल्पकारों में भेद और संगठन में पूँजीपति का प्रभुत्व इत्यादि विशेषताएँ विद्यमान थीं। मशीनीकरण में दोषों के होते हुए भी अनेक प्रकार की विशेषताएँ विद्यमान थीं।

2. उत्पादन में वृद्धि और पूँजीवाद का उदय

औद्योगिक क्रान्ति से उद्योगों एवं कृषि के उत्पादनों में अत्यधिक विकास हुआ। इस क्रान्ति से कहीं-कहीं इतना अधिक उत्पादन हुआ कि कीमतों में अत्यधिक गिरावट आयी जिसको रोकने के लिए वस्तुओं एवं अनाजों को नष्ट करना पड़ा। उद्योगों के उत्पादन में श्रमिक का सबसे महत्वपूर्ण स्थान था लेकिन वह अपनी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता था क्योंकि उत्पादन का अधिकांश लाभ पूँजीपतियों के पास होता था जिससे वे धीरे-धीरे अत्यधिक धनी हो गये। इस प्रकार पूँजीवाद का उदय हुआ जिसमें धन सम्पदा के मालिक पूँजीपति बन गये और जन साधारण इनके द्वारा शोषित वर्ग बन गया।

3. विशिष्टीकरण का विकास

औद्योगिक क्रान्ति के कारण विशिष्टीकरण का प्रोत्साहन हुआ क्योंकि मशीनों एवं नई विधियों के लिए एक विशेष कार्य एवं ज्ञान की आवश्यकता थी जिसके लिए विशेषज्ञ का होना अनिवार्य था। विशिष्टीकरण की यह प्रवृत्ति व्यक्तिगत स्तर के अलावा, स्थान विशेष एवं देश विशेष पर भी होने लगा। जिन क्षेत्रों में उत्पादन के कच्चे मालों की अधिकता थी वहाँ पर उसी प्रकार की औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित हुई। इसी प्रकार जो उत्पादन जहाँ पर श्रेष्ठ था वहाँ उसका एकाधिकार स्थापित हो गया।

4. संयुक्त पूँजी कम्पनियों एवं प्रबन्धन का विकास

उत्पादन के बड़े स्तर के लिए अधिक धन, भूमि, मशीन एवं कच्चे माल की आवश्यकता होती है। अतः इसके लिए संयुक्त पूँजी वाली कम्पनियों का गठन किया गया जिसमें हजारों-लाखों व्यक्तियों का अंश होता था जिनमें अंशो का विक्रय करके धन एकत्र किया जाता था। सभी अंशधारी कम्पनी के प्रबन्ध में हिस्सा नहीं ले सकते थे अतः प्रतिनिधि प्रबन्ध की व्यवस्था स्थापित की गई। प्रारम्भ में कम्पनी के प्रबन्धन में अभिकर्ता प्रणाली लागू की गई थी लेकिन बाद में अंशधारियों के प्रतिनिधियों और संचालक मण्डल द्वारा कम्पनी का प्रबन्धन किया जाने लगा जिससे उद्योग के स्वामित्व और प्रबन्धन अलग-अलग हो गये।

5. व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय आय में वृद्धि

औद्योगिक क्रान्ति के पूर्व श्रमिकों, मजदूरों, किसानों, शिल्पकारों एवं व्यापारियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। ये लोग खान-पान एवं रहन-सहन की खोज में ही अपना जीवन व्यतीत कर देते थे लेकिन औद्योगिक क्रान्ति से इनके जीवन स्तर में अत्यधिक वृद्धि हुई। इनके व्यक्तिगत आय में कई गुना विकास हुआ जिससे वे खान-पान, रहन-सहन की चिन्ता से मुक्त होकर ऐशो-आराम, चमक-दमक एवं तड़क-भड़क का जीवन व्यतीत करने लगे।

उद्योगों के विकास से जहाँ व्यक्तिगत आय में वृद्धि हुई है वहाँ पर समस्त यूरोप में राष्ट्रीय आय में आवश्चर्यजनक वृद्धि आंकलित की गई। भारत सहित विश्व के अन्य देशों में भी राष्ट्रीय आय की विकास दर औद्योगिक क्रान्ति के कारण कई गुना बढ़ी। यद्यपि पूर्वी देशों, अफ्रीका एवं अमेरिका के देशों का आर्थिक विदोहन भी यूरोप के देशों ने किया था लेकिन उद्योगों के कारण इन देशों की व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय आय में विकास हुआ।

6. संचार व्यवस्था का विकास होना

औद्योगिक क्रान्ति का प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर न होकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुआ था। यूरोप का उद्योग एवं व्यापार समस्त विश्व में विकसित था। अतः यूरोप से सीधा सम्पर्क स्थापित करने के लिए अनेक आविष्कार किए गए जिससे डाक तार, टेलीफोन एवं आधुनिक समय में अनेक अव्य साधनों का विकास हो गया है जिससे तुरन्त ही सम्पर्क स्थापित हो जाता है। संचार व्यवस्था के प्रसार से मालों की आपूर्ति जल्द ही कर दी जाती है और आवश्यक निर्देश तुरन्त ही दे दिये जाते हैं।

7. यातायात के साधनों का विकास

औद्योगिक क्रान्ति के कारण मशीनों, मालों एवं व्यक्तियों के आवागमन के लिए अनेक आविष्कार हुए जिससे सड़कों, नहरों एवं रेलवे लाइनों का विकास किया गया और इस पर चलने वाले वाहनों बसों, ट्रकों, जहाजों, रेलगाड़ियों एवं मालगाड़ियों का विकास उच्च स्तर पर किया गया। वायुमार्गों में वायुयानों का विकास भी किया गया जिससे व्यापार एवं उद्योग में अप्रत्याशित विकास हुआ और यूरोप को इससे अत्यधिक लाभ हुआ।

8. कृषि उद्योग का विकास

औद्योगिक क्रान्ति से परम्परागत कृषि व्यवस्था समाप्त हो गई और उसके स्थान पर आधुनिक ढंग से मशीनों एवं रासायनिक खादों के माध्यम से कृषि उत्पादन में अत्यधिक विकास हुआ। अब छोटे-छोटे खण्डों की अपेक्षा बड़े फार्मों में खेती होने लगी। उत्तम बीजों के प्रसार से एवं अन्य आवश्यक फसल उत्पादक संसाधनों से कृषि उद्योग में क्रान्ति आ गई। नई-नई मशीनों प्रविधियों के आविष्कार से खेती करना भी व्यावसायिक एवं अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुआ।

9. व्यवसाय चक्र

औद्योगिक क्रान्ति के कारण उत्पादन की मात्रा में अत्यधिक विकास हुआ लेकिन उत्पादन और विक्रय की मात्रा पर मौसम, फैशन, तकनीकी आविष्कार और पूँजी की उपलब्धता का प्रभाव पड़ने लगा जिससे व्यापार एवं उद्योग में तेजी-मन्दी का असर प्रारम्भ हो गया जिसका प्रभाव सभी वर्गों पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ने लगा। मन्दी के समय उत्पादन कम होने पर बेरोजगारी बढ़ जाती थी जबकि तेजी के समय माँग बढ़ने पर रोजगार के अवसर में विकास होता था।

इस प्रकार औद्योगिक क्रान्ति के कारण व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र का अत्यधिक विकास हुआ। इस क्रान्ति से विलासिता की मानी जाने वाली वस्तुएँ आम व्यक्तियों की आवश्यकता बन गई थी जो कम व्यय पर आसानी से उपलबध हो जाती थीं। वर्तमान आर्थिक विकास औद्योगिक क्रान्ति का ही परिणाम है। आज का मनुष्य सभी ऐशो-आराम एवं तकनीकी का उपयोग कर रहा है यद्यपि इस क्रान्ति से अनेक प्रकार के आर्थिक दुष्प्रभाव भी हुए हैं। आज के मनुष्यों के विभिन्न वर्गों के जीवन-स्तर में जमीन-आसमान का अन्तर है, आज अधिकतर मानव गन्दी बस्तियों एवं प्रदूषित पर्यावरण में निवास कर रहा है। पूँजीपति वर्ग अपनी संज्ञानता में वस्तुओं एवं खाद्यान्नों को बर्बाद कर देता है जिससे वस्तुओं की कीमत में वृद्धि हो। इसके अलावा कारखाना विषाक्त वातावरण को बढ़ा रहा है जो पूर्णतया अमानवीय है। इसी प्रकार राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्धन राष्ट्रों एवं मनुष्यों के विकास की अनदेखी करके विकसित एवं धनवानों की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है।

औद्योगिक क्रान्ति के कारण उत्पन्न हुए दोषों एवं संघर्षों के बावजूद भी समाज के जीवन-स्तर में प्राचीन काल की अपेक्षा अत्यन्त विकास हुआ। आज आर्थिक विकास के कारण ही मानवीय प्रवृत्ति का प्रसार हो रहा है और विकसित एवं विकासशील राष्ट्रों एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाकर उन दोषों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। जिसके कारण संघर्ष की प्रवृत्ति पनपती है और मानवीय विकास अवरुद्ध होता है।

3. राजनितिक प्रभाव

औद्योगिक क्रान्ति के कारण पूँजीवाद का अभ्युदय हुआ। पूँजीपतियों ने अपने लाभ के लिए राजनीति को प्रभावित करना प्रारम्भ कर दिया जिसके कारण राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष की प्रवृत्ति का विकास हुआ। औद्योगिक क्रान्ति के राजनितिक प्रभाव को निम्नलिखित दृष्टिकोण से देखा जा सकता है-

1. पूँजीपतियों एवं मध्यम वर्गों का महत्व

औद्योगिक क्रान्ति के कारण पूँजीपतियों एवं मध्यम वर्गों का प्रभाव देश की राजनीति में अत्यधिक हो गया। वह वर्ग शिक्षा एवं धन की दृष्टि से सम्पन्न वर्ग या जिसने अपने आत्मविश्वास एवं दृढ़ संकल्प से औद्योगिक क्रान्ति को उच्च शिखर पर पहुँचाया था। यह वर्ग अपने लाभ के लिए राजनीतिक दबाव बनाता था। वैसे सबसे पहले औद्योगिक क्रान्ति इंग्लैण्ड में हुई थी लेकिन मध्यम वर्गों को सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकार सबसे पहले अमेरिका में मिला। उसके बाद फ्रान्स में यह अधिकार प्राप्त हुआ जबकि इंग्लैण्ड में 1832 ई. में सामाजिक एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त हुए थे। लेकिन पूँजीपतियों ने सदैव सरकार की नीतियों को अपने पक्ष में किया क्योंकि सरकार को इनके माध्यम से अत्यधिक आय प्राप्त होती थीं।

2. उपनिवेशवाद की भावना का विकास

औद्योगिक क्रान्ति के पूर्व ही उपनिवेशवाद की स्थापना होने लगी थी लेकिन इस क्रान्ति ने इसमें तीव्रता प्रदान की थी। औद्योगिक क्रान्ति के कारण उत्पादनों के विक्रय, कच्चे माल की आपूर्ति एवं अन्य संसाधनों के लिए बाजारों एवं मजदूरों की आवश्यकता थी। अतः अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा एवं विकास के लिए उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद आवश्यक हो गया था। उपनिवेशवाद में इंग्लैण्ड, फ्रान्स, रूस, हॉलैण्ड, बेल्जियम, स्पेन एवं पुर्तगाल प्रमुख दश वे जिसमें इंग्लैण्ड का उपनिवेश सबसे अधिक था। इस क्षेत्र में जर्मनी एवं इटली पिछड़ गये थे। उपनिवेश के कारण यूरोप के राष्ट्रों में मतभेद एवं संघर्ष प्रारम्भ हो गया था जिसके कारण प्रथम विश्वयुद्ध हुआ।

3. श्रमिक संघर्ष

औद्योगिक क्रान्ति के कारण पूँजीपतियों ने अत्यधिक धन संचय किया लेकिन श्रमिकों की स्थिति अत्यन्त दयनीय होती गई। इस वर्ग के श्रम के कारण ही उद्योगों का उत्पादन होता था लेकिन यह वर्ग अपनी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाता था और अत्याधुनिक मशीनीकरण के कारण श्रमिकों में बेरोजगारी भी बढ़ गई थी। इस वर्ग के रहन-सहन एवं खान-पान का स्तर अत्यन्त प्रदूषित एवं हानिकारक था। अतः यह वर्ग बीच-बीच में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता रहा। समाज सुधारक राबर्ट ओवेन ने सर्वप्रथम श्रमिकों के हितों के लिए संघर्ष किया था। जिससे सरकार ने 1802 ई. में निर्धन एवं अनाथ बच्चों के कार्यों को सप्ताह में 62 घण्टा निर्धारित किया। इसी प्रकार 1819 ई. एवं 1822 ई. में बालकों के कार्यों की सीमा कम की गई। ये सुधार अत्यन्त कम थे लेकिन इससे श्रमिकों में संघर्ष की भावना का विकास हुआ।

4. समाजवाद का अभ्युदय

औद्योगिक क्रान्ति के कारण वर्ग-विषमता में जैसे-जैसे विकास हुआ वैसे-वैसे संघर्ष भी बढ़ा जिससे कारण श्रमिकों ने आन्दोलन करना प्रारम्भ कर दिया। यह आन्दोलन समाजवाद, साम्यवाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ जिसके माध्यम से समाज में आर्थिक एवं राजनैतिक समानता पर बल दिया गया। साम्यवादी विचारधारा को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने का प्रयास कार्ल मार्क्स ने किया। इन्होंने श्रमिकों को संगठित होकर पूँजीपतियों के विरुद्ध संघर्ष की भावना का प्रचार एवं प्रसार किया। साम्यवादियों का आन्दोलन पूर्णतः हिंसात्मक था क्योंकि बिना हिंसा के श्रमिकों को अपना अधिकार नहीं मिल सकता है।

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